2 अक्टूबर 2026
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मोहन भागवत: राष्ट्र और धर्म एक-दूसरे के पूरक, कमज़ोर राष्ट्र में धर्म भी खतरे में

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मोहन भागवत: राष्ट्र और धर्म एक-दूसरे के पूरक, कमज़ोर राष्ट्र में धर्म भी खतरे में

सारांश

RSS सरसंघचालक मोहन भागवत ने मुंबई में दो-टूक कहा — राष्ट्र और धर्म एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। कमज़ोर राष्ट्र में धर्म खतरे में पड़ता है और धर्महीन राष्ट्र का पतन तय है। 3,000 साल की भारतीय शांति-परंपरा का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया का रास्ता भारत से निकलेगा।

मुख्य बातें

RSS सरसंघचालक मोहन भागवत ने 2 अक्टूबर 2026 को मुंबई में ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप के 14वें वार्षिक सम्मेलन को संबोधित किया।
भागवत ने कहा — 'जब राष्ट्र कमज़ोर होता है, तो धर्म पर खतरा आता है; जब धर्म का अभ्यास कमज़ोर होता है, तो राष्ट्र का पतन होता है।' उन्होंने समर्पण को 'नेक और दिव्य लक्ष्य' के लिए ज़रूरी बताते हुए इसे व्यक्ति के जीवन को सार्थक बनाने वाला कदम कहा।
भागवत के अनुसार भारत ने लगभग 3,000 साल तक बिना आक्रमण या धर्म-परिवर्तन के दुनिया को शांति का मार्ग दिखाया।
सम्मेलन में संघ के कार्यकर्ताओं और छात्रों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 2 अक्टूबर 2026 को मुंबई में ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप के 14वें वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि राष्ट्र और धर्म परस्पर अभिन्न हैं — एक के बिना दूसरे का अस्तित्व संभव नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब राष्ट्र कमज़ोर पड़ता है तो धर्म पर संकट आता है, और जब धर्म का आचरण शिथिल होता है तो राष्ट्र का पतन होता है।

समर्पण का दर्शन

भागवत ने सम्मेलन में उपस्थित कार्यकर्ताओं और छात्रों को संबोधित करते हुए समर्पण के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, 'अगर समर्पण किसी नेक और दिव्य लक्ष्य के लिए हो, किसी सुंदर कारण के लिए हो, या किसी पवित्र उद्देश्य के लिए हो, तो वह व्यक्ति के जीवन को स्वर्ग बना सकता है।'

उन्होंने आगे कहा कि ऐसे सार्थक उद्देश्य से जुड़ने का अवसर दुर्लभ है और उपस्थित लोगों को इसके लिए भाग्यशाली बताया। संघ में लाखों लोगों द्वारा बिना किसी अपेक्षा के समय और संसाधन राष्ट्र-सेवा में लगाने की परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने इसे 'जीवंत उदाहरण' बताया।

राष्ट्र और धर्म का अटूट संबंध

RSS सरसंघचालक ने राष्ट्र-धर्म के संबंध पर अपना स्पष्ट मत रखते हुए कहा, 'हमारी परंपरा में राष्ट्र और धर्म अलग नहीं हैं। राष्ट्र का उद्देश्य धर्म है, और धर्म राष्ट्र की सेवा के लिए है। दोनों आपस में जुड़े हुए हैं।' उन्होंने जोड़ा कि जब पढ़ाई के प्रति समर्पित युवा ज्ञान-परंपरा की रक्षा के लिए समय निकालते हैं, तो वह कार्य एक साथ राष्ट्रीय और धार्मिक — दोनों ही होता है।

गौरतलब है कि यह सम्मेलन गांधी जयंती के अवसर पर आयोजित हुआ, जिसमें संघ के कार्यकर्ताओं और छात्रों ने बड़ी संख्या में भागीदारी की।

विश्व में भारत की भूमिका

भागवत ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत की भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज दुनिया अतिवाद, असंतुलन और संघर्ष से जूझ रही है और आगे का रास्ता भारत से ही निकलेगा। उनके अनुसार, 'एक समय में लगभग 3,000 साल तक भारत ने बिना किसी देश को जीते, बिना किसी का धर्म परिवर्तन कराए, और बिना किसी मुद्दे पर किसी पर हमला किए, दुनिया को सुख और शांति का रास्ता दिखाया था।'

यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक मंचों पर भारत की सांस्कृतिक नेतृत्व-क्षमता को लेकर विमर्श तेज़ हो रहा है।

सम्मेलन की पृष्ठभूमि

ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप का यह 14वाँ वार्षिक सम्मेलन था, जिसमें देशभर से संघ-संबद्ध कार्यकर्ता और युवा छात्र शामिल हुए। भागवत की उपस्थिति ने आयोजन को व्यापक चर्चा का केंद्र बना दिया। संघ प्रमुख के इस तरह के संबोधन परंपरागत रूप से सांगठनिक दिशा-निर्देश के रूप में देखे जाते हैं।

आगे की दिशा

भागवत के इस संबोधन को राष्ट्रीय-सांस्कृतिक विमर्श में एक महत्त्वपूर्ण योगदान के रूप में देखा जा रहा है। संघ के सूत्रों के अनुसार, ऐसे आयोजनों का उद्देश्य समाज में सेवा-भाव और राष्ट्रीय चेतना को प्रगाढ़ करना है। आने वाले महीनों में इसी तर्ज़ पर और सम्मेलन आयोजित किए जाने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

000 वर्षों की शांति-परंपरा का आह्वान सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उस कथा को मज़बूत करता है जिसे संघ वैश्विक नेतृत्व के संदर्भ में प्रस्तुत करता रहा है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इन भाषणों को महज़ 'धार्मिक उद्बोधन' की तरह पेश करती है, जबकि इनका सांगठनिक और राजनीतिक निहितार्थ कहीं अधिक गहरा होता है। असली सवाल यह है कि युवा पीढ़ी इस 'राष्ट्र-धर्म' समन्वय को व्यावहारिक जीवन में किस रूप में आत्मसात करती है।
RashtraPress
2 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मोहन भागवत ने राष्ट्र और धर्म के बारे में क्या कहा?
भागवत ने कहा कि हमारी परंपरा में राष्ट्र और धर्म अलग नहीं हैं — दोनों परस्पर आश्रित हैं। उनके अनुसार, जब राष्ट्र कमज़ोर होता है तो धर्म पर खतरा आता है, और जब धर्म का आचरण शिथिल होता है तो राष्ट्र का पतन होता है।
यह सम्मेलन कहाँ और कब हुआ?
यह ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप का 14वाँ वार्षिक सम्मेलन था, जो 2 अक्टूबर 2026 को मुंबई में आयोजित हुआ। इसमें संघ के कार्यकर्ताओं और छात्रों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।
भागवत ने समर्पण को लेकर क्या संदेश दिया?
उन्होंने कहा कि किसी नेक, दिव्य और पवित्र उद्देश्य के लिए समर्पण व्यक्ति के जीवन को सार्थक और स्वर्ग के समान बना सकता है। उन्होंने इसे दुर्लभ अवसर बताते हुए कहा कि ऐसा सार्थक काम खोजने के लिए कई जन्मों की तपस्या करनी पड़ती है।
भागवत ने विश्व में भारत की क्या भूमिका बताई?
भागवत ने कहा कि लगभग 3,000 साल तक भारत ने बिना किसी देश को जीते, बिना धर्म-परिवर्तन कराए और बिना आक्रमण किए दुनिया को शांति का रास्ता दिखाया। उनके अनुसार आज भी विश्व को भारत से उसी मार्गदर्शन की उम्मीद है।
ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप क्या है?
यह एक संगठन है जो संघ-संबद्ध सेवा और ज्ञान-परंपरा से जुड़े कार्यों को बढ़ावा देता है। इसका 14वाँ वार्षिक सम्मेलन मुंबई में आयोजित हुआ, जिसमें RSS सरसंघचालक मोहन भागवत मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे।
राष्ट्र प्रेस
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