न्यूयॉर्क में 'यूनिवर्सल वननेस' सम्मेलन: धार्मिक नेताओं ने वैश्विक नफरत पर चेताया, रक्षा बंधन को बनाया एकता का प्रतीक
सारांश
मुख्य बातें
न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 30 अगस्त को आयोजित 'यूनिवर्सल वननेस' सम्मेलन में दुनिया के प्रमुख धार्मिक नेताओं ने चेतावनी दी कि सीमाओं के पार नफरत पहले से कहीं अधिक तेज़ी से फैल रही है, और मानवता सशस्त्र संघर्षों, विस्थापन, पूर्वाग्रह तथा उभरती तकनीक के दुष्प्रभावों से एक साथ जूझ रही है। यहूदी, ईसाई और मुस्लिम समुदायों के वक्ताओं ने संवाद, करुणा और साझा इंसानी पहचान को पुनर्जीवित करने का आह्वान किया।
सम्मेलन का स्वरूप और प्रतिनिधित्व
इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत सहित कई देशों के धार्मिक प्रतिनिधि उपस्थित रहे। 'वर्ल्ड काउंसिल ऑफ रिलीजियस लीडर्स' के संस्थापक महासचिव बाबा जैन ने 30 देशों के प्रमुख धर्मों के 200 से अधिक प्रतिनिधियों के साथ विचार-विमर्श के बाद तैयार एक 'कॉल टू एक्शन' (कार्रवाई का आह्वान) प्रस्तुत किया।
गौरतलब है कि भागवत 2009 से RSS का नेतृत्व कर रहे हैं। 1925 में स्थापित RSS इस वर्ष अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा है और इस अवसर का उपयोग सामाजिक संगठन तथा सेवा के संदेश को व्यापक स्तर पर पहुँचाने के लिए कर रहा है।
बाबा जैन का 'कॉल टू एक्शन'
बाबा जैन ने कहा, 'हम जानते हैं कि आस्था में ठीक करने, सुलह कराने और प्रेरित करने की अद्भुत शक्ति है। और यह भी एक दुखद सच है कि धर्म का इस्तेमाल कभी-कभी लोगों को बाँटने, अलग-थलग करने और हिंसा को सही ठहराने के लिए किया गया है।' उन्होंने धार्मिक नेताओं से आग्रह किया कि वे सबसे पहले अपने स्वयं के समुदायों के भीतर शब्दों, शिक्षाओं, संस्थाओं और रीति-रिवाजों की समीक्षा करें।
जैन ने आगे कहा, 'हम नफरत, अपमान, अमानवीय व्यवहार या हिंसा को सही ठहराने के लिए धर्म के इस्तेमाल को नकारेंगे और सिखाएंगे कि गहरी आस्था और अलग-अलग विश्वास रखने वालों के प्रति सम्मान, दोनों एक साथ हो सकते हैं।' उन्होंने धार्मिक समुदायों से संकट आने से पहले ही आपसी रिश्ते बनाने और युवाओं को धार्मिक व सांस्कृतिक सीमाओं से परे एकजुट करने का आह्वान करते हुए कहा, 'जिस व्यक्ति को हम जानते हैं, उससे नफरत करना मुश्किल होता है।'
इमाम शरीफ और रेवरेंड थॉर्न की आवाज़
इमाम शरीफ ने इस सम्मेलन की सफलता को उपस्थित लोगों के भविष्य के कार्यों से जोड़ते हुए कहा, 'सवाल यह है कि आज हमारे यहाँ होने की वजह से कल क्या अलग होगा।' उन्होंने कहा कि यदि प्रतिभागी गहरे रिश्तों, नए साहस, साझा जिम्मेदारी और काम करने के संकल्प के साथ जाते हैं, तो शायद कुछ बहुत बड़े बदलाव की नींव रखी जाएगी। शरीफ ने स्पष्ट किया कि एकता का अर्थ एकरूपता नहीं है — 'एक-दूसरे से जुड़े रहने के लिए हमें एक जैसा बनने की जरूरत नहीं है।'
उन्होंने चेताया, 'नफरत सीमाओं के पार और हमारी स्क्रीन के ज़रिए पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ी से फैल रही है। टेक्नोलॉजी बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रही है, जबकि इंसानियत नफरत, पूर्वाग्रह, अहंकार, समूह में बंटना, अमानवीय व्यवहार और वर्चस्व के संघर्ष से जूझ रही है।'
रेवरेंड थॉर्न ने कहा कि लोगों को बार-बार यह बताया जा रहा है कि उन्हें किससे डरना चाहिए, किसे दोषी ठहराना चाहिए। उन्होंने कहा, 'जब भी इंसान पीछे हटने के बजाय एक साथ आने, चिल्लाने के बजाय सुनने और बुराई करने के बजाय समझने का रास्ता चुनते हैं, तो कुछ पवित्र होता है।' थॉर्न ने जोड़ा, 'हमारे ओहदों, धर्मों, राजनीति और नक्शे पर बनी सीमाओं से पहले, हम इंसान हैं, ईश्वर की संतान हैं।'
रब्बी ब्लुमेंथल का संदेश: अकेलापन और जुड़ाव
रब्बी ब्लुमेंथल ने यहूदी शिक्षाओं का हवाला देते हुए कहा कि हर इंसान में ईश्वरीय अंश होता है और उसका मूल्य अनमोल है। उन्होंने कहा, 'हम सभी बराबर हैं, महत्वपूर्ण हैं और प्यार के हकदार हैं, क्योंकि जब ईश्वर हमें देखते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे वे आईने में खुद को देख रहे हों।' ब्लुमेंथल ने आज के समाज की बड़ी समस्याओं की जड़ अकेलेपन में देखते हुए लोगों से 'जुड़ाव, प्यार और सम्मान' का रिश्ता बनाने की अपील की।
रक्षा बंधन: सुरक्षा और जिम्मेदारी का वैश्विक प्रतीक
सम्मेलन में रक्षा बंधन और राखी बाँधने की परंपरा को देखभाल, सुरक्षा और आपसी जिम्मेदारी के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। उपस्थित लोगों को प्रोत्साहित किया गया कि वे इस रिश्ते को केवल परिवार तक सीमित न रखें, बल्कि पड़ोसियों, अजनबियों और विभिन्न धार्मिक समुदायों तक भी विस्तारित करें। यह ऐसे समय में आया है जब अंतर-धार्मिक तनाव वैश्विक स्तर पर बढ़ते दिख रहे हैं और डिजिटल मंचों पर विद्वेष का प्रसार एक गंभीर चुनौती बन चुका है।
आने वाले समय में इस 'कॉल टू एक्शन' को अमल में लाने के लिए धार्मिक समुदायों की प्रतिबद्धता और ज़मीनी स्तर पर संवाद की पहल ही इस सम्मेलन की असली कसौटी होगी।