26 अक्टूबर 2026
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उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में आश्विन पूर्णिमा पर भस्म आरती, त्रिपुंड शृंगार से भक्त भावविभोर

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उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में आश्विन पूर्णिमा पर भस्म आरती, त्रिपुंड शृंगार से भक्त भावविभोर

सारांश

उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में आश्विन पूर्णिमा के संयोग पर सोमवार को बाबा महाकाल की भस्म आरती और त्रिपुंड शृंगार ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। पंचामृत अभिषेक, ढोल-नगाड़े और 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष के बीच मंदिर परिसर आस्था से सराबोर रहा।

मुख्य बातें

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में 26 अक्टूबर 2026 को आश्विन पूर्णिमा पर विशेष भस्म आरती संपन्न हुई।
बाबा महाकाल के मस्तक पर त्रिपुंड लगाकर फूलों से दिव्य शृंगार किया गया।
भोर में भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के बाद ढोल-नगाड़ों के साथ कपाट खोले गए और पंचामृत अभिषेक हुआ।
परंपरानुसार महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से भस्म आरती अर्पित की गई।
रात से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु कतारबद्ध होकर बाबा के दर्शन के लिए उपस्थित रहे।

उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर में आश्विन पूर्णिमा के पावन अवसर पर सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को बाबा महाकाल की विशेष भस्म आरती संपन्न हुई। बाबा महाकाल के मस्तक पर त्रिपुंड लगाकर फूलों से दिव्य शृंगार किया गया, जिसे देख मंदिर में उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।

भोर में खुले कपाट, ढोल-नगाड़ों से गूंजा परिसर

सोमवार की भोर में पहले भगवान वीरभद्र की आज्ञा ली गई, जिसके पश्चात ढोल-नगाड़ों की गूँज के बीच बाबा महाकाल के कपाट खोले गए। मंदिर परिसर तत्काल घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार से गुंजायमान हो उठा। 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से समूचा परिसर आस्था और श्रद्धा के वातावरण में डूब गया।

पंचामृत अभिषेक और दिव्य शृंगार

कपाट खुलते ही मंत्रोच्चार के मध्य भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से तैयार पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। पूजन के दौरान प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया और कपूर की आरती के पश्चात बाबा महाकाल ने मुकुट धारण किया।

भस्म आरती की परंपरा और महानिर्वाणी अखाड़े की भूमिका

परंपरा के अनुसार, महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म आरती अर्पित की जाती है। झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद के साथ यह भस्म आरती संपन्न हुई। मान्यता है कि भस्म अर्पित किए जाने के पश्चात बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं — यही अनूठी आस्था हज़ारों श्रद्धालुओं को उज्जैन की पावन नगरी तक खींच लाती है।

आश्विन पूर्णिमा पर उमड़े श्रद्धालु

रात से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा के दर्शन की प्रतीक्षा में कतारबद्ध हो गए थे। आश्विन पूर्णिमा का संयोग सोमवार के साथ होने से इस अवसर का महत्व और भी बढ़ गया। बाबा महाकाल का आज का त्रिपुंड शृंगार विशेष रूप से आकर्षक रहा — भक्तों का कहना था कि बाबा अपने इस दिव्य स्वरूप में मुस्कुराते प्रतीत हो रहे थे। आगामी पर्वों पर भी इसी प्रकार विशेष आरती और शृंगार के आयोजन की परंपरा जारी रहने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारत की जीवंत मंदिर-संस्कृति का प्रतिबिंब है जो हर पर्व पर लाखों श्रद्धालुओं को एकत्र करती है। आश्विन पूर्णिमा और सोमवार के दुर्लभ संयोग ने इस आयोजन को और महत्वपूर्ण बना दिया। गौरतलब है कि महाकालेश्वर मंदिर प्राधिकरण के बढ़ते प्रबंधन और डिजिटल बुकिंग व्यवस्था ने दर्शन की सुलभता बढ़ाई है, फिर भी विशेष पर्वों पर भीड़ प्रबंधन एक सतत चुनौती बनी रहती है। आस्था और व्यवस्था के इस संतुलन पर ध्यान देना ज़रूरी है।
RashtraPress
26 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकाल भस्म आरती क्या है और यह क्यों विशेष है?
भस्म आरती उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में भोर में की जाने वाली अनूठी आरती है, जिसमें बाबा महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है। मान्यता है कि भस्म अर्पण के पश्चात भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं, जो इसे देश की सबसे दुर्लभ धार्मिक परंपराओं में से एक बनाता है।
आश्विन पूर्णिमा पर महाकालेश्वर मंदिर में क्या विशेष हुआ?
26 अक्टूबर 2026 को आश्विन पूर्णिमा पर बाबा महाकाल के मस्तक पर त्रिपुंड लगाकर फूलों से दिव्य शृंगार किया गया और भस्म आरती संपन्न हुई। पंचामृत अभिषेक, ढोल-नगाड़े और शंखनाद के बीच बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने इस अलौकिक दृश्य के दर्शन किए।
महानिर्वाणी अखाड़े की भस्म आरती में क्या भूमिका है?
परंपरा के अनुसार महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म आरती अर्पित की जाती है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और इसे महाकालेश्वर मंदिर की धार्मिक व्यवस्था का अभिन्न अंग माना जाता है।
महाकाल की भस्म आरती में दर्शन के लिए कैसे जाएँ?
महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन, मध्य प्रदेश में स्थित है। भस्म आरती भोर में आयोजित होती है और इसके लिए पूर्व बुकिंग करानी होती है। विशेष पर्वों जैसे पूर्णिमा पर श्रद्धालु रात से ही कतार में लग जाते हैं, इसलिए समय पर पहुँचना आवश्यक है।
त्रिपुंड शृंगार का क्या महत्व है?
त्रिपुंड भगवान शिव का प्रमुख चिह्न है — ललाट पर तीन क्षैतिज रेखाओं के रूप में भस्म या चंदन से बनाया जाता है। यह त्रिदेव, तीन गुण और शिव के तीन नेत्रों का प्रतीक माना जाता है। महाकाल के मस्तक पर त्रिपुंड लगाना पूजन की सर्वोच्च परंपराओं में से एक है।
राष्ट्र प्रेस
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