मोहन भागवत का न्यूयॉर्क में संदेश: 'हम और हमारा' ही दुनिया की समस्याओं का असली हल
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 29 अगस्त को न्यूयॉर्क में आयोजित 'एक दुनिया, एक मानवता' कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि जहाँ 'मैं और मेरा' की सोच हावी होती है, वहाँ कोई समाधान नहीं निकलता — समाधान केवल 'हम और हमारा' की भावना में निहित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक मनुष्य का अपना सम्मान है और मानवता में कोई भेद नहीं — यही वह शाश्वत सत्य है जिसे स्वीकार करना आज की दुनिया की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
राजनीति नहीं, समाज से होगा बदलाव
भागवत ने कहा कि भारत के संविधान में स्वतंत्रता के बाद मानवीय एकता और समानता पर विशेष बल दिया गया था, लेकिन व्यवहार में यह सिद्धांत लागू नहीं हो पाया। उन्होंने खेद व्यक्त करते हुए कहा, 'राजनीति अब स्वार्थ का खेल बन गई है।' उनके अनुसार, ऐसे परिवर्तन राजनीतिक माध्यमों से नहीं, बल्कि समाज की जड़ों से ही संभव हैं।
उन्होंने बताया कि भारत में संघ ने इसी दिशा में पहल की है और 2018 के बाद उनके एक भाषण के बाद बड़ी संख्या में लोगों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। उनका मानना है कि समाज स्तर पर संवाद और जागरूकता से ही माहौल बदला जा सकता है।
धर्म का वास्तविक उद्देश्य: अनुष्ठान नहीं, सत्य की खोज
भागवत ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि आज के युग में धर्म को अधिकतर अनुष्ठानों तक सीमित कर दिया गया है, जबकि धर्म का असली उद्देश्य मनुष्य को परम सत्य और दिव्यता की ओर ले जाना है। उन्होंने एक सटीक उपमा दी — 'यदि आप मेरी उंगली पर टकटकी लगाए रहेंगे, तो प्रकाश कभी नहीं देख पाएंगे।' उद्देश्य उंगली नहीं, उस प्रकाश को देखना है जिसकी ओर वह इशारा करती है।
संघ की कार्यशैली: देना, बदले में कुछ नहीं लेना
सरसंघचालक ने RSS की कार्यशैली को स्पष्ट करते हुए कहा कि संघ केवल देने में विश्वास रखता है — बदले में कुछ नहीं चाहता। उन्होंने माना कि इसी कारण संघ प्रचार के मामले में पीछे रह जाता है और उसके बारे में कई गलत धारणाएँ समाज में प्रचलित हैं। उन्होंने आमंत्रण दिया, 'जब आप भीतर से देखेंगे, तो सभी धारणाएँ एक दिन में दूर हो जाएंगी।'
सर्वधर्म समभाव और हिंदुत्व की परिभाषा
भागवत ने स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने भारतीय परंपराओं के साथ-साथ इस्लाम और ईसाई धर्म सहित सभी पंथों का पालन किया और प्रत्येक मार्ग से परम अनुभव प्राप्त किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह जाता। उनके अनुसार, हिंदुत्व की असली पहचान यही है कि सभी मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं।
वैश्विक संवाद को ज़मीनी स्तर तक ले जाने का आह्वान
कार्यक्रम के समापन में भागवत ने उपस्थित प्रतिनिधियों से आग्रह किया कि इस संवाद को केवल राष्ट्रीय स्तर तक सीमित न रखा जाए, बल्कि विभिन्न देशों के प्रांत, ज़िला और ब्लॉक स्तर तक पहुँचाया जाए। उन्होंने कहा कि पिछले दो-तीन सत्रों में उपस्थित लोगों ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया और यह देखकर उन्हें सबसे अधिक संतोष हुआ कि सभी एक ही दिशा में सोच रहे हैं। यह एकता ही आने वाले समय में बदलाव की नींव बनेगी।