लिकटेंस्टीन के प्रिंस एलोइस मुंबई पहुंचे, PM मोदी से मंगलवार को द्विपक्षीय बैठक
सारांश
मुख्य बातें
लिकटेंस्टीन के कार्यवाहक राष्ट्राध्यक्ष और वंशानुगत राजकुमार प्रिंस एलोइस ने 26 अक्टूबर 2026 को अपनी भारत राजकीय यात्रा की शुरुआत मुंबई से की। मुंबई हवाई अड्डे पर उनका स्वागत महाराष्ट्र सरकार के प्रोटोकॉल मंत्री जयकुमार रावल ने किया। विदेश मंत्रालय (MEA) ने सोमवार को इसकी आधिकारिक जानकारी दी।
दौरे का कार्यक्रम और प्रमुख बैठकें
विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रिंस एलोइस 28 अक्टूबर 2026 तक भारत में रहेंगे। उनके साथ उनकी पत्नी प्रिंसेस सोफी, लिकटेंस्टीन की उप प्रधानमंत्री सबीने मोनाउनी, वरिष्ठ अधिकारी तथा एक उच्चस्तरीय कारोबारी प्रतिनिधिमंडल भी आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रिंस एलोइस के बीच द्विपक्षीय वार्ता मंगलवार को नई दिल्ली स्थित हैदराबाद हाउस में निर्धारित है।
दोनों नेता क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रम पर भी विचार-विमर्श करेंगे। इसके अलावा, प्रिंस एलोइस राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात करेंगे, जो उनके सम्मान में एक आधिकारिक भोज की मेजबानी करेंगी। विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी इस दौरान उनसे मिलेंगे।
भारत-लिकटेंस्टीन संबंधों की पृष्ठभूमि
भारत और लिकटेंस्टीन ने 1993 में औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए थे। प्रिंस एलोइस इससे पहले नवंबर 2010 और अक्टूबर 2018 में भारत की आधिकारिक यात्राएँ कर चुके हैं। 2013 में वे अपने पिता प्रिंस हंस-एडम द्वितीय के साथ निजी यात्रा पर भी भारत आए थे। गौरतलब है कि फरवरी 2026 में उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित भारत AI इम्पैक्ट समिट में भाग लिया था और उस दौरान प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की थी।
आर्थिक सहयोग की संभावनाएँ
इस यात्रा में उच्चस्तरीय राजनयिक संपर्क के साथ-साथ कारोबारी प्रतिनिधिमंडल की उपस्थिति को दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई दिशा देने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लिकटेंस्टीन अपनी विशेषीकृत विनिर्माण, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए जाना जाता है, जो भारतीय उद्योगों के साथ सहयोग के नए अवसर पैदा कर सकती है। दूसरी ओर, भारत का विशाल बाज़ार और उत्पादन क्षमता लिकटेंस्टीन की कंपनियों के लिए विस्तार की राह खोलती है।
क्या होगा आगे
प्रिंस एलोइस की यह यात्रा 28 अक्टूबर 2026 तक चलेगी। हैदराबाद हाउस में होने वाली द्विपक्षीय बैठक के बाद दोनों देशों के बीच किसी समझौते या संयुक्त वक्तव्य की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यह ऐसे समय में आया है जब भारत यूरोपीय देशों के साथ अपने तकनीकी और औद्योगिक सहयोग को तेज़ी से आगे बढ़ा रहा है।