14 अक्टूबर 2026
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आरएसएस प्रचारक कृष्ण अवतार मारपीट मामला: एनएचआरसी ने राजस्थान के मुख्य सचिव और डीजीपी को दो सप्ताह में रिपोर्ट तलब की

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आरएसएस प्रचारक कृष्ण अवतार मारपीट मामला: एनएचआरसी ने राजस्थान के मुख्य सचिव और डीजीपी को दो सप्ताह में रिपोर्ट तलब की

सारांश

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने आरएसएस के सांभर जिला प्रचारक कृष्ण अवतार के साथ जयपुर के नारायणा थाने में कथित पुलिस बर्बरता के मामले में राजस्थान के मुख्य सचिव और डीजीपी को नोटिस जारी किया। आयोग ने छह पुलिसकर्मियों के निलंबन के बावजूद स्वतंत्र आपराधिक जाँच, सबूत सुरक्षित रखने और पीड़ित को अंतरिम राहत देने के निर्देश दिए हैं।

मुख्य बातें

एनएचआरसी ने 13 अक्टूबर 2026 को राजस्थान के मुख्य सचिव वी.
श्रीनिवास और डीजीपी राजीव कुमार शर्मा को नोटिस जारी किया।
आरएसएस के सांभर जिला प्रचारक कृष्ण अवतार के साथ नारायणा थाने में कथित हिरासत में यातना और बर्बरता का आरोप है।
शिकायत में एसएचओ उमराव सिंह सहित छह पुलिसकर्मियों की संलिप्तता का आरोप; छह को निलंबित भी किया जा चुका है।
पीड़ित को एसएमएस अस्पताल, जयपुर में भर्ती कराया गया; आयोग ने सीसीटीवी फुटेज और सभी दस्तावेज तत्काल सुरक्षित रखने के निर्देश दिए।
एनएचआरसी ने स्पष्ट किया कि विभागीय निलंबन आपराधिक जाँच का विकल्प नहीं; दोनों अधिकारियों को दो सप्ताह में एटीआर प्रस्तुत करनी होगी।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने 13 अक्टूबर 2026 को राजस्थान के जयपुर ग्रामीण जिले के नारायणा थाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सांभर जिला प्रचारक कृष्ण अवतार के साथ कथित हिरासत में यातना और पुलिस बर्बरता के मामले का संज्ञान लेते हुए राजस्थान के मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) राजीव कुमार शर्मा को नोटिस जारी किए। दोनों वरिष्ठ अधिकारियों को दो सप्ताह के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट (एटीआर) सौंपने का निर्देश दिया गया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह शिकायत लीगल राइट्स ऑब्जर्वेटरी (एलआरओ) के संयोजक विनय जोशी ने दायर की है। शिकायत के अनुसार, एक शनिवार रात कृष्ण अवतार फुलेरा जा रहे थे, तभी पुलिसकर्मियों ने उन्हें कथित तौर पर जबरन हिरासत में ले लिया और बाद में नारायणा थाने में उनके साथ गंभीर मारपीट की।

शिकायत में आरोप है कि यह कथित हमला थाना प्रभारी (एसएचओ) उमराव सिंह के निर्देश पर किया गया, जिसमें उप निरीक्षक ओंकार सिंह और अन्य पुलिसकर्मी अजय, रमेश, कुलदीप, महिपाल और विनोद शामिल थे। शिकायत के अनुसार, पीड़ित के कपड़े जबरन उतरवाए गए, हाथ-पैर बांधे गए और उनके निजी अंगों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया।

यह भी कथित तौर पर बताया गया है कि मारपीट के दौरान कृष्ण अवतार बेहोश हो गए थे और होश में आने के बाद भी हिंसा जारी रही। घायल अवस्था में उन्हें पहले एक स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया और बाद में जयपुर के सवाई मानसिंह (एसएमएस) अस्पताल में भर्ती कराया गया।

एनएचआरसी की कार्रवाई का आधार

एनएचआरसी सदस्य प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 12 के तहत इस मामले में संज्ञान लिया। आयोग ने कहा कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानव गरिमा के अधिकार का गंभीर उल्लंघन होगा।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि कई पुलिस अधिकारियों की कथित संलिप्तता, हमले की गंभीरता, पीड़ित का बेहोश होना और अस्पताल में भर्ती होना — ये सभी परिस्थितियाँ निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध जाँच की माँग करती हैं। एनएचआरसी ने स्पष्ट रूप से कहा: 'जहां संज्ञेय अपराध के आरोप हों, वहां केवल निलंबन को आपराधिक जाँच और जवाबदेही का विकल्प नहीं माना जा सकता।'

डीजीपी से मांगी गई जानकारी

डीजीपी राजीव कुमार शर्मा से हिरासत में लेने की परिस्थितियाँ, समय, कारण, कानूनी अधिकार, दर्ज एफआईआर या शिकायत, तथा गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े नियमों के पालन का विस्तृत विवरण माँगा गया है। साथ ही जबरन कपड़े उतरवाने, शारीरिक रूप से बाँधने, बार-बार मारपीट और निजी अंगों पर चोट के आरोपों की भी जाँच करने के निर्देश दिए गए हैं।

आयोग ने सीसीटीवी फुटेज — थाने के प्रवेश और निकास द्वार, गलियारों और लॉकअप क्षेत्र की — तुरंत सुरक्षित रखने का आदेश दिया है। स्टेशन डायरी, हिरासत रिकॉर्ड, ड्यूटी रोस्टर, वाहन मूवमेंट रिकॉर्ड और आधिकारिक संचार भी सुरक्षित रखने के निर्देश दिए गए हैं। विशेष रूप से यह भी कहा गया कि यदि कोई सीसीटीवी फुटेज गायब, डिलीट या अनुपलब्ध है तो उसके कारणों और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।

मुख्य सचिव को निर्देश

मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास को निर्देश दिया गया है कि पीड़ित को तत्काल उचित चिकित्सा उपचार, विशेष स्वास्थ्य सेवाएँ और पुनर्वास उपलब्ध कराया जाए तथा उनकी स्वास्थ्य स्थिति की निरंतर निगरानी हो। राज्य सरकार को पीड़ित और उनके परिवार को पर्याप्त सुरक्षा देने, आवश्यक राहत उपलब्ध कराने और अंतरिम मुआवजे की संभावना पर विचार करने को भी कहा गया है।

मुख्य सचिव को प्रशासनिक जवाबदेही तय करने, पर्यवेक्षण संबंधी लापरवाही और कथित हिरासत हिंसा को रोकने या रिपोर्ट करने में विफल रहे अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का भी निर्देश दिया गया है।

आगे की कार्रवाई

गौरतलब है कि इस मामले में छह पुलिसकर्मियों के निलंबन की खबर का एनएचआरसी ने संज्ञान लिया है, परंतु आयोग ने स्पष्ट किया कि विभागीय कार्रवाई के समानांतर आपराधिक जाँच भी अनिवार्य है। आयोग ने कृष्ण अवतार, उनके परिवार और गवाहों को धमकी, दबाव या हस्तक्षेप से बचाने के उपायों की भी जानकारी माँगी है। दोनों अधिकारियों को आपराधिक और विभागीय कार्रवाई, चिकित्सा सहायता, पीड़ित संरक्षण, मुआवजे और सुधारात्मक कदमों से संबंधित सभी दस्तावेजों सहित अपनी-अपनी रिपोर्ट दो सप्ताह के भीतर प्रस्तुत करनी होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि हर्जाना भी भरना पड़ सकता है।
RashtraPress
14 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एनएचआरसी ने राजस्थान को नोटिस क्यों जारी किया?
एनएचआरसी ने आरएसएस के सांभर जिला प्रचारक कृष्ण अवतार के साथ जयपुर ग्रामीण जिले के नारायणा थाने में कथित हिरासत में यातना और पुलिस बर्बरता के मामले में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 12 के तहत संज्ञान लिया। राजस्थान के मुख्य सचिव और डीजीपी को दो सप्ताह में कार्रवाई रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।
कृष्ण अवतार के साथ क्या हुआ था?
शिकायत के अनुसार, शनिवार रात कृष्ण अवतार को फुलेरा जाते समय पुलिसकर्मियों ने कथित तौर पर जबरन हिरासत में लिया और नारायणा थाने में गंभीर मारपीट की। आरोप है कि उनके कपड़े जबरन उतरवाए गए, हाथ-पैर बांधे गए और वे बेहोश भी हो गए; बाद में उन्हें एसएमएस अस्पताल, जयपुर में भर्ती कराया गया।
इस मामले में एनएचआरसी ने क्या निर्देश दिए हैं?
आयोग ने डीजीपी को हिरासत की परिस्थितियाँ, एफआईआर की स्थिति और नामित पुलिसकर्मियों की भूमिका स्पष्ट करने को कहा है। सीसीटीवी फुटेज, स्टेशन डायरी और सभी संबंधित दस्तावेज तत्काल सुरक्षित रखने, तथा पीड़ित को चिकित्सा सहायता व अंतरिम मुआवजे पर विचार करने के भी निर्देश दिए गए हैं।
क्या इस मामले में पुलिसकर्मियों पर कोई कार्रवाई हुई है?
एनएचआरसी ने छह पुलिसकर्मियों के निलंबन की खबर का संज्ञान लिया है। हालाँकि, आयोग ने स्पष्ट किया कि केवल निलंबन आपराधिक जाँच का विकल्प नहीं है और विभागीय कार्रवाई के समानांतर स्वतंत्र आपराधिक जाँच भी अनिवार्य है।
यह मामला संवैधानिक दृष्टि से कितना गंभीर है?
एनएचआरसी के अनुसार, यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानव गरिमा के अधिकार का गंभीर उल्लंघन होगा। आयोग ने यह भी कहा कि नागरिकों की रक्षा के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों द्वारा हिरासत में हिंसा को केवल विभागीय अनुशासनहीनता मानकर नहीं छोड़ा जा सकता।
राष्ट्र प्रेस
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