क्या आप जानते हैं राधा अष्टमी के व्रत और पूजा विधि से कैसे पाएं राधा-कृष्ण का आशीर्वाद?

सारांश
Key Takeaways
- राधा अष्टमी
- इस दिन राधा-कृष्ण की पूजा से भक्तों को आशीर्वाद मिलता है।
- पूजा में तुलसी का उपयोग शुभ माना जाता है।
- अभिजीत मुहूर्त में पूजा करने का विशेष महत्व है।
- श्रद्धा और भक्ति से व्रत करने से जीवन में सुख-शांति आती है।
नई दिल्ली, 30 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी मनाई जाती है। यह पावन पर्व श्री कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक 15 दिन बाद आता है। इस दिन कई भक्त व्रत रखते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है।
दृक पंचांग के अनुसार, इस दिन सूर्य सिंह राशि में और चंद्रमा वृश्चिक राशि में रहेंगे। अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:56 बजे से शुरू होकर दोपहर 12:47 बजे तक रहेगा, जबकि राहुकाल सुबह 9:10 बजे से 10:46 बजे तक रहेगा।
यह त्योहार आमतौर पर मथुरा, वृंदावन और आसपास के ब्रज क्षेत्र में मनाया जाता है। राधा को भगवान कृष्ण की 'ह्लादिनी शक्ति' यानी आनंद देने वाली शक्ति माना जाता है। उनके बिना, कृष्ण की पूजा अधूरी मानी जाती है।
मान्यता है कि जो भक्त राधा अष्टमी के दिन पूरी श्रद्धा और भक्ति से पूजा और व्रत करते हैं, उन्हें राधा रानी और भगवान कृष्ण का आशीर्वाद मिलता है। इससे जीवन में सुख-शांति आती है और पापों का नाश होता है।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, राधा रानी का जन्म बरसाना (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनके पिता वृषभानु और माता कीर्तिदा थीं। एक प्रचलित कथा के अनुसार, राधा ने बचपन में अपनी आंखें तब तक नहीं खोलीं, जब तक उन्होंने पहली बार भगवान कृष्ण को नहीं देखा। जब कृष्ण उनके सामने आए, तब उन्होंने पहली बार अपनी आंखें खोली और मुस्कुराईं। यह घटना उनके और कृष्ण के बीच के गहरे और आध्यात्मिक संबंध को दर्शाती है।
व्रत रखने के लिए आप इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य कर्म स्नान आदि करने के बाद पूजा स्थल को साफ करें। इसके बाद आसन बिछाएं, फिर एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उसमें राधा-कृष्ण की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। अब व्रत का संकल्प लेने के बाद देवी राधा को लाल रंग के वस्त्र, फूल, श्रृंगार सामग्री और मिठाई अर्पित करें। पूजा में तुलसी दल का उपयोग करना शुभ माना जाता है क्योंकि मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण को तुलसी प्रिय है। अब राधा-कृष्ण की आरती और परिक्रमा करने के बाद 'ॐ ह्रीं श्री राधिकायै नमः' मंत्र का जाप करें। इससे विशेष फल की प्राप्ति होगी। इसके बाद आचमन कर आसन को प्रणाम कर प्रसाद ग्रहण करें।