17 अक्टूबर 2026
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एनएलएसआईयू के 34वें दीक्षांत समारोह में चीफ जस्टिस सूर्यकांत का संदेश: न्याय, नैतिकता और साहस से बनें 'उम्मीद के अग्रदूत'

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एनएलएसआईयू के 34वें दीक्षांत समारोह में चीफ जस्टिस सूर्यकांत का संदेश: न्याय, नैतिकता और साहस से बनें 'उम्मीद के अग्रदूत'

सारांश

बेंगलुरु के एनएलएसआईयू में 34वें दीक्षांत समारोह में चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने विधि स्नातकों को सिर्फ डिग्री नहीं, जिम्मेदारी सौंपी — न्याय, नैतिकता और साहस के साथ 'उम्मीद के अग्रदूत' बनने का आह्वान करते हुए कानून को एक जीवंत संवाद बताया।

मुख्य बातें

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने 17 अक्टूबर 2026 को एनएलएसआईयू के 34वें दीक्षांत समारोह में विधि स्नातकों को संबोधित किया।
समारोह बेंगलुरु के पैलेस रोड स्थित ज्ञान ज्योति ऑडिटोरियम में आयोजित हुआ।
चीफ जस्टिस ने कहा — कानूनी शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यपुस्तकें नहीं, बल्कि न्याय की रक्षा और समाज की सेवा होनी चाहिए।
उन्होंने कानून को एक 'जीवंत संवाद' बताया और नैतिक जिम्मेदारी, बौद्धिक स्वतंत्रता व साहस पर बल दिया।
स्नातकों से आग्रह किया — समझौते और शॉर्टकट से बचें, 'उम्मीद के अग्रदूत' बनें और राष्ट्र के प्रति समर्पित रहें।
एनएलएसआईयू को 'पूर्व का हार्वर्ड' बताते हुए संस्थान की जिम्मेदारियों पर प्रकाश डाला।

भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने 17 अक्टूबर 2026 को बेंगलुरु के पैलेस रोड स्थित ज्ञान ज्योति ऑडिटोरियम में आयोजित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआईयू) के 34वें वार्षिक दीक्षांत समारोह में विधि स्नातकों को संबोधित किया और उन्हें कानूनी पेशे में नैतिकता, साहस एवं सामाजिक उत्तरदायित्व का पालन करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कानूनी शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों और केस कानूनों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसका उद्देश्य न्याय की रक्षा करना और समाज की सेवा करना होना चाहिए।

समारोह का आयोजन और पृष्ठभूमि

एनएलएसआईयू, जिसे 'पूर्व का हार्वर्ड' कहा जाता है, भारत के अग्रणी विधि संस्थानों में से एक है। 34वाँ दीक्षांत समारोह शनिवार को बेंगलुरु के ज्ञान ज्योति ऑडिटोरियम में आयोजित हुआ, जिसमें विधि स्नातकों ने अपनी शैक्षणिक यात्रा का समापन किया। चीफ जस्टिस ने स्नातकों को उनकी उपलब्धियों के लिए बधाई देते हुए कहा कि इस प्रतिष्ठित संस्थान से मिली शिक्षा के साथ बड़ी जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी हैं।

चीफ जस्टिस का मुख्य संदेश

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्नातकों से आग्रह किया कि वे किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले दूसरों की बात ध्यान से सुनें, किसी व्यक्ति और उसके पद के बीच के अंतर को समझें, तथा किसी की गरिमा को आहत किए बिना असहमति व्यक्त करना सीखें। उन्होंने कहा कि कानूनी पेशे में नैतिक जिम्मेदारी, बौद्धिक स्वतंत्रता और उन लोगों की आवाज़ सुनने की क्षमता अनिवार्य है जिनकी बात अक्सर अनसुनी रह जाती है।

उन्होंने कानून को एक 'जीवंत संवाद' की संज्ञा दी और कहा कि वकीलों की दलीलें, अनुबंध, सलाह और अदालती फैसले मिलकर न्याय की एक व्यापक संरचना का निर्माण करते हैं, जो 'न्याय की एक सुरीली धुन' बनाती है।

कानून की जीवंत प्रकृति पर विचार

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने रेखांकित किया कि कानून स्थिर नहीं होता, बल्कि इसे अपनाने वालों की सोच और कार्यों से निरंतर विकसित होता है। उन्होंने कानूनी सफर की तुलना एक नदी से करते हुए कहा कि यह प्राचीन ज्ञान के पहाड़ी स्रोतों से निकलकर, कानूनी मिसालों और सिद्धांतों की धाराओं से गुज़रते हुए, कानूनी पेशे के विशाल और अनिश्चित समुद्र में जा मिलती है। उन्होंने अलग-अलग पृष्ठभूमि, मान्यताओं और दृष्टिकोण वाले लोगों के साथ संवाद के महत्व को भी रेखांकित किया।

नैतिकता और प्रतिबद्धता पर बल

चीफ जस्टिस ने स्नातकों को चेताया कि जब उनके सामने समझौता करने, आसान रास्ता चुनने या शॉर्टकट अपनाने के अवसर आएँ, तो वे अपने संस्थान से मिले मूल्यों पर अडिग रहें। उन्होंने एनएलएसआईयू की एक दिवंगत पूर्व छात्रा को श्रद्धांजलि दी और उनके परिवार व मित्रों के प्रति संवेदना व्यक्त की। साथ ही, उन्होंने स्नातकों को तराशने में उनके माता-पिता के त्याग और संस्थान की फैकल्टी व स्टाफ के योगदान को सराहा।

स्नातकों से अंतिम आह्वान

समारोह के समापन में चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्नातकों से 'उम्मीद के अग्रदूत' बनने का आग्रह किया — अपने करियर में ऊँचाइयाँ हासिल करते हुए समाज में सार्थक योगदान दें और राष्ट्र के प्रति समर्पित रहें। यह संबोधन उस समय आया है जब देश की न्यायपालिका सार्वजनिक विश्वास और संस्थागत जवाबदेही पर व्यापक विमर्श के दौर से गुज़र रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

नीति-निर्माण और कॉर्पोरेट जगत में प्रभावशाली भूमिकाएँ निभाते हैं, इसलिए उन्हें दिया गया नैतिकता का संदेश महज औपचारिकता नहीं है। गौरतलब है कि कानूनी पेशे में 'शॉर्टकट' और 'समझौते' की जो चेतावनी दी गई, वह उस संस्थागत वास्तविकता की ओर भी इशारा करती है जिसमें ये स्नातक काम करेंगे। असली परीक्षा यह होगी कि संस्थान से मिले ये मूल्य व्यवहार में कितने टिकाऊ साबित होते हैं।
RashtraPress
17 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एनएलएसआईयू का 34वाँ दीक्षांत समारोह कहाँ और कब हुआ?
एनएलएसआईयू का 34वाँ वार्षिक दीक्षांत समारोह 17 अक्टूबर 2026 को बेंगलुरु के पैलेस रोड स्थित ज्ञान ज्योति ऑडिटोरियम में आयोजित हुआ। इसमें भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने विधि स्नातकों को क्या संदेश दिया?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्नातकों से आग्रह किया कि वे नैतिक जिम्मेदारी, बौद्धिक स्वतंत्रता और साहस के साथ कानूनी पेशे में प्रवेश करें। उन्होंने कहा कि कानूनी शिक्षा का उद्देश्य न्याय की रक्षा, स्वतंत्रता की सुरक्षा और समाज की सेवा होना चाहिए।
चीफ जस्टिस ने कानून को किस रूप में परिभाषित किया?
उन्होंने कानून को एक 'जीवंत संवाद' बताया, जो इसे अपनाने वालों की सोच और कार्यों से निरंतर विकसित होता है। उन्होंने इसे एक नदी की उपमा दी जो प्राचीन ज्ञान से निकलकर कानूनी पेशे के विशाल समुद्र में मिलती है।
एनएलएसआईयू को 'पूर्व का हार्वर्ड' क्यों कहा जाता है?
नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु, भारत के सबसे प्रतिष्ठित विधि संस्थानों में से एक है, जहाँ से देश के शीर्ष न्यायविद, नीति-निर्माता और कॉर्पोरेट वकील निकले हैं। इसी उत्कृष्टता के कारण इसे 'पूर्व का हार्वर्ड' की उपाधि दी गई है।
स्नातकों से 'उम्मीद के अग्रदूत' बनने का आह्वान क्यों किया गया?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्नातकों से अपेक्षा जताई कि वे अपने करियर में ऊँचाइयाँ हासिल करने के साथ-साथ समाज में सार्थक योगदान दें और राष्ट्र के प्रति समर्पित रहें। उन्होंने कहा कि एनएलएसआईयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से मिली शिक्षा के साथ यह जिम्मेदारी और भी बड़ी हो जाती है।
राष्ट्र प्रेस
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