16 अक्टूबर 2026
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शारदीय नवरात्रि 2026: राजगढ़ में मिट्टी से बनी 15 फीट की कालिका प्रतिमा, 52 साल पुरानी परंपरा का निर्वाह

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शारदीय नवरात्रि 2026: राजगढ़ में मिट्टी से बनी 15 फीट की कालिका प्रतिमा, 52 साल पुरानी परंपरा का निर्वाह

सारांश

राजगढ़ के मूर्तिकार राकेश सिंह पंवार 1972 से चली आ रही पारिवारिक परंपरा को जीवित रखते हुए मिट्टी से 15 फीट की कालिका प्रतिमा बना रहे हैं — सीमेंट नहीं, सिर्फ नदी की मिट्टी, घास और वाटर कलर। यह शारदीय नवरात्रि में आस्था और लोक-कला के संगम की अनूठी मिसाल है।

मुख्य बातें

मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में महाकाल सेवा समिति, ब्यावरा ने मां कालिका की 15 फीट ऊंची हस्तनिर्मित मिट्टी की प्रतिमा स्थापित की है।
मूर्तिकार राकेश सिंह पंवार के पिता राजेंद्र सिंह पंवार ने 1972 में यह परंपरा शुरू की थी; राकेश पिछले 25-30 वर्षों से इसे जारी रखे हैं।
प्रतिमा निर्माण में दो से ढाई महीने लगते हैं; नदी की मिट्टी और घास से बनी इस मूर्ति में सीमेंट का उपयोग नहीं होता।
देवास के माता टेकरी मंदिर में नवरात्रि के छठे दिन तक 10 लाख से अधिक भक्त दर्शन कर चुके हैं।
देशभर के प्रमुख देवी मंदिरों और पंडालों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है।

शारदीय नवरात्रि 2026 के अवसर पर मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में महाकाल सेवा समिति, ब्यावरा द्वारा स्थापित मां कालिका की 15 फीट ऊंची हस्तनिर्मित मिट्टी की प्रतिमा पूरे क्षेत्र में श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। देशभर में इस महापर्व को भारी उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है, जहाँ नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है।

52 साल पुरानी पारिवारिक परंपरा

इस विशाल प्रतिमा के मूर्तिकार राकेश सिंह पंवार उर्फ गब्बू के अनुसार, ब्यावरा में माता की झाँकी सजाने की इस परंपरा की नींव 1972 में उनके पिता, स्वर्गीय राजेंद्र सिंह पंवार ने रखी थी। उस दौर में वे नवरात्रि के दौरान मां के नौ रूपों की नौ अलग-अलग झाँकियाँ अपने हाथों से तैयार करते थे। पिता के निधन के बाद पिछले करीब 25 से 30 वर्षों से राकेश इस विरासत को अनवरत आगे बढ़ा रहे हैं।

यह ऐसे समय में उल्लेखनीय है जब पारंपरिक हस्तशिल्प और लोक-कला की जगह मशीन-निर्मित प्रतिमाएँ लेती जा रही हैं। राकेश द्वारा जीवित रखी गई यह परंपरा कला और आस्था के संगम का जीवंत उदाहरण है।

निर्माण की विशेष प्रक्रिया

राकेश ने बताया कि 15 फीट की इस प्रतिमा को पूर्ण रूप देने में दो से ढाई महीने का समय लगता है। सबसे पहले नदी की मिट्टी लाई जाती है, फिर घास एकत्र कर आधारभूत ढाँचा तैयार किया जाता है। प्रतिमा में किसी भी प्रकार के सीमेंट का प्रयोग नहीं होता — यह पूर्णतः मिट्टी की बनी होती है। रंगाई का कार्य वाटर कलर से किया जाता है, जो उनके छोटे भाई की ज़िम्मेदारी है। श्रृंगार का सामान विशेष रूप से भोपाल से लाया जाता है।

गौरतलब है कि मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से बनी इस प्रतिमा का पर्यावरणीय महत्व भी है, क्योंकि यह विसर्जन के समय जल-प्रदूषण का कारण नहीं बनती।

देवास में छठे दिन उमड़ी भारी भीड़

देवास में नवरात्रि के छठे दिन माता टेकरी स्थित मां चामुंडा और मां तुलजा भवानी मंदिर में भारी भीड़ उमड़ी। हज़ारों भक्त सुबह की आरती में सम्मिलित हुए। अनेक श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने की खुशी में घुटनों के बल चलकर मंदिर पहुँचे।

मंदिर के पुजारी सुरेश नाथ ने बताया, 'आज शारदीय नवरात्रि का छठा दिन है, यहाँ देवी कात्यायनी विराजमान हैं। आज तक 10 लाख से अधिक भक्तों ने आशीर्वाद लिया है। भक्त दूर-दूर से, कई नंगे पैर चलकर आए हैं। देवी सबकी मनोकामनाएँ पूरी करती हैं।'

देशभर में नवरात्रि का माहौल

देश के प्रमुख देवी मंदिरों और पंडालों में पर्व के पहले दिन से ही भक्तों का तांता लगा हुआ है। माँ दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों — शैलपुत्री से लेकर सिद्धिदात्री तक — की पूजा इस महापर्व का मूल है। स्थानीय प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा के विशेष इंतज़ाम किए हैं।

नवरात्रि के शेष दिनों में भी भीड़ और उत्साह बना रहने की उम्मीद है, और दशमी पर विशाल शोभायात्राओं के आयोजन की तैयारियाँ जोरों पर हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस लोक-कला परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है जो आधुनिक, मशीन-निर्मित प्रतिमाओं की बाढ़ में धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है। जब पर्यावरण नियामक संस्थाएँ प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों पर प्रतिबंध लगाने की बात करती हैं, तब नदी-मिट्टी और वाटर कलर से बनी ऐसी प्रतिमाएँ उसी आदर्श का व्यावहारिक उदाहरण हैं। सवाल यह है कि जब राकेश जैसे कारीगर नहीं रहेंगे, तो क्या यह परंपरा अगली पीढ़ी तक पहुँचेगी — और क्या सरकार तथा समाज इसे संरक्षित करने की कोई ठोस कोशिश कर रहे हैं?
RashtraPress
16 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राजगढ़ की 15 फीट की कालिका प्रतिमा कैसे बनाई जाती है?
यह प्रतिमा पूरी तरह नदी की मिट्टी और घास से बनाई जाती है, जिसमें सीमेंट का कोई उपयोग नहीं होता। रंगाई वाटर कलर से की जाती है और श्रृंगार सामग्री भोपाल से मंगाई जाती है। पूरी प्रक्रिया में दो से ढाई महीने का समय लगता है।
राजगढ़ में यह प्रतिमा बनाने की परंपरा कब से चली आ रही है?
यह परंपरा 1972 में मूर्तिकार राकेश सिंह पंवार के पिता स्वर्गीय राजेंद्र सिंह पंवार ने शुरू की थी। पिता के निधन के बाद राकेश पिछले 25-30 वर्षों से इस विरासत को जीवित रखे हुए हैं।
शारदीय नवरात्रि 2026 में देवास मंदिर में कितने भक्त आए?
देवास के माता टेकरी स्थित मां चामुंडा और मां तुलजा भवानी मंदिर में नवरात्रि के छठे दिन तक 10 लाख से अधिक भक्त दर्शन-लाभ ले चुके हैं। मंदिर के पुजारी सुरेश नाथ के अनुसार, कई भक्त दूर-दूर से नंगे पैर चलकर आए हैं।
शारदीय नवरात्रि में कौन-कौन सी देवियों की पूजा होती है?
नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा होती है — शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। छठे दिन देवी कात्यायनी की आराधना की जाती है।
मिट्टी की प्रतिमाओं का पर्यावरणीय महत्व क्या है?
मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से बनी प्रतिमाएँ विसर्जन के समय जल-प्रदूषण नहीं फैलातीं, जबकि प्लास्टर ऑफ पेरिस और रासायनिक रंगों से बनी मूर्तियाँ नदियों को प्रदूषित करती हैं। राकेश सिंह पंवार की परंपरा इस दृष्टि से भी उल्लेखनीय है।
राष्ट्र प्रेस
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