18 अक्टूबर 2026
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तेजस्वी यादव की माँग: नियोजित शिक्षकों की सेवा बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हो पुनर्विचार याचिका

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तेजस्वी यादव की माँग: नियोजित शिक्षकों की सेवा बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हो पुनर्विचार याचिका

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय के जुलाई 2026 के आदेश के बाद बिहार के हजारों नियोजित शिक्षकों की नौकरी खतरे में है। तेजस्वी यादव ने CM सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर तत्काल पुनर्विचार याचिका और सेवा समाप्ति पर रोक की माँग की है — सवाल यह है कि सरकार कब तक चुप रहेगी।

मुख्य बातें

तेजस्वी यादव ने 17 अक्टूबर 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर नियोजित शिक्षकों की सेवा सुरक्षा की माँग की।
सर्वोच्च न्यायालय के 28 जुलाई 2026 के आदेश और प्राथमिक शिक्षा निदेशक के 1 अक्टूबर 2026 के पत्र के बाद 31 मार्च 2015 के बाद नियुक्त अप्रशिक्षित शिक्षकों की सेवाओं पर संकट उत्पन्न हुआ।
वर्ष 2015-16 में नियुक्त उर्दू और बांग्ला विशेष शिक्षकों में भी भय और असमंजस की स्थिति है।
तेजस्वी ने तर्क दिया कि नियोजन अभिलेखों में गड़बड़ी की जिम्मेदारी नियोजन इकाइयों की है, शिक्षकों की नहीं।
राजद नेता ने पुनर्विचार याचिका के निर्णय तक वेतन रोकने, सेवा समाप्ति और बर्खास्तगी पर तत्काल रोक की माँग की।

बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव ने 17 अक्टूबर 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर राज्य के नियोजित शिक्षकों की सेवा सुरक्षा सुनिश्चित करने की तत्काल माँग की है। उन्होंने सरकार से सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने और प्रभावित शिक्षकों की सेवा समाप्ति तथा वेतन रोकने की कार्रवाई पर अविलंब रोक लगाने के स्पष्ट निर्देश जारी करने का आग्रह किया है।

संकट की जड़: सुप्रीम कोर्ट का आदेश और निदेशालय का पत्र

तेजस्वी यादव ने अपने पत्र में रेखांकित किया कि सर्वोच्च न्यायालय के 28 जुलाई 2026 के आदेश और प्राथमिक शिक्षा निदेशक के 1 अक्टूबर 2026 के पत्र के बाद बिहार के हजारों नियोजित शिक्षकों — विशेष रूप से 31 मार्च 2015 के बाद नियुक्त अप्रशिक्षित शिक्षकों — की सेवाओं पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। इस स्थिति ने वर्ष 2015-16 में नियुक्त उर्दू और बांग्ला विशेष शिक्षकों के बीच भी भय और असमंजस का वातावरण बना दिया है।

गौरतलब है कि उर्दू और बांग्ला विशेष शिक्षकों का नियोजन कोई स्वतंत्र प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि वर्ष 2014 में शुरू हुई नियोजन प्रक्रिया की निरंतरता में न्यायिक आदेशों और विभागीय निर्देशों के अनुपालन में हुआ था। ऐसे में केवल 31 मार्च 2015 के बाद नियुक्ति की तिथि के आधार पर इन शिक्षकों को सेवा समाप्ति के दायरे में लाना न्यायसंगत नहीं है — यह तर्क राजद नेता ने अपने पत्र में विस्तार से रखा।

प्रशिक्षित और परीक्षा-उत्तीर्ण शिक्षकों पर भी खतरा

तेजस्वी यादव ने ध्यान दिलाया कि प्रभावित शिक्षकों में कई ऐसे भी हैं जो प्रशिक्षण पूरा कर चुके हैं, सक्षमता परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं और वर्तमान में विशिष्ट शिक्षक, प्रधान शिक्षक अथवा विद्यालय अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने इन शिक्षकों की वर्तमान योग्यता और पदस्थापना को ध्यान में रखते हुए उन्हें संरक्षण देने की माँग की।

यह ऐसे समय में आया है जब बिहार में शिक्षा व्यवस्था पहले से ही शिक्षकों की कमी और गुणवत्ता संबंधी सवालों से जूझ रही है। अनुभवी और प्रशिक्षित शिक्षकों की सामूहिक बर्खास्तगी इस संकट को और गहरा सकती है।

प्रशासनिक चूक की सजा शिक्षकों को नहीं: तेजस्वी

राजद नेता ने एक महत्वपूर्ण तर्क उठाते हुए कहा कि यदि किसी शिक्षक के नियोजन अभिलेख या मेधा सूची में कोई कमी है, तो उसकी जिम्मेदारी संबंधित नियोजन इकाइयों और अधिकारियों की है। प्रशासनिक त्रुटियों की सजा शिक्षकों और उनके परिवारों को देना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने ऐसी गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की भी माँग की।

सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की अपील

तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से आग्रह किया कि पुनर्विचार याचिका पर अंतिम निर्णय आने तक वेतन रोकने, सेवा समाप्त करने और बर्खास्तगी की किसी भी कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाई जाए। साथ ही, जरूरत पड़ने पर नियमावली में संशोधन सहित अन्य वैधानिक उपाय भी किए जाएँ।

उन्होंने कहा कि हजारों शिक्षक परिवारों का भविष्य अनिश्चितता में है और सरकार को मानवीय, न्यायिक तथा प्रशासनिक — तीनों पहलुओं पर विचार कर तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए, ताकि किसी भी शिक्षक के साथ अन्याय न हो। यह मामला अब केवल रोजगार सुरक्षा का नहीं, बल्कि राज्य की शैक्षिक निरंतरता का भी प्रश्न बन चुका है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसके केंद्र में एक असली प्रशासनिक विफलता है — नियोजन इकाइयों की लापरवाही की कीमत शिक्षकों और उनके परिवारों को चुकानी पड़ रही है। सरकार के पास विकल्प सीमित हैं: या तो सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करे या नियमावली संशोधन का रास्ता अपनाए। दोनों में देरी का अर्थ होगा हजारों शिक्षकों की आजीविका का अंत। मुख्यधारा की कवरेज जो चूक रही है वह यह है कि यह मामला केवल रोजगार का नहीं — बिहार के सरकारी स्कूलों में शिक्षण की निरंतरता का भी सवाल है, जो पहले से ही शिक्षक-छात्र अनुपात के गंभीर असंतुलन से जूझ रहे हैं।
RashtraPress
18 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बिहार नियोजित शिक्षकों की सेवा पर संकट क्यों आया?
सर्वोच्च न्यायालय के 28 जुलाई 2026 के आदेश और प्राथमिक शिक्षा निदेशक के 1 अक्टूबर 2026 के पत्र के बाद 31 मार्च 2015 के बाद नियुक्त अप्रशिक्षित नियोजित शिक्षकों की सेवाओं पर संकट उत्पन्न हो गया है। इससे वर्ष 2015-16 में नियुक्त उर्दू और बांग्ला विशेष शिक्षक भी प्रभावित हो रहे हैं।
तेजस्वी यादव ने सरकार से क्या माँग की है?
तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर सर्वोच्च न्यायालय में तत्काल पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की माँग की है। साथ ही, पुनर्विचार याचिका पर निर्णय आने तक वेतन रोकने, सेवा समाप्त करने और बर्खास्तगी की कार्रवाई पर अविलंब रोक लगाने के निर्देश जारी करने का आग्रह किया है।
उर्दू और बांग्ला विशेष शिक्षक इस संकट से कैसे प्रभावित हैं?
वर्ष 2015-16 में नियुक्त उर्दू और बांग्ला विशेष शिक्षकों में भी सेवा समाप्ति का डर बना हुआ है। तेजस्वी यादव के अनुसार, इनका नियोजन 2014 में शुरू हुई प्रक्रिया की निरंतरता में न्यायिक और विभागीय निर्देशों के अनुपालन में हुआ था, इसलिए इन्हें केवल तिथि के आधार पर सेवा समाप्ति के दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए।
क्या प्रशिक्षित और परीक्षा उत्तीर्ण शिक्षकों की सेवा भी खतरे में है?
हाँ, तेजस्वी यादव के अनुसार प्रभावित शिक्षकों में कई ऐसे भी हैं जो प्रशिक्षण पूरा कर चुके हैं, सक्षमता परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं और वर्तमान में विशिष्ट शिक्षक, प्रधान शिक्षक अथवा विद्यालय अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने इनकी वर्तमान योग्यता को देखते हुए संरक्षण देने की माँग की है।
नियोजन अभिलेखों में गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार कौन है?
तेजस्वी यादव के अनुसार, नियोजन अभिलेख या मेधा सूची में किसी भी कमी की जिम्मेदारी संबंधित नियोजन इकाइयों और अधिकारियों की है, न कि शिक्षकों की। उन्होंने ऐसी प्रशासनिक त्रुटियों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की भी माँग की है।
राष्ट्र प्रेस
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