21 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

महाकालेश्वर उज्जैन भस्म आरती: ज्येष्ठ माह में बाबा का दिव्य श्रृंगार, देश-विदेश के श्रद्धालुओं का उमड़ा सैलाब

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
महाकालेश्वर उज्जैन भस्म आरती: ज्येष्ठ माह में बाबा का दिव्य श्रृंगार, देश-विदेश के श्रद्धालुओं का उमड़ा सैलाब

सारांश

ज्येष्ठ अधिक माह की द्वितीया तिथि पर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती का दिव्य आयोजन हुआ। पंचामृत अभिषेक, भांग-चंदन श्रृंगार और महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा भस्म अर्पण के साथ 'जय महाकाल' के जयकारों से पूरी उज्जैन नगरी गूंज उठी।

मुख्य बातें

2 जून 2026 को ज्येष्ठ अधिक माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीया पर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में विशेष भस्म आरती का आयोजन हुआ।
देश-विदेश से हज़ारों श्रद्धालु रात से ही कतारों में खड़े होकर बाबा महाकाल के दर्शन के लिए पहुँचे।
पंचामृत (दूध, दही, घी, शक्कर, शहद) से अभिषेक के बाद भांग, चंदन, सूखे मेवों और ताज़े फूलों से बाबा का दिव्य श्रृंगार किया गया।
महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा को पवित्र भस्म अर्पित की गई; भस्म कपिला गाय के कंडों और शमी, पीपल, पलाश सहित छह पवित्र वृक्षों की लकड़ी से तैयार होती है।
भस्म आरती नश्वरता और अहंकार-त्याग का प्रतीक मानी जाती है; महिला श्रद्धालु परंपरानुसार घूंघट में दर्शन करती हैं।

उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में 2 जून 2026 को ज्येष्ठ अधिक माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीय तिथि पर तड़के भस्म आरती के दौरान देश-विदेश से आए हज़ारों श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल के अलौकिक दिव्य दर्शन किए। 'हर-हर महादेव' और 'जय महाकाल' के गगनभेदी जयकारों से पूरी उज्जैन नगरी गूंज उठी।

मंदिर के कपाट खुलने से पहले ही लगीं कतारें

आरती में शामिल होने के लिए श्रद्धालुओं का उत्साह असाधारण था। मंगलवार की रात से ही भक्तों की लंबी-लंबी कतारें मंदिर परिसर के बाहर लगनी शुरू हो गई थीं। परंपरागत विधि के अनुसार, वीरभद्र से आज्ञा लेकर तड़के मंदिर के कपाट खोले गए, जिसके बाद पूरा परिसर भक्ति और आस्था के रंग में रंग गया।

पंचामृत अभिषेक और दिव्य श्रृंगार

भस्म आरती की विधि के अनुसार सर्वप्रथम भगवान महाकाल को जल अर्पित कर स्नान कराया गया। इसके पश्चात दूध, दही, घी, शक्कर और शहद से निर्मित पंचामृत से बाबा का विशेष अभिषेक किया गया। गर्भगृह में वैदिक मंत्रोच्चार से वातावरण पूर्णतः शिवमय हो गया।

अभिषेक के उपरांत भांग, चंदन, सूखे मेवों और ताज़े पुष्पों से बाबा महाकाल का अत्यंत भव्य एवं अलौकिक श्रृंगार किया गया। इसके बाद महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा को पवित्र भस्म अर्पित की गई। शंख, डमरू और घंटियों की दिव्य ध्वनि से पूरा मंदिर परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया।

भस्म आरती का आध्यात्मिक महत्व

महाकाल की भस्म आरती नश्वरता का गहन प्रतीक मानी जाती है। यह भक्तों को यह संदेश देती है कि सांसारिक सब कुछ अंततः राख हो जाता है और इसलिए अहंकार का त्याग ही सच्ची भक्ति है। मान्यता है कि प्राचीन काल में चिता की भस्म का उपयोग होता था, किंतु वर्तमान परंपरा के अनुसार भस्म कपिला गाय के गोबर से बने कंडों (उपलों) तथा शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलताश और बेर जैसे पवित्र वृक्षों की लकड़ियों को जलाकर तैयार की जाती है।

महिला श्रद्धालुओं की भागीदारी

भस्म आरती में महिला भक्तों की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। परंपरा के अनुसार, आरती के समय महिलाएँ घूंघट में रहकर बाबा के दर्शन करती हैं। इस रीति का पालन करते हुए बड़ी संख्या में महिला श्रद्धालुओं ने इस दिव्य अनुभव में भाग लिया।

आगे का दृष्टिकोण

ज्येष्ठ अधिक माह के चलते महाकालेश्वर मंदिर में आने वाले दिनों में भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना है। मंदिर प्रशासन द्वारा व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए विशेष इंतज़ाम किए गए हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन अर्थव्यवस्था की धुरी है — फिर भी मंदिर परिसर में बढ़ती भीड़ और श्रद्धालुओं की सुरक्षा-व्यवस्था पर नियमित सवाल उठते रहे हैं। ज्येष्ठ अधिक माह जैसे विशेष अवसरों पर जब लाखों की संख्या में भक्त उमड़ते हैं, तब प्रशासनिक तैयारी और परंपरा के बीच संतुलन बनाना एक वास्तविक चुनौती बन जाता है। भस्म की परंपरा में हुए बदलाव — चिता भस्म से गोबर-कंडे तक — यह भी दर्शाते हैं कि सनातन परंपराएँ समय के साथ व्यावहारिक अनुकूलन करती हैं, जो इस आस्था की जीवंतता का प्रमाण है।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती क्या होती है?
भस्म आरती उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन तड़के होने वाला सबसे पवित्र अनुष्ठान है, जिसमें बाबा महाकाल को पवित्र भस्म अर्पित की जाती है। यह नश्वरता का प्रतीक है और भक्तों को अहंकार त्यागने की प्रेरणा देती है।
भस्म आरती में उपयोग की जाने वाली भस्म कैसे तैयार होती है?
वर्तमान परंपरा के अनुसार भस्म कपिला गाय के गोबर से बने कंडों (उपलों) और शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलताश तथा बेर जैसे पवित्र वृक्षों की लकड़ियों को जलाकर तैयार की जाती है। पहले चिता की भस्म का उपयोग होता था, किंतु परंपरा में यह बदलाव आया।
2 जून 2026 को महाकाल भस्म आरती में क्या विशेष हुआ?
ज्येष्ठ अधिक माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि पर देश-विदेश से हज़ारों श्रद्धालु उमड़े। पंचामृत अभिषेक के बाद भांग, चंदन, सूखे मेवों और ताज़े फूलों से बाबा का दिव्य श्रृंगार किया गया और महानिर्वाणी अखाड़े ने भस्म अर्पित की।
क्या महिलाएँ भस्म आरती में शामिल हो सकती हैं?
हाँ, महिला श्रद्धालु भस्म आरती में शामिल हो सकती हैं। परंपरा के अनुसार आरती के समय वे घूंघट में रहकर बाबा महाकाल के दर्शन करती हैं।
महाकालेश्वर मंदिर के कपाट भस्म आरती के लिए कब खुलते हैं?
भस्म आरती के लिए मंदिर के कपाट तड़के (सूर्योदय से पूर्व) खोले जाते हैं। परंपरागत विधि के अनुसार वीरभद्र से आज्ञा लेकर ही कपाट खोले जाते हैं, जिसके बाद अनुष्ठान आरंभ होता है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 सप्ताह पहले
  2. 3 सप्ताह पहले
  3. 3 सप्ताह पहले
  4. 3 सप्ताह पहले
  5. 3 सप्ताह पहले
  6. 2 महीने पहले
  7. 2 महीने पहले
  8. 3 महीने पहले