नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में निधन, पुणे के 'नानाची वाडी' में आज शाम अंतिम संस्कार
सारांश
मुख्य बातें
दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है। उनका अंतिम संस्कार 8 अक्टूबर 2026 की शाम पुणे के डोनजे इलाके में स्थित उनके निवास 'नानाची वाडी' के निकट किया जाएगा। इस दुखद समाचार के बाद पूरे महाराष्ट्र और भारतीय फिल्म उद्योग में शोक की गहरी लहर छा गई है।
अंतिम दर्शन और अंतिम संस्कार की व्यवस्था
महाराष्ट्र सरकार की ओर से अंतिम संस्कार की तैयारियाँ की जा रही हैं। जिला कलेक्टर और प्रशासनिक अधिकारियों की देखरेख में सुरक्षा व अन्य इंतज़ाम किए गए हैं, क्योंकि बड़ी संख्या में प्रशंसकों और शुभचिंतकों के पहुँचने की संभावना है। 'नानाची वाडी' के बाहर भारी तादाद में प्रशंसक जमा हो चुके हैं और नम आँखों से अपने प्रिय अभिनेता के अंतिम दर्शन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जो भी व्यक्ति अंतिम दर्शन करना चाहता है, वह शाम 6 से 7 बजे के बीच पुणे स्थित उनके निवास पर पहुँच सकता है।
नाम फाउंडेशन का शोक — 'सिर से उठ गई सुरक्षा की छत्रछाया'
नाम फाउंडेशन के सीईओ गणेश थोरात ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा, 'नाना साहब हमारे लिए और पूरे महाराष्ट्र के लिए पिता समान थे। जब भी महाराष्ट्र में किसी भी व्यक्ति पर कोई मुसीबत आती थी, तो सबसे पहले मदद का हाथ नाना साहब ही आगे बढ़ाते थे। आज उन्हें खोने के बाद ऐसा लग रहा है जैसे हमारे सिर से सुरक्षा की छत्रछाया उठ गई हो।'
थोरात ने आगे कहा कि नाना साहब का परिवार पूरा महाराष्ट्र है और इस दुख की घड़ी में सभी को एकजुट रहने की जरूरत है। उनका सपना था कि महाराष्ट्र का हर परिवार खुशहाल रहे और किसी पर भी दुख की छाया न पड़े। गौरतलब है कि नाना पाटेकर महाराष्ट्र में मौजूदा सूखे की स्थिति पर भी लगातार सक्रिय रूप से काम कर रहे थे।
करीब पाँच दशक का दमदार सिनेमाई सफर
नाना पाटेकर ने अपने करीब पाँच दशक लंबे करियर में अनगिनत यादगार किरदार निभाए। 1990 में आई फिल्म 'राजू बन गया जेंटलमैन' में उन्होंने एक दार्शनिक और मार्गदर्शक की भूमिका निभाई, जिसके लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के लिए नामांकित किया गया था।
1992 में आई फिल्म 'अंगार' में 'माजिद खान' की भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ खलनायक का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसके बाद 1994 में 'क्रांतिवीर' में उनकी अभिनय प्रतिभा को देश ने राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया — जो उनके असाधारण कौशल का प्रमाण था।
महाराष्ट्र और फिल्म जगत पर असर
नाना पाटेकर केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सामाजिक चेतना के प्रतीक थे। नाम फाउंडेशन के ज़रिये वे किसानों और ज़रूरतमंदों की मदद के लिए वर्षों से काम करते रहे। यह ऐसे समय में आया है जब राज्य में सूखे की स्थिति गहरी है और उनकी अनुपस्थिति इस सामाजिक कार्य के लिए एक बड़ा खालीपन छोड़ती है।
आगे की राह
अंतिम संस्कार के बाद नाम फाउंडेशन की भविष्य की कार्यप्रणाली और नेतृत्व को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। थोरात ने संकेत दिया कि नाना साहब की विरासत को आगे बढ़ाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। भारतीय सिनेमा और महाराष्ट्र की जनता ने एक ऐसी शख्सियत खोई है जो पर्दे और पर्दे के बाहर — दोनों जगह — समान रूप से जीवंत थी।