रांची के पास देवड़ी गांव में है देवी काली का 700 साल पुराना 'सोलहभुजी मंदिर', बांस पर धागा बांधने से पूरी होती है मनोकामना

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रांची के पास देवड़ी गांव में है देवी काली का 700 साल पुराना 'सोलहभुजी मंदिर', बांस पर धागा बांधने से पूरी होती है मनोकामना

सारांश

रांची से महज 60 किलोमीटर दूर देवड़ी गांव में खड़ा है 700 साल पुराना देवी काली का वह मंदिर जिसे लोग 'सोलहभुजी' कहते हैं — 16 भुजाओं वाली दुर्लभ मूर्ति, बिना सीमेंट की पत्थर संरचना, और बांस पर धागा बांधने की अनोखी परंपरा इसे झारखंड का एक असाधारण तीर्थस्थल बनाती है।

मुख्य बातें

देवड़ी मंदिर झारखंड की राजधानी रांची से 60 किलोमीटर दूर देवड़ी गांव में स्थित है।
यह मंदिर देवी काली को समर्पित है और लगभग 700 वर्ष पुराना बताया जाता है।
देवी की मूर्ति में 16 भुजाएँ हैं, इसीलिए इसे 'सोलहभुजी मंदिर' भी कहा जाता है।
मंदिर बिना सीमेंट के केवल पत्थरों को फंसाकर बनाया गया है — बलुआ पत्थर पर जटिल नक्काशी।
बांस पर लाल-पीले धागे बांधने की परंपरा भक्तों की मनोकामना पूरी होने की मान्यता से जुड़ी है।
स्थानीय किंवदंती के अनुसार मंदिर का निर्माण तामार के राजा ने देवी के स्वप्न-दर्शन के बाद कराया था।

झारखंड की राजधानी रांची से मात्र 60 किलोमीटर दूर देवड़ी गांव में स्थित देवड़ी मंदिर देवी काली के एक अत्यंत दुर्लभ और प्राचीन अवतार को समर्पित है। यह मंदिर करीब 700 वर्ष पुराना बताया जाता है और झारखंड के सबसे चर्चित तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है। यहाँ बांस के ढाँचे पर लाल और पीले रंग के पवित्र धागे बांधने की अनोखी परंपरा भक्तों को दूर-दूर से खींच लाती है।

मंदिर का इतिहास और किंवदंती

स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, तामार के राजा को स्वप्न में देवी के दर्शन हुए, जिसके बाद उन्होंने जंगल में इस पवित्र स्थल की खोज की और मंदिर का निर्माण कराया। मान्यता है कि मंदिर में किसी भी प्रकार का नवीनीकरण या बदलाव करने की कोशिश करने वालों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। इसीलिए मंदिर का मूल स्वरूप आज भी पूरी तरह सुरक्षित और अछूता है — नए निर्माण कार्य मूल संरचना के आसपास ही किए गए हैं।

अद्भुत वास्तुकला और 16 भुजाओं वाली मूर्ति

देवड़ी मंदिर की वास्तुकला अपने आप में अनूठी है। इसे बिना सीमेंट या किसी जोड़ने वाले पदार्थ के केवल पत्थरों को आपस में फंसाकर बनाया गया है। बलुआ पत्थर की विशाल दीवारों पर जटिल नक्काशी की गई है, जो पौराणिक कथाओं और देवी-देवताओं की कहानियाँ बयाँ करती हैं। मंदिर का सबसे आकर्षक केंद्र देवी की 700 साल पुरानी मूर्ति है, जो लगभग तीन फीट ऊँची है। इस मूर्ति की सबसे विशेष बात यह है कि देवी की 16 भुजाएँ हैं, जो सामान्यतः देखने को नहीं मिलतीं। स्थानीय लोग इसे इसीलिए 'सोलहभुजी मंदिर' भी कहते हैं। देवी सुनहरे आभूषणों से सुसज्जित हैं और उनके हाथों में धनुष, ढाल और फूल आदि हैं।

बांस पर धागा बांधने की अनोखी परंपरा

देवड़ी मंदिर की सबसे चर्चित परंपरा बांस के ढाँचे पर धागा बांधने की है। भक्त अपनी मनोकामना लेकर यहाँ आते हैं और लाल व पीले रंग के पवित्र धागे बाँधते हैं। मान्यता है कि सच्चे दिल से बाँधा गया धागा देवी तक अर्जी पहुँचाता है और मनोकामना जरूर पूरी होती है। जब इच्छा पूरी हो जाती है, तो भक्त दोबारा मंदिर आकर विधि-विधान से धागा खोलते हैं और देवी का आभार व्यक्त करते हैं। यह परंपरा दूर-दूर से श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।

धार्मिक और पर्यटन महत्व

देवड़ी मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि ऐतिहासिक और वास्तुशिल्प की दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान है। रांची आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक इस स्थल पर अवश्य आते हैं। आसपास रांची स्टेट म्यूजियम और योगदा सत्संग सोसाइटी (रांची आश्रम) जैसे अन्य दर्शनीय स्थल भी हैं, जो यात्रा को और यादगार बनाते हैं। यह मंदिर झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत प्रमाण है।

संपादकीय दृष्टिकोण

न मुख्यधारा के पर्यटन प्रचार में। 700 साल पुरानी बिना सीमेंट की संरचना और 16 भुजाओं वाली दुर्लभ मूर्ति पुरातात्विक संरक्षण की माँग करती है, लेकिन मंदिर की 'नवीनीकरण न करने' की स्थानीय मान्यता ही विडंबनापूर्ण ढंग से इसे संरक्षित रखे हुए है। झारखंड सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को इस स्थल की विरासत की औपचारिक पहचान और दस्तावेज़ीकरण सुनिश्चित करना चाहिए, ताकि आस्था और इतिहास दोनों सुरक्षित रहें।
RashtraPress
14 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

देवड़ी मंदिर कहाँ स्थित है और कैसे पहुँचें?
देवड़ी मंदिर झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 60 किलोमीटर दूर देवड़ी गांव में स्थित है। रांची से सड़क मार्ग द्वारा यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है।
देवड़ी मंदिर में बांस पर धागा बांधने की परंपरा क्या है?
भक्त यहाँ मनोकामना लेकर आते हैं और बांस के ढाँचे पर लाल व पीले रंग के पवित्र धागे बाँधते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से बाँधे गए धागे से देवी मनोकामना पूरी करती हैं, और इच्छा पूरी होने पर भक्त विधि-विधान से धागा खोलकर आभार व्यक्त करते हैं।
देवड़ी मंदिर को 'सोलहभुजी मंदिर' क्यों कहते हैं?
इस मंदिर में देवी काली की मूर्ति में 16 भुजाएँ हैं, जो अत्यंत दुर्लभ हैं और सामान्यतः अन्य मंदिरों में नहीं देखी जातीं। इसीलिए स्थानीय लोग इसे 'सोलहभुजी मंदिर' कहते हैं।
देवड़ी मंदिर का निर्माण किसने और कब कराया था?
स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, तामार के राजा को देवी के स्वप्न में दर्शन हुए, जिसके बाद उन्होंने जंगल में इस स्थल की खोज की और मंदिर का निर्माण कराया। यह मंदिर लगभग 700 वर्ष पुराना बताया जाता है।
देवड़ी मंदिर की वास्तुकला क्यों खास है?
यह मंदिर बिना सीमेंट या किसी जोड़ने वाले पदार्थ के केवल बलुआ पत्थरों को आपस में फंसाकर बनाया गया है। दीवारों पर जटिल नक्काशी पौराणिक कथाओं को दर्शाती है और मंदिर का मूल स्वरूप आज भी अछूता बना हुआ है।
राष्ट्र प्रेस
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