20 अक्टूबर 2026
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प्रियंका चतुर्वेदी ने संजय राउत को घेरा — 'हिंसा से लोकतंत्र और संविधान को नुकसान'

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प्रियंका चतुर्वेदी ने संजय राउत को घेरा — 'हिंसा से लोकतंत्र और संविधान को नुकसान'

सारांश

शिवसेना (यूबीटी) में एक असामान्य दृश्य — प्रियंका चतुर्वेदी ने अपने ही सांसद संजय राउत को सार्वजनिक रूप से घेरा। अल्बानिया की हिंसा से भारत को 'सबक' लेने की सलाह पर उन्होंने सीधे कहा: यह रास्ता लोकतंत्र और संविधान को तोड़ता है।

मुख्य बातें

प्रियंका चतुर्वेदी ने 20 अक्टूबर 2026 को संजय राउत के अल्बानिया वाले बयान की खुलकर आलोचना की।
राउत ने एक्स पर लिखा था कि अल्बानिया में सुप्रीम कोर्ट जलाए जाने से भारत को सबक लेना चाहिए।
चतुर्वेदी ने कहा — 'हिंसा से कुछ हासिल नहीं, यह देश हित के खिलाफ है।' उन्होंने शिवसेना (यूबीटी) के शांतिपूर्ण विरोध का उदाहरण दिया — धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ प्रदर्शन और चुनाव आयोग की गरिमा की लड़ाई।
पार्टी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में भी पैरवी कर रही है।

शिवसेना (यूबीटी) नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ सांसद संजय राउत के उस बयान की कड़ी आलोचना की, जिसमें उन्होंने अल्बानिया के सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई आग का उल्लेख करते हुए कहा था कि भारत को इन घटनाओं से सबक लेना चाहिए। चतुर्वेदी ने स्पष्ट कहा कि हिंसा को किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता और यह देश के संविधान एवं लोकतंत्र के लिए घातक है।

राउत का विवादास्पद बयान

संजय राउत ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में लिखा था, 'अल्बानिया के लोगों ने सुप्रीम कोर्ट को जला दिया है। लोग इसलिए गुस्से में थे क्योंकि सुप्रीम कोर्ट भ्रष्ट प्रधानमंत्रियों की मदद कर रहा था। प्रदर्शन कर रही जनता ने संसद, सरकारी दफ्तरों और मंत्रियों के घरों पर भी हमला किया है। सभी देशों को इन घटनाओं से सबक लेना चाहिए, खासकर भारत को।' इस पोस्ट ने राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छेड़ दी।

प्रियंका चतुर्वेदी की स्पष्ट आपत्ति

चतुर्वेदी ने कहा, 'हमें बस यही सबक सीखना चाहिए कि हमें न्याय प्रणाली और कानून-व्यवस्था को अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए और इस तरह के हिंसक विरोध प्रदर्शनों से बचना चाहिए। हिंसा से कुछ हासिल नहीं होता और यह देश के हित के खिलाफ है।' उन्होंने आगे जोड़ा कि चाहे बांग्लादेश, नेपाल, अल्बानिया या फ्रांस हो — ऐसी घटनाएँ छात्रों के विरोध से शुरू होती हैं, जिसमें बाद में गलत इरादे वाले तत्व घुस आते हैं।

चतुर्वेदी ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक और संवैधानिक चिंताओं को केवल शांतिपूर्ण और कानूनी माध्यमों से उठाया जाना चाहिए — हिंसक रास्ते से नहीं।

शांतिपूर्ण विरोध का हवाला

चतुर्वेदी ने शिवसेना (यूबीटी) के विरोध प्रदर्शनों का उदाहरण देते हुए कहा, 'यह लड़ाई हमारे देश के संविधान और लोकतंत्र के लिए है। जिस तरह हमने शांतिपूर्ण विरोध के जरिए धर्मेंद्र प्रधान को उनके पद से हटाया, उसी तरह अब हम चुनाव आयोग की गरिमा बनाए रखने के लिए लड़ रहे हैं।' उन्होंने बताया कि पार्टी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में भी अपना पक्ष रख रही है।

विरोधाभास और राजनीतिक संदेश

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब शिवसेना (यूबीटी) चुनाव आयोग और न्यायपालिका से जुड़े कई संस्थागत मुद्दों पर केंद्र सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाए हुए है। चतुर्वेदी का राउत की आलोचना करना पार्टी के भीतर एक असामान्य सार्वजनिक मतभेद को दर्शाता है, हालाँकि उन्होंने इसे पार्टी के लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता के रूप में प्रस्तुत किया।

आगे क्या

चतुर्वेदी ने अंत में दोहराया, 'यह कहना कि हमें ऐसी घटनाओं से सबक लेना चाहिए या हिंसा हो सकती है — यह गलत है। इससे हमारे लोकतंत्र और संविधान को ही नुकसान पहुँचता है।' माना जा रहा है कि शिवसेना (यूबीटी) अपने संसदीय और कानूनी विरोध के रास्ते पर कायम रहेगी, जबकि राउत के बयान पर पार्टी की आधिकारिक स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन उसका निहितार्थ स्पष्ट था और चतुर्वेदी ने उसे उसी रूप में पकड़ा। यह उल्लेखनीय है कि विपक्षी दल के भीतर से ही इस तरह की सार्वजनिक असहमति सामने आई — यह दिखाता है कि 'संस्थाओं के खिलाफ आक्रोश' और 'हिंसक प्रतिरोध' के बीच की रेखा को लेकर विपक्ष एकमत नहीं है। चतुर्वेदी का यह कदम पार्टी के लिए एक ज़रूरी आत्म-नियंत्रण का संकेत है, लेकिन यह सवाल भी उठाता है कि क्या शिवसेना (यूबीटी) की आंतरिक अनुशासन-प्रक्रिया इतनी मज़बूत है जो ऐसे बयानों को जारी होने से पहले रोक सके।
RashtraPress
20 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रियंका चतुर्वेदी ने संजय राउत के किस बयान की आलोचना की?
संजय राउत ने एक्स पर पोस्ट किया था कि अल्बानिया में लोगों ने सुप्रीम कोर्ट जला दिया और भारत को इन घटनाओं से सबक लेना चाहिए। प्रियंका चतुर्वेदी ने इसे अनुचित बताते हुए कहा कि हिंसा को प्रोत्साहन देना लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ है।
प्रियंका चतुर्वेदी ने विरोध के किस तरीके को सही बताया?
चतुर्वेदी ने शांतिपूर्ण और कानूनी विरोध को सही बताया। उन्होंने कहा कि संवैधानिक और लोकतांत्रिक चिंताओं को अदालत और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के ज़रिए ही उठाया जाना चाहिए।
शिवसेना (यूबीटी) इस समय किन मुद्दों पर लड़ रही है?
पार्टी चुनाव आयोग की गरिमा बनाए रखने और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में पैरवी कर रही है। इसके अलावा धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ पहले के विरोध प्रदर्शन का भी हवाला चतुर्वेदी ने दिया।
क्या यह शिवसेना (यूबीटी) के भीतर कोई बड़ी फूट है?
चतुर्वेदी ने स्पष्ट किया कि उनकी आपत्ति हिंसा की वकालत करने वाले संदेश से है, पार्टी की नीति से नहीं। हालाँकि, किसी सांसद का सार्वजनिक रूप से अपने ही सहयोगी सांसद की आलोचना करना राजनीतिक रूप से उल्लेखनीय है।
अल्बानिया में क्या हुआ था जिसका राउत ने जिक्र किया?
राउत के अनुसार, अल्बानिया में लोगों ने सुप्रीम कोर्ट को जला दिया और संसद, सरकारी दफ्तरों तथा मंत्रियों के घरों पर हमला किया। उनका कहना था कि यह जनता का भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ गुस्सा था।
राष्ट्र प्रेस
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