महाकालेश्वर मंदिर में ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया पर भस्म आरती, भांग-श्रृंगार से भावविभोर हुए श्रद्धालु

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महाकालेश्वर मंदिर में ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया पर भस्म आरती, भांग-श्रृंगार से भावविभोर हुए श्रद्धालु

सारांश

ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया और सोमवार के दुर्लभ संयोग पर उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती का भव्य आयोजन हुआ। भांग, त्रिपुंड, नवीन मुकुट और पुष्पमालाओं से सजे बाबा महाकाल के निराकार-से-साकार दर्शन ने देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।

मुख्य बातें

उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में 18 मई को ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया पर भव्य भस्म आरती संपन्न हुई।
महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा जलाभिषेक और पंचामृत स्नान के बाद भस्म आरती का आयोजन हुआ।
बाबा के श्रृंगार में त्रिपुंड, दो चंद्रमा, नवीन मुकुट, बिल्वपत्र और रंग-बिरंगे पुष्प शामिल रहे।
भस्म आरती में गोहरी, पीपल, पलाश, शमी और बेल की लकड़ियों की राख का उपयोग होता है।
मान्यता अनुसार महिलाएँ घूंघट या ओढ़नी डालकर भस्म आरती के दर्शन करती हैं।
सोमवार होने के कारण सामान्य दिनों की तुलना में श्रद्धालुओं की संख्या विशेष रूप से अधिक रही।

उज्जैन के विश्वविख्यात महाकालेश्वर मंदिर में ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर 18 मई को भव्य भस्म आरती का आयोजन हुआ। भांग से सुसज्जित बाबा महाकाल के दिव्य स्वरूप के दर्शन कर देश-विदेश से पधारे श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। सोमवार का दिन होने के कारण मंदिर परिसर में आस्था का विशेष सैलाब उमड़ा।

मुख्य घटनाक्रम

परंपरागत विधि-विधान के अनुसार, सुबह भोर में भगवान वीरभद्र की आज्ञा प्राप्त करने के उपरांत मंदिर के कपाट खोले गए। कपाट खुलते ही पूरे परिसर में 'जय श्री महाकाल' के जयकारों से वातावरण गुंजायमान हो उठा। घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार की पवित्र ध्वनि चारों ओर फैल गई।

इसके पश्चात महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा बाबा का जलाभिषेक किया गया और तत्पश्चात पंचामृत से स्नान कराया गया। अभिषेक की इस पावन प्रक्रिया के बाद भस्म आरती का भव्य आयोजन संपन्न हुआ, जिसमें बाबा को भस्म अर्पित कर विधिवत आरती उतारी गई।

बाबा का दिव्य श्रृंगार

आज के श्रृंगार में बाबा महाकाल के मुखारविंद को अत्यंत कलात्मक ढंग से सजाया गया। उनके माथे पर त्रिपुंड और दो चंद्रमा सुसज्जित किए गए। नवीन मुकुट धारण कराकर ताज़े बिल्वपत्र अर्पित किए गए और रंग-बिरंगे पुष्पों की मालाओं से संपूर्ण श्रृंगार को और अधिक मनोहारी बनाया गया।

भस्म आरती का धार्मिक महत्व

भस्म आरती का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत विशेष माना जाता है। इसमें गोहरी, पीपल, पलाश, शमी और बेल जैसे पवित्र वृक्षों की लकड़ियों की राख का उपयोग किया जाता है। मान्यता है कि इस समय भगवान महाकाल निराकार रूप में विराजमान होते हैं — अर्थात अनंत, रूपहीन और सर्वव्यापी परमात्मा भक्तों के कल्याण के लिए एक निश्चित और पूजनीय साकार स्वरूप में प्रकट होते हैं।

इसी मान्यता के अनुसार, महिलाओं को भस्म आरती सीधे देखने की अनुमति नहीं होती — वे घूंघट या ओढ़नी डालकर दर्शन करती हैं।

आम जनता पर असर

रात से ही श्रद्धालु लंबी कतारों में खड़े होकर भस्म आरती में सम्मिलित होने की प्रतीक्षा करते रहे। सोमवार और ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया के संयोग ने इस आयोजन को और अधिक विशेष बना दिया, जिससे दर्शनार्थियों की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से अधिक रही।

महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती भारत के सबसे प्राचीन और विशिष्ट धार्मिक अनुष्ठानों में से एक मानी जाती है, जो द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक इस तीर्थस्थल की पहचान को और गहरा करती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक और पर्यटन पहचान का केंद्र भी है। सोमवार और विशेष तिथियों के संयोग पर उमड़ने वाली भीड़ यह दर्शाती है कि श्रद्धालुओं की आस्था और मंदिर प्रबंधन की व्यवस्था दोनों पर एक साथ ध्यान देना आवश्यक है। गौरतलब है कि महाकाल लोक परियोजना के बाद से दर्शनार्थियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो बुनियादी ढाँचे और भीड़ प्रबंधन के लिए नई चुनौतियाँ भी प्रस्तुत करती है।
RashtraPress
18 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती क्या है?
भस्म आरती उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर का सबसे पवित्र और प्राचीन दैनिक अनुष्ठान है, जिसमें गोहरी, पीपल, पलाश, शमी और बेल जैसे पवित्र वृक्षों की लकड़ियों की राख से बाबा महाकाल की आरती की जाती है। यह आरती प्रतिदिन भोर में संपन्न होती है और भगवान के निराकार-से-साकार रूप में प्रकट होने की मान्यता से जुड़ी है।
ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया पर भस्म आरती क्यों विशेष होती है?
ज्येष्ठ माह का शुक्ल पक्ष शैव परंपरा में विशेष महत्व रखता है। इस तिथि पर सोमवार का संयोग होने से श्रद्धालुओं की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना बढ़ जाती है, क्योंकि सोमवार भगवान शिव को समर्पित दिन माना जाता है।
महाकालेश्वर भस्म आरती में महिलाओं के लिए क्या नियम है?
मान्यता के अनुसार भस्म आरती के समय भगवान महाकाल निराकार रूप में होते हैं, इसलिए महिलाओं को इस आरती को सीधे देखने की अनुमति नहीं होती। वे घूंघट या ओढ़नी डालकर दर्शन लाभ लेती हैं।
महाकालेश्वर मंदिर में आज का श्रृंगार कैसा था?
18 मई को बाबा महाकाल के मुखारविंद को भांग से सजाया गया और माथे पर त्रिपुंड व दो चंद्रमा सुसज्जित किए गए। नवीन मुकुट धारण कराकर ताज़े बिल्वपत्र और रंग-बिरंगी पुष्पमालाएँ अर्पित की गईं।
महाकाल के 'निराकार से साकार' रूप का क्या अर्थ है?
यह शिव के उस आध्यात्मिक और दार्शनिक रूपांतरण को दर्शाता है जिसमें अनंत, रूपहीन और सर्वव्यापी परमात्मा (निराकार) भक्तों के कल्याण के लिए एक निश्चित और पूजनीय स्वरूप (साकार) में प्रकट होते हैं। भस्म आरती इसी दिव्य संक्रमण का प्रतीक मानी जाती है।
राष्ट्र प्रेस
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