कालीमठ मंदिर: देवभूमि का अद्भुत शक्तिपीठ जहां सिर्फ कुंड की होती है पूजा
सारांश
Key Takeaways
- कालीमठ मंदिर में मूर्तियां नहीं, बल्कि कुंड की पूजा होती है।
- यह मंदिर नवरात्रि की अष्टमी को ही खुलता है।
- मंदिर का संबंध मां काली के रक्तबीज राक्षस के वध से है।
- यहां महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के मंदिर हैं।
- महाकवि कालिदास ने भी यहां तपस्या की थी।
देहरादून, २६ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। देवभूमि, उत्तराखंड अपने हर कण में अनगिनत रहस्यमयी मंदिरों की छवि संजोए हुए है। इनमें से एक प्रमुख स्थल है कालीमठ मंदिर, जो केदारघाटी में स्थित है और मां काली को समर्पित है। इसे एक सिद्ध शक्तिपीठ माना जाता है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां देवी काली ने अपनी तंत्र शक्ति का अद्भुत प्रदर्शन किया और फिर यहीं अंतर्ध्यान हो गईं। मंदिर की विशेषता यह है कि यहां कोई बड़ी मूर्ति या सोने-चांदी का सिंहासन नहीं है। यहां केवल एक पवित्र कुंड है, जहां देवी मां काली का वास माना जाता है।
इस मंदिर की भव्यता और आध्यात्मिक शांति की चर्चा चारों ओर फैली हुई है। जो भी भक्त माता रानी के इस मंदिर में आता है, वह इसकी प्रशंसा किए बिना नहीं रह पाता। इसी संदर्भ में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी मंदिर की दिव्यता और भव्यता की सराहना की।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का एक शानदार वीडियो साझा किया और लिखा, "रुद्रप्रयाग जनपद की पावन भूमि पर स्थित कालीमठ मंदिर मां महाकाली को समर्पित एक अत्यंत दिव्य स्थान है। यह पावन स्थल अपनी गहन आध्यात्मिक चेतना और अलौकिक वातावरण के लिए प्रसिद्ध है। आप भी रुद्रप्रयाग आने पर इस पवित्र मंदिर के दर्शन अवश्य करें।"
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में सरस्वती नदी के तट पर स्थित यह कालीमठ मंदिर एक प्राचीन और सिद्ध शक्तिपीठ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां काली ने यहीं रक्तबीज नामक राक्षस का वध किया और फिर वे यहीं भूगर्भ (कुंड) में समा गईं। यहां मूर्ति के स्थान पर श्रीयंत्र की पूजा होती है, और यह मंदिर पूरे वर्ष में केवल नवरात्रि की अष्टमी को खुलता है, जब दिव्य शिला के दर्शन होते हैं।
मंदिर में माता रानी की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि गर्भगृह में एक चांदी की परत से ढका हुआ कुंड है, जिसे मां काली का साक्षात् रूप माना जाता है।
कहा जाता है कि जब रक्तबीज का रक्त जमीन पर गिरता था, तब नए राक्षस उत्पन्न हो रहे थे, तब मां काली ने उनका सारा रक्त पीकर यहीं पर उनका वध किया।
इस सिद्धपीठ में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के मंदिर भी स्थित हैं। यहां मां के तीन रूप- रक्तशिला, मथंगशिला और चंद्रशिला भी मौजूद हैं। यह वह पवित्र स्थान भी है जहां महाकवि कालिदास ने तपस्या की थी।