मोहन भागवत का न्यूयॉर्क में संदेश: भारत ने सदा सभी को आश्रय दिया, इसीलिए सभी धर्म यहाँ एक साथ फलते-फूलते हैं
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क में आयोजित 'एक दुनिया, एक मानवता' कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि भारत की परंपरागत समावेशी भावना ही वह कारण है जिसके चलते यहाँ सभी धर्मों के लोग सदियों से एक साथ रहते आए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे न तो कोई धार्मिक विद्वान हैं और न ही कोई धार्मिक अधिकारी, बल्कि एक ऐसे समाज के प्रतिनिधि हैं जो मानता है कि धर्म भले ही भिन्न हों, मानवता एक है।
मानवता की एकता पर मुख्य संदेश
भागवत ने कहा कि सत्य एक है और मानवता उसी सत्य की उपज है। उन्होंने एक सटीक उपमा देते हुए समझाया कि धर्म एक उँगली की तरह है जो प्रकाश की दिशा दिखाती है — यदि कोई उँगली पर ही टकटकी लगाए रहे तो प्रकाश कभी नहीं दिखेगा। उनके अनुसार, विभिन्न धर्म केवल अलग-अलग मार्ग हैं, जिनका अंतिम लक्ष्य एक ही है — परम सत्य और दिव्यता की खोज।
भारत की परंपरागत समावेशी विरासत
सरसंघचालक ने कहा कि इतिहास के क्रम में भारत विदेशी आक्रमणों का निशाना बना और बहुत कुछ खोया, किंतु वह परंपरा आज भी जीवित है जो आम जन को यही सिखाती है — 'एक दुनिया, एक मानवता'। उन्होंने कहा, 'हमारे भारत में सभी धर्मों के लोग एक साथ रहते हैं क्योंकि परंपरागत रूप से भारत ने सभी को आश्रय दिया है।'
हिंदुत्व की परिभाषा और विविधता का सम्मान
भागवत ने हिंदू होने की अपनी व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहा कि जो स्वयं को हिंदू कहलाना चाहता है, उसे यह स्वीकार करना होगा कि सभी मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं और प्रत्येक मनुष्य का अपना सम्मान है। उन्होंने कहा कि मनुष्यों में जो भेद दिखते हैं, वे प्रकृति की शोभा हैं — इन्हें स्वीकार करना होगा, क्योंकि वास्तविकता यह है कि हम सब एक हैं।
राजनीति की सीमाएँ और समाज की भूमिका
भागवत ने खेद जताते हुए कहा कि स्वतंत्रता के बाद संविधान में एकता पर जोर दिया गया, फिर भी यह पूरी तरह साकार नहीं हो सका। उनके अनुसार, 'राजनीति अब स्वार्थ का खेल बन गई है' और जहाँ 'मैं और मेरा' की भावना होती है, वहाँ कोई समाधान नहीं निकलता — समाधान केवल 'हम और हमारा' में है। उन्होंने कहा कि भारत का अनुभव यह है कि बदलाव की शुरुआत समाज से करनी होगी, राजनीति से नहीं। उन्होंने 2018 के अपने भाषण का उल्लेख करते हुए बताया कि तब से अनेक लोगों ने इस दिशा में सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है।
आगे की राह
यह कार्यक्रम ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक स्तर पर धार्मिक और सांस्कृतिक तनाव की खबरें आम हैं। भागवत का यह संबोधन भारत की 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की अवधारणा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पुनः रेखांकित करता है। आने वाले समय में RSS की वैश्विक संवाद पहलें इसी दिशा में और विस्तार पा सकती हैं।