28 अक्टूबर 2026
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मां ज्वाल्पा देवी सिद्ध पीठ, पौड़ी गढ़वाल: अखंड ज्योति में विराजती हैं माता रानी

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मां ज्वाल्पा देवी सिद्ध पीठ, पौड़ी गढ़वाल: अखंड ज्योति में विराजती हैं माता रानी

सारांश

पौड़ी गढ़वाल की पहाड़ियों में नयार नदी के किनारे बसी मां ज्वाल्पा देवी सिद्ध पीठ में देवी की पूजा मूर्ति नहीं, बल्कि सदियों से जल रही अखंड ज्योति के रूप में होती है — एक ऐसी परंपरा जो स्कंदपुराण की पौराणिक कथाओं और 1892 में स्थापित इस मंदिर की जड़ों को जोड़ती है।

मुख्य बातें

मां ज्वाल्पा देवी सिद्ध पीठ , पौड़ी गढ़वाल में पौड़ी-कोटद्वार मार्ग पर नयार नदी के तट पर स्थित है।
यहाँ देवी की पूजा किसी मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि अखंड ज्योति और प्राकृतिक शिला के रूप में होती है।
स्कंदपुराण के अनुसार सतयुग में शची (इंद्राणी) की तपस्या से माता पार्वती यहाँ 'ज्वाला' रूप में प्रकट हुई थीं।
वर्तमान मंदिर की स्थापना वर्ष 1892 में स्व.
दत्तराम अण्थवाल और बूथा राम अण्थवाल ने की थी।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने 28 अक्टूबर 2026 को सभी भक्तों से यहाँ दर्शन करने की अपील की।
नवरात्रों में मंदिर परिसर में भव्य मेले का आयोजन होता है; परिसर में हनुमान, शिव, काल भैरव और माँ काली के मंदिर भी हैं।

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में पौड़ी-कोटद्वार मार्ग पर नयार नदी के तट पर स्थित मां ज्वाल्पा देवी सिद्ध पीठ उत्तराखंड की सबसे प्रतिष्ठित शक्तिपीठों में गिनी जाती है। यहाँ देवी की आराधना किसी मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि गर्भगृह में प्रज्ज्वलित अखंड ज्योति और एक प्राकृतिक शिला के रूप में की जाती है। मान्यता है कि सच्चे मन से माँ के समक्ष प्रार्थना करने पर भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है।

मंदिर की विशिष्ट पूजा-पद्धति

यह मंदिर अपनी अनूठी आराधना परंपरा के कारण विशेष है — गर्भगृह में माता रानी के 'ज्वाल्पा' स्वरूप की पूजा न किसी प्रतिमा से, बल्कि अनवरत जलती अखंड दीपज्योति और प्राकृतिक शिला के माध्यम से होती है। इस दीप को प्रज्ज्वलित रखने के लिए प्राचीन काल से ही आसपास की मवालस्यूं, कफोलस्यूं, खातस्यूं जैसी पट्टियों के गाँवों से सरसों के तेल की आपूर्ति की परंपरा चली आ रही है। यह सामुदायिक योगदान इस मंदिर को क्षेत्रीय एकता का प्रतीक भी बनाता है।

पौराणिक महत्त्व और उत्पत्ति-कथा

स्कंदपुराण के अनुसार, सतयुग में दैत्यराज पुलोम की पुत्री शची (इंद्राणी) ने देवराज इंद्र को पति के रूप में पाने की कामना से इसी स्थान पर माता पार्वती की कठोर तपस्या की थी। शची की कठिन साधना से प्रसन्न होकर माता पार्वती यहाँ 'ज्वाला' (दीप्त ज्वलेश्वरी) के रूप में प्रकट हुईं और उनकी मनोकामना पूर्ण की। मान्यता है कि तभी से यह पवित्र स्थान ज्वाल्पा देवी के नाम से विख्यात हुआ।

किंवदंतियों के अनुसार, 9वीं शताब्दी में आदिगुरु शंकराचार्य ने भी इस तीर्थ की यात्रा कर यहाँ प्रार्थना और साधना की थी। वर्तमान मंदिर की स्थापना वर्ष 1892 में स्व. दत्तराम अण्थवाल और उनके पुत्र बूथा राम अण्थवाल द्वारा की गई थी।

मंदिर परिसर और अन्य देवालय

मुख्य मंदिर के परिसर में श्री हनुमान मंदिर, शिवालय, काल भैरव मंदिर और माँ काली मंदिर भी स्थित हैं, जो इसे एक सम्पूर्ण धार्मिक केंद्र का स्वरूप देते हैं। नयार नदी का प्राकृतिक सौंदर्य और पहाड़ी परिवेश तीर्थयात्रियों को अध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है।

मुख्यमंत्री की अपील और नवरात्र महोत्सव

बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने इस मंदिर के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व पर बल देते हुए सभी श्रद्धालुओं से यहाँ दर्शन करने की अपील की। नवरात्रों के अवसर पर यहाँ विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें उत्तराखंड सहित देश के विभिन्न कोनों से श्रद्धालु आते हैं।

यह सिद्ध पीठ विशेष रूप से कुंवारी कन्याओं और मनवांछित वर की कामना रखने वाले श्रद्धालुओं में अत्यंत श्रद्धा का केंद्र मानी जाती है। गढ़वाल क्षेत्र की यह आस्था की धरोहर सदियों से भक्तों को आत्मिक बल और मनोकामना-पूर्ति का विश्वास देती आ रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उत्तराखंड की उस सामुदायिक परंपरा का जीवंत उदाहरण है जहाँ आसपास के गाँव सदियों से सरसों के तेल की आपूर्ति कर अखंड दीप प्रज्ज्वलित रखते आए हैं। यह स्थानीय भागीदारी इसे राज्य-संचालित मंदिरों से अलग और जनसमुदाय से जुड़ा बनाती है। मुख्यमंत्री की अपील धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की व्यापक राज्य रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है, परंतु असली प्रश्न यह है कि बढ़ती भीड़ के साथ इस धरोहर की मौलिकता और परिवेश की पवित्रता कैसे बनाए रखी जाए।
RashtraPress
28 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मां ज्वाल्पा देवी मंदिर कहाँ स्थित है?
मां ज्वाल्पा देवी सिद्ध पीठ उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में पौड़ी-कोटद्वार मार्ग पर नयार नदी के किनारे स्थित है। यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक महत्त्व दोनों के लिए जाना जाता है।
ज्वाल्पा देवी मंदिर में माता की पूजा किस रूप में होती है?
यहाँ माता रानी की पूजा किसी मूर्ति के माध्यम से नहीं, बल्कि गर्भगृह में जल रही अखंड ज्योति और एक प्राकृतिक शिला के रूप में होती है। इस अखंड दीप को प्रज्ज्वलित रखने के लिए प्राचीन काल से आसपास के गाँवों से सरसों के तेल की व्यवस्था की जाती है।
ज्वाल्पा देवी नाम कैसे पड़ा?
स्कंदपुराण के अनुसार सतयुग में दैत्यराज पुलोम की पुत्री शची (इंद्राणी) ने यहाँ माता पार्वती की कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर माता 'ज्वाला' (दीप्त ज्वलेश्वरी) के रूप में प्रकट हुईं। तभी से यह स्थान ज्वाल्पा देवी के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
वर्तमान मंदिर की स्थापना कब और किसने की?
वर्तमान स्वरूप वाले मंदिर की स्थापना वर्ष 1892 में स्व. दत्तराम अण्थवाल और उनके पुत्र बूथा राम अण्थवाल द्वारा की गई थी। किंवदंतियों के अनुसार 9वीं शताब्दी में आदिगुरु शंकराचार्य ने भी इस स्थान की यात्रा कर यहाँ साधना की थी।
ज्वाल्पा देवी मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
नवरात्रों के अवसर पर यहाँ भव्य मेले का आयोजन होता है, जो दर्शन के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण समय माना जाता है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने भी 28 अक्टूबर 2026 को सभी भक्तों से यहाँ दर्शन करने की अपील की।
राष्ट्र प्रेस
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