राघव चड्ढा के भाजपा में जाने पर विपक्ष का हमला — 'दलतोड़ राजनीति' पर उठे सवाल

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राघव चड्ढा के भाजपा में जाने पर विपक्ष का हमला — 'दलतोड़ राजनीति' पर उठे सवाल

सारांश

राघव चड्ढा समेत AAP के 7 राज्यसभा सांसदों के BJP में शामिल होने पर विपक्ष ने 'दलतोड़ राजनीति' का आरोप लगाया। संजय राउत ने इसे 'बेशर्मी' कहा, तो संजय सिंह ने सभापति को पत्र लिखकर सदस्यता रद्द करने की मांग की।

Key Takeaways

  • राघव चड्ढा समेत AAP के 7 राज्यसभा सांसद 25 अप्रैल 2025 को भाजपा में शामिल हुए।
  • शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने BJP की इस राजनीति को 'बेशर्मी' करार दिया और कहा कि राघव चड्ढा खुद BJP को 'गुंडों की पार्टी' कहते थे।
  • AAP नेता संजय सिंह ने राज्यसभा सभापति को पत्र लिखकर तीनों सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग की।
  • पंजाब से AAP के एक संत-सांसद पर भी दलबदल का दबाव डाला गया, लेकिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया।
  • कांग्रेस नेता अभिषेक दत्त ने सवाल उठाया कि केजरीवाल ने असंतुष्ट नेताओं को पहले ही पार्टी से क्यों नहीं हटाया।
  • यह दलबदल 2027 पंजाब विधानसभा चुनाव और INDIA गठबंधन की एकता के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

नई दिल्ली, 25 अप्रैल 2025राघव चड्ढा समेत आम आदमी पार्टी (AAP) के कुल सात राज्यसभा सांसदों के भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने की खबर ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। विपक्षी दलों ने इस घटनाक्रम को BJP की 'दलतोड़ राजनीति' का ताज़ा उदाहरण बताते हुए कड़ी आलोचना की है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और शिवसेना (UBT) — सभी ने एकस्वर में इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक प्रवृत्ति करार दिया है।

कांग्रेस का तीखा वार — केजरीवाल पर भी उठाए सवाल

कांग्रेस नेता अभिषेक दत्त ने राष्ट्र प्रेस से बात करते हुए कहा, "वह दिन दूर नहीं जब अरविंद केजरीवाल खुद भी AAP समेत BJP में विलय कर लें।" उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब स्वाति मालीवाल और राघव चड्ढा खुलेआम पार्टी लाइन के खिलाफ बोल रहे थे, तब केजरीवाल ने उन्हें पार्टी से निलंबित या निष्कासित क्यों नहीं किया।

यह सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी अनुशासन की कमी और आंतरिक असंतोष को नज़रअंदाज़ करने की नीति ने ही अंततः इस सामूहिक दलबदल को संभव बनाया।

समाजवादी पार्टी की प्रतिक्रिया — AAP के लिए सहानुभूति, सबक भी

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष वर्मा ने कहा कि AAP इस समय एक कठिन दौर से गुज़र रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि AAP दिल्ली में एक मज़बूत विपक्ष के रूप में बनी रहे और पंजाब में 'INDIA' गठबंधन को और सुदृढ़ करे।

वर्मा ने यह भी स्वीकार किया कि यह घटनाक्रम अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम के लिए एक कड़ा सबक है — पार्टी के भीतर पारदर्शिता और आंतरिक लोकतंत्र की ज़रूरत को रेखांकित करता है।

संजय राउत का तीखा हमला — 'बेशर्मी की राजनीति'

शिवसेना (UBT) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने BJP पर सबसे तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, "BJP की राजनीति के लिए सिर्फ एक ही शब्द है — बेशर्मी।" राउत ने याद दिलाया कि कल तक राघव चड्ढा खुलेआम BJP को "गुंडों और भ्रष्ट लोगों की पार्टी" कहते थे और अब वही लोग उसी पार्टी में शामिल हो गए हैं।

राउत ने यह भी बताया कि पंजाब से AAP के एक अन्य राज्यसभा सांसद, जो एक संत और पर्यावरणविद हैं, पर भी पार्टी छोड़ने का दबाव डाला गया था, लेकिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया। यह तथ्य दर्शाता है कि यह दलबदल पूरी तरह स्वैच्छिक नहीं था — बल्कि इसके पीछे दबाव की राजनीति भी काम कर रही थी।

AAP का पलटवार — 'गद्दारों से पार्टी और मज़बूत होगी'

AAP नेता अनुराग ढांडा ने दलबदल करने वाले नेताओं की तुलना उन लोगों से की जिन्होंने अंग्रेज़ों से समझौता किया था। उन्होंने कहा, "महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस और शहीद भगत सिंह के पास भी समझौते का विकल्प था, लेकिन उन्होंने संघर्ष चुना — इसीलिए इतिहास उन्हें याद रखता है। इतिहास कभी गद्दारों को याद नहीं रखता।"

AAP के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने राज्यसभा सभापति को पत्र लिखकर मांग की है कि BJP में शामिल हुए तीनों सांसदों की सदस्यता तत्काल रद्द की जाए। उनका तर्क है कि AAP छोड़ने के बाद राज्यसभा में बने रहने का उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

गहरा विश्लेषण — दलबदल की यह लहर नई नहीं

यह घटनाक्रम अकेला नहीं है। 2019 से अब तक देश में दर्जनों विपक्षी नेता BJP में शामिल हो चुके हैं — महाराष्ट्र में शिवसेना और NCP का विभाजन इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। आलोचकों का कहना है कि ED, CBI और आयकर विभाग के छापों के बाद अचानक नेताओं का BJP में शामिल होना और मामलों का शांत हो जाना एक स्थापित पैटर्न बन चुका है।

विडंबना यह है कि राघव चड्ढा वही नेता हैं जिन्होंने 2022 के पंजाब चुनाव में AAP की ऐतिहासिक जीत में अहम भूमिका निभाई थी। उनका यह कदम पंजाब की AAP सरकार और भगवंत मान के लिए राजनीतिक रूप से एक बड़ा झटका है।

आने वाले दिनों में राज्यसभा सभापति का इस पत्र पर क्या निर्णय होता है और क्या दलबदल विरोधी कानून इन सांसदों पर लागू होगा — यह देखना महत्वपूर्ण होगा। साथ ही, पंजाब उपचुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव पर इस दलबदल का असर भी राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र में है।

Point of View

बल्कि यह उस व्यापक पैटर्न की अगली कड़ी है जिसमें जांच एजेंसियों के दबाव और सत्ता के आकर्षण के बीच विपक्षी नेता एक-एक कर सत्तारूढ़ दल की ओर खिंचते चले जाते हैं। विडंबना यह है कि जो नेता कल तक BJP को 'भ्रष्टाचार की जड़' बताते थे, वही आज उसी दल के झंडे तले खड़े हैं — और यह विरोधाभास न तो उन्हें दिखता है, न उनके नए आकाओं को। AAP की असली चुनौती अब बाहरी नहीं, आंतरिक है — पार्टी को यह समझना होगा कि जब नेता बिना परिणाम के विद्रोह कर सकते हैं, तो दलबदल अपरिहार्य हो जाता है। पंजाब 2027 की परीक्षा बताएगी कि जनता इस 'थोक दलबदल' को माफ करती है या नहीं।
NationPress
26/04/2026

Frequently Asked Questions

राघव चड्ढा भाजपा में क्यों शामिल हुए?
राघव चड्ढा ने आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया, हालांकि उन्होंने इसका आधिकारिक कारण स्पष्ट नहीं किया। विपक्षी दलों का आरोप है कि भाजपा ने दबाव और प्रलोभन की राजनीति के ज़रिए यह दलबदल कराया।
AAP के कितने सांसद भाजपा में शामिल हुए?
राघव चड्ढा समेत AAP के कुल सात राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल हुए, जिनमें से अधिकांश पंजाब से थे। इनमें से तीन पर संजय सिंह ने सदस्यता रद्द करने की मांग की है।
संजय सिंह ने राज्यसभा सभापति को क्यों पत्र लिखा?
AAP नेता संजय सिंह ने राज्यसभा सभापति को पत्र लिखकर मांग की कि भाजपा में शामिल हुए तीनों AAP सांसदों की सदस्यता तत्काल रद्द की जाए। उनका तर्क है कि पार्टी छोड़ने के बाद दलबदल विरोधी कानून के तहत उनका राज्यसभा में बने रहना अवैध है।
क्या दलबदल विरोधी कानून इन सांसदों पर लागू होगा?
यह कानूनी रूप से विचाराधीन प्रश्न है जिसका निर्णय राज्यसभा सभापति करेंगे। दलबदल विरोधी कानून तब लागू होता है जब कोई सांसद स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या पार्टी के निर्देश के विरुद्ध मतदान करता है।
इस दलबदल का पंजाब की राजनीति पर क्या असर होगा?
पंजाब में AAP की सरकार है और यह दलबदल राज्यसभा में पार्टी की ताकत को कमज़ोर करता है। 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले यह घटनाक्रम भगवंत मान सरकार की विश्वसनीयता के लिए एक राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
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