12 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

प्रयाग शुक्ल की कविताएं: हिंदी साहित्य के 'स्टिल लाइफ' कवि का 28 मई को जन्मदिन

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
प्रयाग शुक्ल की कविताएं: हिंदी साहित्य के 'स्टिल लाइफ' कवि का 28 मई को जन्मदिन

सारांश

28 मई को जन्मे प्रयाग शुक्ल हिंदी साहित्य के उस विरल कवि हैं जिनकी कविताओं को कला-समीक्षकों ने 'स्टिल लाइफ' कहा। कवि, कला-समीक्षक, अनुवादक और संपादक — एक साथ इन सभी भूमिकाओं में उन्होंने हिंदी साहित्य को वह गरिमामय स्वर दिया जो आज भी अनुकरणीय है।

मुख्य बातें

प्रयाग शुक्ल का जन्म 28 मई 1940 को कोलकाता में हुआ; हिंदी साहित्य, कला समीक्षा और अनुवाद के प्रमुख स्तंभ।
प्रमुख काव्य-कृतियाँ: 'कविता संभव' (1976) , 'यह एक दिन है' (1980) , 'यह जो हरा है' (1990) ; कविताओं को कला-समीक्षकों ने 'स्टिल लाइफ' कहा।
नेशनल बुक ट्रस्ट प्रकाशित 'बंकिमचंद्र: प्रतिनिधि निबंध' (1995) के अनुवाद के लिए साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार (1999) से सम्मानित।
रवींद्रनाथ ठाकुर की 'गीतांजलि' का मूल बांग्ला से हिंदी अनुवाद; जीवनानन्द दास , शंख घोष , ओक्ताविया पॉज और होसे रिसाल की कृतियों का भी अनुवाद।
NSD की पत्रिका 'रंगप्रसंग' और संगीत नाटक अकादमी की 'संगना' के संस्थापक संपादक; 'दिनमान' , 'नवभारत टाइम्स' में भी संपादकीय योगदान।
मध्य प्रदेश सरकार का राष्ट्रीय शरद जोशी सम्मान (2002) , द्विजदेव सम्मान और श्रीनरेश मेहता वाङ्मय स्मृति सम्मान से भी अलंकृत।

हिंदी साहित्य, कला समीक्षा और अनुवाद के अप्रतिम साधक प्रयाग शुक्ल का जन्म 28 मई 1940 को कोलकाता के एक प्रबुद्ध और महानगरीय परिवेश में हुआ था। उनकी कविता 'अब मैं नहीं याद करता तुम्हें' हिंदी काव्य-संसार में एक विशिष्ट पहचान रखती है — शांत, संयत, और मानवीय गरिमा से आपूर्ण। कला-समीक्षकों ने उनकी रचनाओं को चित्रकला की भाषा में 'स्टिल लाइफ' की संज्ञा दी है।

काव्य-संसार: ठहराव की शक्ति

1960 के दशक से अपनी काव्य-यात्रा आरंभ करने वाले प्रयाग शुक्ल ने 'कविता संभव' (1976), 'यह एक दिन है' (1980), और 'यह जो हरा है' (1990) जैसी कृतियों के माध्यम से हिंदी कविता को एक नया स्वर दिया। उनकी कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता उनका 'ठहराव' है — वह शांति जो पाठक को भीतर से छू जाती है।

'नौकरी', 'समय न था', 'बारिश', 'दरवाजा' जैसी कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा अनुभव होता है, मानो कोई सुंदर दृश्य कागज पर आकर विश्राम कर रहा हो। गौरतलब है कि यह वह दौर था जब हिंदी कविता में वैचारिक आंदोलनों का शोर था — प्रयाग शुक्ल ने उस शोर के बीच मौन की भाषा चुनी।

कला समीक्षा में अग्रणी योगदान

हिंदी पत्रकारिता में ललित कलाओं की समीक्षा को एक प्रतिष्ठित और गंभीर विधा के रूप में स्थापित करने का श्रेय प्रयाग शुक्ल को दिया जाता है। मात्र 23 वर्ष की आयु में चित्रकला की दुनिया से जुड़ने वाले प्रयाग शुक्ल का मानना है कि कलाकृतियों को देखना भी एक साधना है।

दैनिक समाचार पत्र जनसत्ता में उनका पाक्षिक स्तंभ 'सम्मुख' कला-जगत का एक जीवंत दस्तावेज बन गया। एक संपादक के रूप में उन्होंने 'अज्ञेय' और रघुवीर सहाय जैसे दिग्गजों के साथ साप्ताहिक 'दिनमान' में काम किया। 'कल्पना' और 'नवभारत टाइम्स' को भी उनके संपादकीय अनुभव का लाभ मिला।

रंगमंच की दुनिया में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) की प्रसिद्ध पत्रिका 'रंगप्रसंग' और संगीत नाटक अकादमी की 'संगना' के वे संस्थापक संपादक रहे, जहाँ उन्होंने दृश्य और मंच कलाओं की समीक्षा को एक नया बौद्धिक धरातल दिया।

अनुवाद की असाधारण उपलब्धियाँ

प्रयाग शुक्ल ने अनुवाद के माध्यम से बांग्ला के श्रेष्ठ वैचारिक चिंतन को हिंदी पाठकों तक पहुँचाया। उनकी सबसे बड़ी अनुवाद-सिद्धि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के निबंधों का अनुवाद है। नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित 'बंकिमचंद्र: प्रतिनिधि निबंध' (1995) में उन्होंने बंकिम चंद्र के स्त्री-विमर्श, राष्ट्रवाद और 'प्रीति' के सिद्धांतों को इतनी सहज हिंदी में ढाला कि 1999 में उन्हें साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कालजयी कृति 'गीतांजलि' का सीधे मूल बांग्ला से हिंदी में अनुवाद किया। आधुनिक बांग्ला कविता के दो शिखरों — जीवनानन्द दास और शंख घोष — की कविताओं को हिंदी की तरलता दी। मैक्सिकन कवि ओक्ताविया पॉज और फिलीपींस के राष्ट्रीय लेखक होसे रिसाल के उपन्यास 'मुक्ति स्वप्न' को भी भारतीय पाठकों के लिए सुलभ बनाया।

सम्मान और विरासत

साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार (1999), मध्य प्रदेश सरकार का राष्ट्रीय शरद जोशी सम्मान (2002), द्विजदेव सम्मान और श्रीनरेश मेहता वाङ्मय स्मृति सम्मान जैसे अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से अलंकृत प्रयाग शुक्ल आज भी भारतीय कला और साहित्य के परिदृश्य पर एक शांत वटवृक्ष की तरह उपस्थित हैं। यह ऐसे समय में विशेष रूप से उल्लेखनीय है जब हिंदी साहित्य में कला-समीक्षा और अनुवाद जैसी विधाओं को उचित मान्यता दिलाने का संघर्ष अभी भी जारी है — प्रयाग शुक्ल उस संघर्ष के सबसे चमकदार प्रतिनिधि हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि मौन की भाषा भी उतनी ही शक्तिशाली होती है। विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति ने हिंदी में कला-समीक्षा को गंभीर विधा का दर्जा दिलाया, वह मुख्यधारा की साहित्यिक चर्चाओं में अक्सर हाशिये पर रहता है। अनुवाद को 'द्वितीयक सृजन' मानने की हिंदी आलोचना की पुरानी प्रवृत्ति के बावजूद प्रयाग शुक्ल ने साहित्य अकादमी पुरस्कार तक की यात्रा की — यह अपने आप में एक बड़ा सांस्कृतिक वक्तव्य है। उनके काम का पुनर्मूल्यांकन आज की पीढ़ी के लिए ज़रूरी है, जब वैश्विक साहित्य तक पहुँच की माँग तेज़ हो रही है।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रयाग शुक्ल कौन हैं और उनका हिंदी साहित्य में क्या योगदान है?
प्रयाग शुक्ल हिंदी के著名 कवि, कला-समीक्षक, अनुवादक और संपादक हैं, जिनका जन्म 28 मई 1940 को कोलकाता में हुआ। उन्होंने 'कविता संभव', 'यह एक दिन है' जैसी काव्य-कृतियों से हिंदी कविता को एक शांत और संयत स्वर दिया, और हिंदी पत्रकारिता में कला-समीक्षा को एक प्रतिष्ठित विधा के रूप में स्थापित किया।
प्रयाग शुक्ल की कविताओं को 'स्टिल लाइफ' क्यों कहा जाता है?
कला-समीक्षकों ने उनकी कविताओं को चित्रकला की भाषा में 'स्टिल लाइफ' कहा है, क्योंकि उनमें एक विशेष 'ठहराव' है। 'नौकरी', 'बारिश', 'दरवाजा' जैसी कविताएँ पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो कोई सुंदर दृश्य कागज पर आकर विश्राम कर रहा हो — न अतिरिक्त शोर, न नाटकीयता।
प्रयाग शुक्ल को साहित्य अकादमी पुरस्कार किस कृति के लिए मिला?
प्रयाग शुक्ल को 1999 में साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित 'बंकिमचंद्र: प्रतिनिधि निबंध' (1995) के लिए मिला। इस कृति में उन्होंने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के स्त्री-विमर्श, राष्ट्रवाद और 'प्रीति' के सिद्धांतों को सहज और मौलिक हिंदी में अनुवादित किया।
प्रयाग शुक्ल ने किन-किन पत्रिकाओं का संपादन किया?
प्रयाग शुक्ल राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) की पत्रिका 'रंगप्रसंग' और संगीत नाटक अकादमी की 'संगना' के संस्थापक संपादक रहे। इसके अलावा उन्होंने 'अज्ञेय' और रघुवीर सहाय के साथ साप्ताहिक 'दिनमान' में काम किया और 'कल्पना' व 'नवभारत टाइम्स' को भी अपने संपादकीय योगदान से समृद्ध किया।
प्रयाग शुक्ल ने किन विदेशी लेखकों की रचनाओं का हिंदी अनुवाद किया?
प्रयाग शुक्ल ने रवींद्रनाथ ठाकुर की 'गीतांजलि' का मूल बांग्ला से हिंदी में अनुवाद किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने मैक्सिकन कवि ओक्ताविया पॉज और फिलीपींस के राष्ट्रीय लेखक होसे रिसाल के उपन्यास 'मुक्ति स्वप्न' को भी भारतीय पाठकों के लिए सुलभ बनाया।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 महीने पहले
  2. 3 महीने पहले
  3. 6 महीने पहले
  4. 6 महीने पहले
  5. 6 महीने पहले
  6. 6 महीने पहले
  7. 9 महीने पहले
  8. 11 महीने पहले