30 अगस्त 2026
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धर्म सार्वभौमिक सिद्धांत है, पूजा-पाठ की पद्धति नहीं — न्यूयॉर्क में बोले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत

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धर्म सार्वभौमिक सिद्धांत है, पूजा-पाठ की पद्धति नहीं — न्यूयॉर्क में बोले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत

सारांश

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन से धर्म की एक नई व्याख्या दुनिया के सामने रखी — न पूजा-पाठ, न मजहब, बल्कि वह सार्वभौमिक नियम जो व्यक्ति, समाज और पर्यावरण को बिना टकराव के एकसूत्र में बाँधता है। भारत को इस संदेश का जीवंत उदाहरण बनना है।

मुख्य बातें

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने 30 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन' को संबोधित किया।
भागवत ने कहा — धर्म 'रिलीजन' या पूजा-पाठ नहीं, बल्कि ब्रह्मांड को संचालित करने वाला सार्वभौमिक सिद्धांत है।
धर्म व्यक्ति, समाज और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करता है — किसी एक के लिए दूसरे का दमन नहीं।
उन्होंने एकता और विविधता दोनों को स्वीकार करने की आवश्यकता पर बल दिया — 'विविधता कुदरती है, एकता सच है।' भारतीयों से आह्वान किया कि यह संदेश उपदेश से नहीं, आचरण से दुनिया तक पहुँचाएं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने 30 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के प्रतिष्ठित मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन' (सार्वभौमिक एकता समारोह) को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म को केवल 'रिलीजन' या पूजा-पाठ की पद्धति तक सीमित नहीं समझना चाहिए। उनके अनुसार, धर्म एक ऐसा सार्वभौमिक सिद्धांत है जो व्यक्ति, समाज और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करता है।

धर्म की परिभाषा: भागवत का मत

भागवत ने अपने संबोधन में धर्म की एक विस्तृत और दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा, 'धर्म कोई रिलीजन नहीं है। यह पूजा-पाठ नहीं है। यह इन सबसे कहीं ऊपर है। यह वह नियम है जिससे ब्रह्मांड चलता है। यह वह नियम है जिससे इंसान जिंदगी के विरोधाभासों को संभाल सकता है।' उनके अनुसार, धर्म की जड़ें धार्मिक पहचान और रीति-रिवाजों से कहीं गहरी और व्यापक हैं।

व्यक्ति, समाज और पर्यावरण का संतुलन

भागवत ने इस सिद्धांत को सामाजिक संदर्भ में भी रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म न तो सामाजिक प्रगति के लिए व्यक्ति के दमन की माँग करता है और न ही व्यक्तिगत सफलता के लिए समाज को कमज़ोर करने की बात करता है।

उन्होंने कहा, 'ऐसा नहीं है कि सामाजिक तरक्की तभी होगी जब व्यक्तियों को दबाया जाए। ऐसा भी नहीं है कि व्यक्ति की सफलता के लिए समाज को दबाना पड़े। व्यक्ति, समाज और पर्यावरण — इन सबको एक साथ आगे बढ़ना है, एक साथ तरक्की करनी है।' यह विचार पश्चिमी व्यक्तिवाद और सामूहिकतावाद दोनों से अलग एक 'मध्य मार्ग' की अवधारणा को प्रतिबिंबित करता है।

शरीर, मन और बुद्धि का समन्वय

भागवत ने इसी संतुलन के सिद्धांत को मानव व्यक्तित्व पर भी लागू किया। उनके अनुसार, शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास में समन्वय होना आवश्यक है। उन्होंने कहा, 'आपका शरीर, आपका मन और आपकी बुद्धि — इन सबको एक साथ आगे बढ़ना है, एक साथ तरक्की करनी है।'

उन्होंने धर्म को एक ऐसे मध्य मार्ग के रूप में परिभाषित किया जो अस्तित्व के विभिन्न आयामों को बिना किसी टकराव के एकसूत्र में पिरोता है। उनके शब्दों में, 'यह सिद्धांत जो सबको जोड़ता है, जो सबको थामे रखता है, जो कोई दरार पैदा नहीं होने देता और जो सबको संतुलित करता है — वही धर्म है।'

एकता और विविधता: भारत का वैश्विक संदेश

भागवत ने कहा कि इस समझ की नींव 'वननेस' — अर्थात अस्तित्व की एकता — पर टिकी है। उन्होंने माना कि लोगों के बीच अंतर दिखते हैं और वे वास्तविक भी हैं, किंतु वे उनके गहरे आंतरिक जुड़ाव को समाप्त नहीं करते।

उन्होंने कहा, 'विविधता कुदरती है और एकता सच है। हमें यह समझना होगा और अपनी जिंदगी को इसी के हिसाब से ढालना होगा।' उन्होंने भारत को इस संतुलित मॉडल को व्यवहार में उतारने का दायित्व सौंपा और विश्वभर में बसे भारतीयों से आग्रह किया कि वे यह संदेश उपदेश से नहीं, बल्कि अपने आचरण और उदाहरण से दें।

मानव जीवन का उद्देश्य

भागवत ने अपने संबोधन के अंत में मानव जीवन के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, 'इंसानी जिंदगी का कोई मकसद होता है। यह बेमतलब नहीं है। यह कोई मामूली इत्तेफाक नहीं है। इंसानी जिंदगी इसलिए मिली है ताकि हम यह ज्ञान सबको दें और अपनी मुक्ति और दुनिया की भलाई के लिए उस ज्ञान को अपनाएं।' यह संदेश भारतीय दर्शन की उस परंपरा का विस्तार है जो आत्मज्ञान और सेवा को एकसाथ मानती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो पश्चिमी मंच से हिंदू चिंतन को 'यूनिवर्सल' की भाषा में प्रस्तुत करती है। गौरतलब है कि RSS का यह अंतरराष्ट्रीय आउटरीच हाल के वर्षों में तेज़ हुआ है, और मैडिसन स्क्वायर गार्डन जैसे प्रतीकात्मक मंच का चुनाव संयोग नहीं है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि 'धर्म' की यह व्यापक परिभाषा घरेलू राजनीतिक संदर्भ में किस रूप में लागू होती है, यह प्रश्न अनुत्तरित रहता है। विविधता और एकता के बीच संतुलन का यह आदर्श तभी विश्वसनीय बनेगा जब वह सार्वजनिक विमर्श में भी उतनी ही निरंतरता से दिखे।
RashtraPress
30 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में धर्म के बारे में क्या कहा?
भागवत ने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ या 'रिलीजन' नहीं है, बल्कि वह सार्वभौमिक सिद्धांत है जो व्यक्ति, समाज और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाता है। उन्होंने इसे ब्रह्मांड को संचालित करने वाले नियम के रूप में परिभाषित किया।
'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन' क्या है?
यह न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित एक सार्वभौमिक एकता समारोह है, जिसे 30 अगस्त 2026 को संपन्न किया गया। इसी मंच से आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने धर्म और मानव जीवन के उद्देश्य पर अपने विचार रखे।
भागवत के अनुसार धर्म और रिलीजन में क्या अंतर है?
भागवत के अनुसार 'रिलीजन' एक विशेष पूजा-पद्धति या मजहब को दर्शाता है, जबकि धर्म उससे कहीं व्यापक है — यह वह नियम है जिससे ब्रह्मांड चलता है और जो जीवन के विरोधाभासों को संतुलित करता है। धर्म किसी एक समुदाय या परंपरा तक सीमित नहीं है।
भागवत ने भारत की क्या भूमिका बताई?
भागवत ने कहा कि भारत का मिशन इस संतुलित मॉडल को व्यवहार में उतारकर दिखाना है। उन्होंने विश्वभर के भारतीयों से आग्रह किया कि वे यह संदेश उपदेश से नहीं, बल्कि अपने आचरण और उदाहरण से दुनिया तक पहुँचाएं।
भागवत ने एकता और विविधता पर क्या कहा?
भागवत ने कहा कि विविधता स्वाभाविक है और एकता सत्य है — दोनों को एकसाथ स्वीकार करना आवश्यक है। उनके अनुसार, लोगों के बीच अंतर वास्तविक हैं, लेकिन वे उनके गहरे आंतरिक जुड़ाव को समाप्त नहीं करते।
राष्ट्र प्रेस
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