भागवत का न्यूयॉर्क में ऐलान: आरएसएस देगा वैश्विक अंतर-धार्मिक पहल को पूरा समर्थन, 30 देशों के 180 प्रतिनिधियों को किया संबोधित
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने 30 अगस्त को न्यूयॉर्क में आयोजित अंतर-धार्मिक सम्मेलन में घोषणा की कि आरएसएस उन धार्मिक नेताओं के साथ पूरी ताकत से खड़ा है जो वैश्विक स्तर पर अंतर-धार्मिक सहयोग को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि जमीनी स्तर पर निरंतर प्रयासों से दुनिया में व्याप्त संघर्ष और अविश्वास की दीवारें गिराई जा सकती हैं।
सम्मेलन का मंच और भागीदारी
'वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी' शीर्षक से आयोजित इस कार्यक्रम में 30 देशों के 180 से अधिक धार्मिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। भागवत ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा, 'आरएसएस पूरी ताकत के साथ आपके साथ है, क्योंकि हम एक ही सोच पर हैं।' यह आयोजन ऐसे समय में हुआ जब वैश्विक स्तर पर सांप्रदायिक तनाव और धार्मिक ध्रुवीकरण की चर्चाएँ तेज़ हैं।
विविधता और एकता पर मुख्य संदेश
संघ प्रमुख ने धार्मिक विविधता को मानवता की शक्ति बताया। उन्होंने कहा, 'विविधता हमारी आंतरिक एकता की सजावट है। इसे स्वीकार करना होगा। इसका सम्मान करना होगा। इसकी रक्षा करनी होगी। जैसे मैं अपनी विशिष्ट प्रकृति की रक्षा करता हूँ, वैसे ही मुझे दूसरों की भी रक्षा करनी होगी।' भागवत ने यह भी कहा कि अलग-अलग धर्म एक ही अंतिम सत्य तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न मार्ग हैं, और विविधता प्रकृति का नियम है जबकि एकता उसके पीछे का सत्य है।
मुसलमानों पर आरएसएस का स्पष्ट रुख
सम्मेलन में भागवत से आरएसएस के मुसलमानों के प्रति दृष्टिकोण पर भी सवाल पूछे गए। उन्होंने 2018 में दिल्ली में मुस्लिम प्रतिभागियों के साथ हुई एक बैठक का हवाला देते हुए कहा, 'तब मैंने कहा था — नहीं। वह हिंदू नहीं है। अगर कोई हिंदू सोचता है कि भारत में कोई मुसलमान नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा।' उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू होने की शर्त यह है कि व्यक्ति यह माने कि सभी रास्ते एक ही ओर ले जाते हैं और हर इंसान की गरिमा समान है। गौरतलब है कि भागवत ने बताया कि उस 2018 की बैठक के बाद से भारत में मुस्लिम और ईसाई समुदायों के साथ संवाद निरंतर जारी है।
राजनीति नहीं, समाज से होगी शुरुआत
भागवत ने अंतर-धार्मिक समरसता के लिए राजनीतिक मंचों पर निर्भरता को अपर्याप्त बताया। उन्होंने कहा, 'ये चीजें राजनीति से नहीं होतीं। दुख के साथ कहना पड़ रहा है, लेकिन सच यह है कि राजनीति अब स्वार्थ का खेल बन गई है। हम और हमारा समाज ही समाधान है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि जब समाज में मजबूत जन-सहमति बनती है, तो लोकतंत्र में राजनेताओं के लिए उसे नजरअंदाज करना कठिन हो जाता है।
स्थानीय स्तर तक संवाद ले जाने का आह्वान
संघ प्रमुख ने अंतर-धार्मिक संवाद को राष्ट्रीय मंचों से आगे ले जाकर प्रांत, जिले और स्थानीय ब्लॉक स्तर तक विस्तारित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, 'अगर हम मिलकर काम करना शुरू करें, तो हम दुनिया की स्थिति को बदल सकते हैं।' साथ ही उन्होंने यह भी चेताया कि इस प्रयास में धैर्य अनिवार्य है, क्योंकि सोच बदलने में समय लगता है। आरएसएस प्रमुख का यह वैश्विक संबोधन भारत के भीतर और बाहर संघ की छवि और कूटनीतिक पहुँच के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।