मोहन भागवत: राष्ट्र और धर्म एक-दूसरे के पूरक, कमज़ोर राष्ट्र में धर्म भी खतरे में
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 2 अक्टूबर 2026 को मुंबई में ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप के 14वें वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि राष्ट्र और धर्म परस्पर अभिन्न हैं — एक के बिना दूसरे का अस्तित्व संभव नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब राष्ट्र कमज़ोर पड़ता है तो धर्म पर संकट आता है, और जब धर्म का आचरण शिथिल होता है तो राष्ट्र का पतन होता है।
समर्पण का दर्शन
भागवत ने सम्मेलन में उपस्थित कार्यकर्ताओं और छात्रों को संबोधित करते हुए समर्पण के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, 'अगर समर्पण किसी नेक और दिव्य लक्ष्य के लिए हो, किसी सुंदर कारण के लिए हो, या किसी पवित्र उद्देश्य के लिए हो, तो वह व्यक्ति के जीवन को स्वर्ग बना सकता है।'
उन्होंने आगे कहा कि ऐसे सार्थक उद्देश्य से जुड़ने का अवसर दुर्लभ है और उपस्थित लोगों को इसके लिए भाग्यशाली बताया। संघ में लाखों लोगों द्वारा बिना किसी अपेक्षा के समय और संसाधन राष्ट्र-सेवा में लगाने की परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने इसे 'जीवंत उदाहरण' बताया।
राष्ट्र और धर्म का अटूट संबंध
RSS सरसंघचालक ने राष्ट्र-धर्म के संबंध पर अपना स्पष्ट मत रखते हुए कहा, 'हमारी परंपरा में राष्ट्र और धर्म अलग नहीं हैं। राष्ट्र का उद्देश्य धर्म है, और धर्म राष्ट्र की सेवा के लिए है। दोनों आपस में जुड़े हुए हैं।' उन्होंने जोड़ा कि जब पढ़ाई के प्रति समर्पित युवा ज्ञान-परंपरा की रक्षा के लिए समय निकालते हैं, तो वह कार्य एक साथ राष्ट्रीय और धार्मिक — दोनों ही होता है।
गौरतलब है कि यह सम्मेलन गांधी जयंती के अवसर पर आयोजित हुआ, जिसमें संघ के कार्यकर्ताओं और छात्रों ने बड़ी संख्या में भागीदारी की।
विश्व में भारत की भूमिका
भागवत ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत की भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज दुनिया अतिवाद, असंतुलन और संघर्ष से जूझ रही है और आगे का रास्ता भारत से ही निकलेगा। उनके अनुसार, 'एक समय में लगभग 3,000 साल तक भारत ने बिना किसी देश को जीते, बिना किसी का धर्म परिवर्तन कराए, और बिना किसी मुद्दे पर किसी पर हमला किए, दुनिया को सुख और शांति का रास्ता दिखाया था।'
यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक मंचों पर भारत की सांस्कृतिक नेतृत्व-क्षमता को लेकर विमर्श तेज़ हो रहा है।
सम्मेलन की पृष्ठभूमि
ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप का यह 14वाँ वार्षिक सम्मेलन था, जिसमें देशभर से संघ-संबद्ध कार्यकर्ता और युवा छात्र शामिल हुए। भागवत की उपस्थिति ने आयोजन को व्यापक चर्चा का केंद्र बना दिया। संघ प्रमुख के इस तरह के संबोधन परंपरागत रूप से सांगठनिक दिशा-निर्देश के रूप में देखे जाते हैं।
आगे की दिशा
भागवत के इस संबोधन को राष्ट्रीय-सांस्कृतिक विमर्श में एक महत्त्वपूर्ण योगदान के रूप में देखा जा रहा है। संघ के सूत्रों के अनुसार, ऐसे आयोजनों का उद्देश्य समाज में सेवा-भाव और राष्ट्रीय चेतना को प्रगाढ़ करना है। आने वाले महीनों में इसी तर्ज़ पर और सम्मेलन आयोजित किए जाने की संभावना है।