महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती: भांग, त्रिशूल व सुगंधित पुष्पों से हुआ बाबा महाकाल का दिव्य शृंगार
सारांश
मुख्य बातें
उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में 30 अगस्त 2026 को भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वितीया के पावन अवसर पर बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई। भांग, त्रिशूल, त्रिपुंड और सुगंधित पुष्पों से सजे बाबा के दिव्य स्वरूप के दर्शन के लिए मंदिर परिसर में देश के कोने-कोने से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ पड़े।
कपाट खुलने से भस्म आरती तक का क्रम
रविवार की तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात ढोल-नगाड़ों की गूँज के बीच बाबा महाकाल के कपाट विधिवत खोले गए। मंत्रोच्चार के साथ जलाभिषेक किया गया और फिर दूध, दही, घी, शहद तथा फलों के रस से बने पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। पूजा के क्रम में प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया।
कपूर आरती के उपरांत बाबा ने मुकुट धारण किया। इसके बाद झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद के साथ भस्म आरती की गई। बाबा महाकाल का भांग, त्रिशूल, त्रिपुंड और सुगंधित पुष्पों से दिव्य शृंगार किया गया, जो भक्तों के लिए अलौकिक अनुभव रहा।
महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरा
परंपरा के अनुसार महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म आरती अर्पित की जाती है। मान्यता है कि भस्म अर्पित किए जाने के पश्चात बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। मंदिर के पुजारी ने महाआरती विधिवत संपन्न कराई।
श्रद्धालुओं की आस्था और वेशभूषा नियम
भस्म आरती के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु बीती रात से ही कतारबद्ध हो गए थे। जैसे ही बाबा के दर्शन हुए, पूरा मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से गूँज उठा। घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
गौरतलब है कि भस्म आरती में शामिल होने के लिए पुरुषों के लिए पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य होता है। यह नियम मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है।
महाकालेश्वर की आध्यात्मिक महत्ता
उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे दक्षिणमुखी शिवलिंग के रूप में विशेष रूप से पूजनीय माना जाता है। प्रतिदिन होने वाली भस्म आरती इस मंदिर की सबसे प्रतिष्ठित धार्मिक परंपरा है, जो देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं को उज्जैन की पावन नगरी की ओर खींचती है। आने वाले पर्व-त्योहारों के मद्देनज़र मंदिर प्रशासन श्रद्धालुओं की संख्या में और वृद्धि की संभावना जता रहा है।