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गाजा के 36 में से केवल 17 अस्पताल चालू, फिलिस्तीनी राजदूत अबू शावेश को भारत से बड़ी मेडिकल मदद की उम्मीद

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गाजा के 36 में से केवल 17 अस्पताल चालू, फिलिस्तीनी राजदूत अबू शावेश को भारत से बड़ी मेडिकल मदद की उम्मीद

सारांश

गाजा के 36 में से केवल 17 अस्पताल आंशिक रूप से चालू हैं और युद्धविराम के बाद भी 1,000 से अधिक फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं। फिलिस्तीनी राजदूत अबू शावेश ने कहा कि भारत सरकार से बड़ी मेडिकल मदद मिलने के संकेत हैं और वेस्ट बैंक में अस्पताल परियोजना भी जल्द शुरू होगी।

मुख्य बातें

गाजा के 36 अस्पतालों में से केवल 17 आंशिक रूप से काम कर रहे हैं — फिलिस्तीनी राजदूत अब्दुल्ला अबू शावेश के अनुसार।
पिछले अक्टूबर में युद्धविराम घोषणा के बाद से 1,000 से अधिक फिलिस्तीनी मारे गए, जिनमें 250 बच्चे शामिल हैं।
सेव द चिल्ड्रन के अनुसार लगभग 5,000 बच्चों के शव गाजा के मलबे में दबे हैं; 7 लाख छात्र दो वर्षों की पढ़ाई से वंचित।
राजदूत ने बताया कि भारतीय विदेश मंत्री ने स्वयं फोन कर सहायता का आश्वासन दिया; बड़ी मेडिकल मदद की घोषणा आसन्न।
भारत जल्द ही वेस्ट बैंक में एक अस्पताल निर्माण परियोजना शुरू करने वाला है।
राजदूत के अनुसार, अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष ने फिलिस्तीन के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय एजेंडे में पीछे धकेल दिया है।

भारत में फिलिस्तीन के राजदूत अब्दुल्ला अबू शावेश ने 26 जून 2026 को नई दिल्ली में कहा कि गाजा की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है और उन्हें पूरा विश्वास है कि भारत सरकार बहुत जल्द बड़ी चिकित्सा सहायता भेजेगी। राजदूत के अनुसार, गाजा के 36 अस्पतालों में से केवल 17 ही आंशिक रूप से काम कर रहे हैं, और पिछले अक्टूबर में युद्धविराम की घोषणा के बाद से 1,000 से अधिक फिलिस्तीनियों की मौत हो चुकी है।

गाजा की मानवीय स्थिति

अबू शावेश ने कहा कि इजरायली युद्ध को लगभग 1,000 दिन पूरे होने को हैं और इस दौरान गाजा का पूरा बुनियादी ढाँचा तबाह हो चुका है। उन्होंने बताया कि युद्धविराम के बाद मारे गए 1,000 से अधिक फिलिस्तीनियों में 250 बच्चे शामिल हैं। सेव द चिल्ड्रन के अनुसार, लगभग 5,000 बच्चों के शव अभी भी मलबे के नीचे दबे हुए हैं। इसके अलावा लगभग 7 लाख फिलिस्तीनी छात्र दो वर्षों की पढ़ाई से वंचित हो चुके हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने हाल ही में एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है, जिसमें इजरायली हमलों से प्रभावित बच्चों और उनके बचपन के नुकसान का विस्तार से उल्लेख किया गया है। राजदूत ने स्पष्ट किया कि भूख और खाद्य संकट की समस्या कुछ महीने पहले की तुलना में कम हुई है, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

भारत से चिकित्सा सहायता की उम्मीद

राजदूत अबू शावेश ने बताया कि उन्होंने हाल ही में भारतीय विदेश मंत्रालय के एक मंत्री से मुलाकात की, जिन्होंने पूरी कोशिश करने का भरोसा दिलाया। उन्होंने यह भी बताया कि विदेश मंत्री की ओर से स्वयं उन्हें फोन आया था। उनके अनुसार, 'प्रक्रिया जारी है' और वे भारतीय दूतावास या विदेश मंत्रालय से बड़ी सहायता मिलने के काफी करीब हैं।

गौरतलब है कि इजरायली युद्ध शुरू होने के बाद से भारत पहले भी फिलिस्तीन को दवाइयाँ और मेडिकल सामान भेज चुका है। राजदूत ने बताया कि न केवल भारत सरकार, बल्कि कई भारतीय नागरिक और संस्थाएँ भी सहायता के लिए संपर्क कर रही हैं।

भारत-फिलिस्तीन संबंध और वेस्ट बैंक अस्पताल परियोजना

राजदूत ने भारत के दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन की सराहना की और कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन से जुड़े प्रस्तावों के पक्ष में मतदान करता रहा है। उन्होंने एक महत्वपूर्ण जानकारी साझा की कि भारत जल्द ही वेस्ट बैंक में एक अस्पताल निर्माण परियोजना शुरू करने वाला है।

यह कदम भारत की उस दीर्घकालिक नीति के अनुरूप है जिसमें वह फिलिस्तीन में विकास परियोजनाओं के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहा है। आलोचकों का कहना है कि भारत को इजरायल और फिलिस्तीन दोनों के साथ संबंध बनाए रखने की अपनी नीति के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।

अंतरराष्ट्रीय एजेंडे में फिलिस्तीन का मुद्दा

राजदूत अबू शावेश ने माना कि अमेरिका-इजरायल-ईरान के बीच के हालिया संघर्ष ने फिलिस्तीन के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय प्राथमिकता सूची में पीछे धकेल दिया है। उन्होंने कहा कि तीन महीने पहले तक पूरी दुनिया में फिलिस्तीनी संघर्ष सबसे अधिक चर्चित विषय था, लेकिन अब वैश्विक ध्यान अन्य दिशाओं में बँट गया है।

उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अपील की कि वे फिलिस्तीन में मानवीय और कानूनी स्थिति को दर्ज करती विस्तृत व प्रमाणित रिपोर्टें जारी करते रहें, ताकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर दबाव बना रहे।

आगे की राह

राजदूत अबू शावेश के बयान से संकेत मिलता है कि भारत और फिलिस्तीन के बीच मेडिकल सहायता को लेकर राजनयिक बातचीत अंतिम चरण में है। वेस्ट बैंक अस्पताल परियोजना की घोषणा भारत-फिलिस्तीन संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकती है, और आने वाले सप्ताहों में औपचारिक घोषणा की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन गाजा की स्वास्थ्य व्यवस्था का लगातार ढहना यह सवाल खड़ा करता है कि क्या द्विपक्षीय मदद की रफ्तार संकट की गहराई के अनुपात में है। वेस्ट बैंक अस्पताल परियोजना भारत की 'विकास-केंद्रित कूटनीति' का हिस्सा है, लेकिन जब तक गाजा में युद्धविराम स्थायी नहीं होता, ऐसी परियोजनाएँ प्रतीकात्मक ही रहेंगी। यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत इजरायल के साथ भी रक्षा और व्यापारिक संबंध बनाए हुए है, जो उसकी 'संतुलन नीति' को जटिल बनाता है और घरेलू स्तर पर भी आलोचना का विषय बनता है।
RashtraPress
26 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गाजा में अभी कितने अस्पताल काम कर रहे हैं?
फिलिस्तीनी राजदूत अब्दुल्ला अबू शावेश के अनुसार, गाजा के 36 अस्पतालों में से केवल लगभग 17 ही आंशिक रूप से काम कर रहे हैं। बाकी अस्पताल इजरायली युद्ध में हुई तबाही के कारण पूरी तरह बंद हो चुके हैं।
भारत फिलिस्तीन को क्या मेडिकल सहायता देने वाला है?
राजदूत अबू शावेश ने बताया कि भारतीय विदेश मंत्री ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से फोन कर सहायता का आश्वासन दिया है और प्रक्रिया अंतिम चरण में है। इसके तहत दवाइयाँ, चिकित्सा उपकरण और अन्य जरूरी सामान भेजे जाने की उम्मीद है, हालाँकि आधिकारिक घोषणा अभी बाकी है।
वेस्ट बैंक में भारत का अस्पताल प्रोजेक्ट क्या है?
राजदूत के अनुसार, भारत जल्द ही वेस्ट बैंक क्षेत्र में एक अस्पताल निर्माण परियोजना शुरू करने वाला है। यह भारत-फिलिस्तीन विकास सहयोग का हिस्सा होगा, हालाँकि परियोजना की आधिकारिक घोषणा अभी नहीं हुई है।
युद्धविराम के बाद भी गाजा में कितने लोग मारे गए हैं?
राजदूत अबू शावेश के अनुसार, पिछले अक्टूबर में युद्धविराम की घोषणा के बाद से अब तक 1,000 से अधिक फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं, जिनमें 250 बच्चे शामिल हैं। सेव द चिल्ड्रन के अनुसार लगभग 5,000 बच्चों के शव गाजा के मलबे में दबे हुए हैं।
फिलिस्तीन का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय एजेंडे में पीछे क्यों चला गया?
राजदूत अबू शावेश ने कहा कि अमेरिका-इजरायल-ईरान के बीच हालिया संघर्ष ने वैश्विक ध्यान फिलिस्तीन के मुद्दे से हटा दिया है। उनके अनुसार, तीन महीने पहले तक फिलिस्तीनी संघर्ष दुनिया में सबसे अधिक चर्चित विषय था, लेकिन अब यह प्राथमिकता सूची में पीछे चला गया है।
राष्ट्र प्रेस
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