धर्म सार्वभौमिक सिद्धांत है, पूजा-पाठ की पद्धति नहीं — न्यूयॉर्क में बोले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने 30 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के प्रतिष्ठित मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन' (सार्वभौमिक एकता समारोह) को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म को केवल 'रिलीजन' या पूजा-पाठ की पद्धति तक सीमित नहीं समझना चाहिए। उनके अनुसार, धर्म एक ऐसा सार्वभौमिक सिद्धांत है जो व्यक्ति, समाज और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करता है।
धर्म की परिभाषा: भागवत का मत
भागवत ने अपने संबोधन में धर्म की एक विस्तृत और दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा, 'धर्म कोई रिलीजन नहीं है। यह पूजा-पाठ नहीं है। यह इन सबसे कहीं ऊपर है। यह वह नियम है जिससे ब्रह्मांड चलता है। यह वह नियम है जिससे इंसान जिंदगी के विरोधाभासों को संभाल सकता है।' उनके अनुसार, धर्म की जड़ें धार्मिक पहचान और रीति-रिवाजों से कहीं गहरी और व्यापक हैं।
व्यक्ति, समाज और पर्यावरण का संतुलन
भागवत ने इस सिद्धांत को सामाजिक संदर्भ में भी रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म न तो सामाजिक प्रगति के लिए व्यक्ति के दमन की माँग करता है और न ही व्यक्तिगत सफलता के लिए समाज को कमज़ोर करने की बात करता है।
उन्होंने कहा, 'ऐसा नहीं है कि सामाजिक तरक्की तभी होगी जब व्यक्तियों को दबाया जाए। ऐसा भी नहीं है कि व्यक्ति की सफलता के लिए समाज को दबाना पड़े। व्यक्ति, समाज और पर्यावरण — इन सबको एक साथ आगे बढ़ना है, एक साथ तरक्की करनी है।' यह विचार पश्चिमी व्यक्तिवाद और सामूहिकतावाद दोनों से अलग एक 'मध्य मार्ग' की अवधारणा को प्रतिबिंबित करता है।
शरीर, मन और बुद्धि का समन्वय
भागवत ने इसी संतुलन के सिद्धांत को मानव व्यक्तित्व पर भी लागू किया। उनके अनुसार, शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास में समन्वय होना आवश्यक है। उन्होंने कहा, 'आपका शरीर, आपका मन और आपकी बुद्धि — इन सबको एक साथ आगे बढ़ना है, एक साथ तरक्की करनी है।'
उन्होंने धर्म को एक ऐसे मध्य मार्ग के रूप में परिभाषित किया जो अस्तित्व के विभिन्न आयामों को बिना किसी टकराव के एकसूत्र में पिरोता है। उनके शब्दों में, 'यह सिद्धांत जो सबको जोड़ता है, जो सबको थामे रखता है, जो कोई दरार पैदा नहीं होने देता और जो सबको संतुलित करता है — वही धर्म है।'
एकता और विविधता: भारत का वैश्विक संदेश
भागवत ने कहा कि इस समझ की नींव 'वननेस' — अर्थात अस्तित्व की एकता — पर टिकी है। उन्होंने माना कि लोगों के बीच अंतर दिखते हैं और वे वास्तविक भी हैं, किंतु वे उनके गहरे आंतरिक जुड़ाव को समाप्त नहीं करते।
उन्होंने कहा, 'विविधता कुदरती है और एकता सच है। हमें यह समझना होगा और अपनी जिंदगी को इसी के हिसाब से ढालना होगा।' उन्होंने भारत को इस संतुलित मॉडल को व्यवहार में उतारने का दायित्व सौंपा और विश्वभर में बसे भारतीयों से आग्रह किया कि वे यह संदेश उपदेश से नहीं, बल्कि अपने आचरण और उदाहरण से दें।
मानव जीवन का उद्देश्य
भागवत ने अपने संबोधन के अंत में मानव जीवन के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, 'इंसानी जिंदगी का कोई मकसद होता है। यह बेमतलब नहीं है। यह कोई मामूली इत्तेफाक नहीं है। इंसानी जिंदगी इसलिए मिली है ताकि हम यह ज्ञान सबको दें और अपनी मुक्ति और दुनिया की भलाई के लिए उस ज्ञान को अपनाएं।' यह संदेश भारतीय दर्शन की उस परंपरा का विस्तार है जो आत्मज्ञान और सेवा को एकसाथ मानती है।