चैत्र शुक्ल द्वादशी पर महाकाल की भस्म आरती में श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़
सारांश
Key Takeaways
- भस्म आरती का आयोजन चैत्र शुक्ल द्वादशी पर होता है।
- हजारों भक्त लाभान्वित होते हैं।
- पंचामृत से स्नान का महत्व है।
- आरती वैराग्य और मृत्यु का प्रतीक है।
- महाकाल का विशेष श्रृंगार भक्तों को आकर्षित करता है।
उज्जैन, 30 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। चैत्र शुक्ल पक्ष के द्वादशी तिथि पर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में सोमवार सुबह 4 बजे आयोजित होने वाली विश्व प्रसिद्ध भस्म आरती में हजारों भक्तों ने भाग लिया। बाबा महाकाल की विशेष आरती को देखने के लिए भक्तों की भीड़ सुबह से ही उमड़ पड़ी।
इस अवसर पर मंदिर का परिसर भक्ति और आस्था से भर गया, जहां श्रद्धालुओं ने पूरे श्रद्धा भाव से बाबा महाकाल के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
सोमवार को महाकाल की आरती विशेष रही, क्योंकि आरती के बाद बाबा ने किए गए श्रृंगार में सभी को दर्शन दिए।
नियमानुसार, सबसे पहले बाबा के पट खोले गए और ब्रह्म मुहूर्त में महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा पहले बाबा का जलाभिषेक किया गया, इसके बाद पंचामृत से स्नान करवाया गया। इस पंचामृत में शुद्ध दूध, ताजा दही, देसी घी, शक्कर, शहद और विभिन्न फलों का रस शामिल था। अभिषेक के बाद भस्म आरती का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें बाबा को भस्म चढ़ाई गई और आरती की गई। इसमें महाकाल भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं, जिसमें वे सिर्फ भस्म से स्नान करते हैं।
यह आरती वैराग्य और मृत्यु के सत्य का प्रतीक है। बाबा पर चढ़ने वाली भस्म कपिला गाय के कंडों की राख, पलाश, बड़, पीपल और बेर की लकड़ियों को जलाकर विशेष रूप से तैयार की जाती है। आरती के दौरान शिवलिंग पर लगभग ढाई किलो भस्म चढ़ाई जाती है, जिससे बाबा महाकाल को जगाने की परंपरा पूरी की जाती है।
इसके बाद महाकाल का विशेष श्रृंगार किया गया। इसमें बाबा के माथे पर मुकुट धारण किया गया और चांदी का सुंदर त्रिपुंड लगाया गया, जिसने उनकी शोभा को चार चांद लगा दिए। फिर फूलों की मालाएं, बेलपत्र, चंदन और अन्य पूजा सामग्री से बाबा को सजाया गया।
जब बाबा का शृंगार पूरा होता है, तो भक्त उनके अद्भुत रूप के दर्शन करते हैं। बाबा के इस रूप को साकार स्वरूप माना जाता है। बाबा के इस श्रृंगार के बाद कपूर की आरती की गई और उसके बाद उन्हें भोग अर्पित किया गया।