राज्यसभा दलबदल: भगवंत मान की राष्ट्रपति से मुलाकात पर चीमा का बड़ा हमला, बोले — यह सिर्फ राजनीतिक नौटंकी

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राज्यसभा दलबदल: भगवंत मान की राष्ट्रपति से मुलाकात पर चीमा का बड़ा हमला, बोले — यह सिर्फ राजनीतिक नौटंकी

सारांश

SAD नेता दलजीत सिंह चीमा ने CM भगवंत मान की राष्ट्रपति से मुलाकात को राजनीतिक नाटक बताया। संविधान की 10वीं अनुसूची का हवाला देते हुए कहा — दलबदल मामले में राष्ट्रपति का कोई विवेकाधिकार नहीं। AAP पर दोहरे मापदंड और बाहरी उम्मीदवारों को राज्यसभा टिकट देने पर भी उठाए सवाल।

Key Takeaways

  • SAD नेता दलजीत सिंह चीमा ने 25 अप्रैल 2025 को CM भगवंत मान की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात को राजनीतिक नौटंकी करार दिया।
  • संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार राज्यसभा दलबदल मामले में कार्रवाई का अधिकार संसद के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं।
  • AAP ने पंजाब में SAD के एक विधायक को तोड़कर उसे PSU अध्यक्ष बनाया था — चीमा ने इसे दोहरा मापदंड बताया।
  • चीमा ने सवाल उठाया कि AAP ने पंजाब के आम लोगों की जगह धनाढ्य बाहरी उम्मीदवारों को राज्यसभा टिकट क्यों दिया।
  • चीमा ने मान को सुझाव दिया कि वे पंजाब के राज्यपाल से नए जनादेश का अनुरोध करें, न कि दिल्ली में प्रतीकात्मक याचिकाएं दें।
  • यह विवाद 2027 पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले AAP और SAD दोनों के लिए राजनीतिक रूप से निर्णायक साबित हो सकता है।

चंडीगढ़, 25 अप्रैल: राज्यसभा दलबदल के मुद्दे पर पंजाब की राजनीति में नया तूफान आ गया है। शिरोमणि अकाली दल (SAD) के वरिष्ठ नेता दलजीत सिंह चीमा ने शनिवार, 25 अप्रैल को पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से उनकी मुलाकात एक सुनियोजित राजनीतिक नाटक है, जिसका संविधान से कोई वास्तविक संबंध नहीं।

चीमा का सीधा हमला — संविधान की दसवीं अनुसूची का हवाला

दलजीत सिंह चीमा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर पोस्ट करते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार, सांसदों के खिलाफ दलबदल विरोधी कार्रवाई का अधिकार पूरी तरह संसद के क्षेत्राधिकार में आता है। उन्होंने कहा कि इस मामले में राष्ट्रपति के पास कोई स्वतंत्र विवेकाधिकार नहीं है, इसलिए CM मान का राष्ट्रपति भवन जाना संवैधानिक दृष्टि से निरर्थक है।

चीमा ने यह भी रेखांकित किया कि दलबदल विरोधी कानून इस मामले में पूरी तरह स्पष्ट है — दो-तिहाई से अधिक सदस्यों के दलबदल की स्थिति में यह कानून अलग प्रावधान करता है, जिसे आम आदमी पारटी (AAP) जानबूझकर नजरअंदाज कर रही है।

AAP पर दोहरे मापदंड का आरोप

चीमा ने भगवंत मान सरकार को आईना दिखाते हुए याद दिलाया कि पंजाब में SAD के तीन विधायकों में से एक विधायक के AAP में शामिल होने पर न केवल मान सरकार ने उसे स्वीकार किया, बल्कि उसे एक सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (PSU) का अध्यक्ष भी बना दिया गया।

उन्होंने तर्क दिया कि जो पार्टी खुद दूसरे दलों के विधायकों को अपने पाले में खींचती है और उन्हें पद-पुरस्कार देती है, वह अब दलबदल पर संवैधानिक नैतिकता का पाठ पढ़ाने की स्थिति में नहीं है।

राज्यसभा उम्मीदवारी पर उठाया बुनियादी सवाल

SAD नेता ने AAP से एक तीखा सवाल पूछा — पंजाब के असली आम नागरिक प्रतिनिधियों की जगह अत्यंत धनाढ्य और बाहरी लोगों को राज्यसभा के लिए नामित करने का क्या मापदंड था? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि AAP ने अपनी स्थापना के समय से ही खुद को आम आदमी की पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया है।

गौरतलब है कि AAP के कुछ राज्यसभा सांसदों ने हाल ही में पार्टी से अलग रुख अपनाया, जिससे यह दलबदल विवाद उपजा। आलोचकों का कहना है कि जिन्हें पार्टी ने टिकट दिया, वे पंजाब की जमीनी राजनीति से कटे हुए थे।

जवाबदेही और नए जनादेश की मांग

चीमा ने अपने बयान में एक और तीखा सवाल उठाया — अगर जवाबदेही AAP का मूल सिद्धांत है, तो क्या नागरिकों को उन विधायकों को वापस बुलाने का अधिकार मिलना चाहिए जिन्होंने उनकी उम्मीदों को ठेस पहुंचाई? उन्होंने कहा कि AAP की जवाबदेही भी चुनिंदा और सुविधाजनक लगती है।

उन्होंने भगवंत मान को सुझाव दिया कि अगर वे सच में लोकतांत्रिक नैतिकता में विश्वास रखते हैं, तो दिल्ली में प्रतीकात्मक याचिकाएं देने के बजाय पंजाब के 'लोक भवन' जाएं और पंजाब के राज्यपाल से नए जनादेश का अनुरोध करें। चीमा के अनुसार, केवल यही कदम जनता का विश्वास वास्तव में बहाल कर सकता है — संवैधानिक दिखावे से नहीं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि और आगे की राह

यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारियां धीरे-धीरे शुरू हो रही हैं। AAP और SAD दोनों के लिए यह मुद्दा जनता के बीच अपनी छवि बनाने और बिगाड़ने का अवसर बन गया है। दलबदल विरोधी कानून की व्याख्या को लेकर यह टकराव आने वाले दिनों में और तेज होने की संभावना है, खासकर तब जब मामला राज्यसभा सभापति के समक्ष विचाराधीन है।

Point of View

राजनीतिक रूप से उतना ही गणना भरा — क्योंकि यह कदम जनता को संदेश देने के लिए है, कानूनी राहत पाने के लिए नहीं। विडंबना यह है कि जो AAP 'आम आदमी' की राजनीति का दावा करती है, उसने राज्यसभा के लिए धनाढ्य बाहरी चेहरों को चुना और अब उन्हीं के दलबदल पर संवैधानिक नैतिकता का झंडा उठा रही है। SAD का पलटवार भी पूरी तरह बेदाग नहीं — उनके अपने विधायक का AAP में जाना और पद पाना एक असुविधाजनक सच है। असली सवाल यह है कि 2027 के चुनावों से पहले पंजाब की जनता इन दोनों दलों के दोहरे मापदंडों को किस तराजू पर तौलती है।
NationPress
26/04/2026

Frequently Asked Questions

राज्यसभा दलबदल मामले में भगवंत मान राष्ट्रपति से क्यों मिले?
CM भगवंत मान राज्यसभा में AAP सांसदों के कथित दलबदल के मुद्दे पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मिले। हालांकि SAD नेता चीमा का कहना है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत यह मामला संसद के दायरे में आता है, राष्ट्रपति के पास इसमें कोई विवेकाधिकार नहीं।
दलबदल विरोधी कानून की दसवीं अनुसूची क्या कहती है?
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार, सांसदों या विधायकों के दलबदल पर कार्रवाई का अधिकार संसद या विधानसभा के पीठासीन अधिकारी के पास होता है। दो-तिहाई से अधिक सदस्यों के एकसाथ दलबदल की स्थिति में यह कानून अलग प्रावधान करता है।
दलजीत सिंह चीमा ने AAP पर दोहरे मापदंड का आरोप क्यों लगाया?
चीमा ने कहा कि AAP ने पंजाब में SAD के एक विधायक को तोड़कर अपनी पार्टी में शामिल किया और उसे PSU का अध्यक्ष बना दिया। ऐसे में AAP का दलबदल पर नैतिकता का पाठ पढ़ाना दोहरे मापदंड को दर्शाता है।
AAP ने राज्यसभा के लिए किस आधार पर उम्मीदवार चुने?
SAD नेता चीमा ने सवाल उठाया कि AAP ने पंजाब के असली आम नागरिक प्रतिनिधियों की जगह अत्यंत धनाढ्य और बाहरी व्यक्तियों को राज्यसभा का टिकट दिया। इस चुनाव के मापदंड पर AAP ने अभी तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया है।
चीमा ने भगवंत मान को क्या विकल्प सुझाया?
चीमा ने सुझाव दिया कि अगर AAP सच में लोकतांत्रिक नैतिकता में विश्वास रखती है, तो CM मान को दिल्ली में प्रतीकात्मक याचिकाएं देने के बजाय पंजाब के 'लोक भवन' जाकर राज्यपाल से नए जनादेश का अनुरोध करना चाहिए।
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