उत्तराखंड के चमत्कारी स्याही देवी मंदिर की रहस्यमय विशेषताएं और इतिहास
सारांश
Key Takeaways
- स्याही देवी मंदिर की मूर्ति का रंग दिन में तीन बार बदलता है।
- यह मंदिर कत्युरी शासनकाल में बना था।
- स्थानीय लोग इसे अपनी कुलदेवी मानते हैं।
- नवरात्रि के समय यहां विशेष पूजा का आयोजन होता है।
- इस मंदिर का प्राकृतिक वातावरण बहुत आकर्षक है।
अल्मोड़ा, १३ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। उत्तराखंड की खूबसूरत वादियां अपनी प्राकृतिक भव्यता और अद्भुत धार्मिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध हैं। इन्हीं पहाड़ों के बीच, अल्मोड़ा जिले के शीतलाखेत के निकट स्थित एक प्राचीन और चमत्कारी स्याही देवी मंदिर है, जिसे शाही देवी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
इस मंदिर के बारे में कई दिलचस्प मान्यताएं और कहानियां प्रचलित हैं, जो इसे और भी खास बनाती हैं। कहा जाता है कि यह मंदिर कत्युरी शासनकाल के दौरान स्थापित हुआ था, जिसकी प्राचीनता ९०० से १७०० वर्ष के बीच मानी जाती है। स्थानीय जनों का कहना है कि यह मंदिर केवल एक रात में बना था। कथा के अनुसार, गांववालों ने ईंटें तैयार की थीं, लेकिन उस रात हुई तेज बारिश के बावजूद अगली सुबह वे पूरी तरह पकी हुई मिलीं। इतना ही नहीं, इसे जोड़ने के लिए चूने या सीमेंट का प्रयोग नहीं किया गया, बल्कि बेल और गुड़ के मिश्रण से इसे जोड़ा गया था।
स्याही देवी को आसपास के लगभग ५२ गांवों की इष्ट देवी माना जाता है। उत्तराखंड के परिवार इन्हें अपनी कुलदेवी मानते हैं। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत जरूर पूरी होती है। यही कारण है कि दूर-दूर से श्रद्धालु इस मंदिर में माता के दर्शन करने और अपनी इच्छाएं लेकर आते हैं। नवरात्रि के समय यहां विशेष पूजा-अर्चना और भक्ति का माहौल देखने को मिलता है।
इस मंदिर की सबसे रहस्यमय बात यह है कि यहां स्थापित माता की मूर्ति का रंग दिन में तीन बार बदलता है। सुबह, दोपहर और शाम को मूर्ति का रंग अलग-अलग होता है। भक्त इसे माता की दिव्य शक्ति और जीवंत उपस्थिति का प्रतीक मानते हैं।
कहा जाता है कि वर्ष १८९८ में स्वामी विवेकानंद भी यहां आए थे और उन्होंने इस पवित्र स्थान पर ध्यान और साधना की थी। इसी कारण यह मंदिर कई संतों और साधकों की तपस्थली के रूप में प्रसिद्ध हो गया है।
मंदिर के आसपास का प्राकृतिक वातावरण भी अत्यंत आकर्षक है। चारों ओर फैले घने देवदार और बांज के जंगल, शुद्ध पहाड़ी हवा और दूर-दूर तक बिखरे हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां यहां आने वाले हर व्यक्ति को सुकून और शांति का अनुभव कराती हैं। मंदिर के पास पेड़ों का एक ऐसा प्राकृतिक समूह है, जो देखने में शेर की आकृति जैसा दिखाई देता है।