आरएसएस शताब्दी किताब में LGBT अधिकारों पर अंकित गुप्तानी का लेख, टकराव छोड़ संवाद की वकालत
सारांश
मुख्य बातें
एलजीबीटी राइट्स एक्टिविस्ट अंकित गुप्तानी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में प्रकाशित होने वाली विशेष स्मारक पुस्तक में एक महत्वपूर्ण लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों को लेकर संघ और गैर-वामपंथी संगठनों के साथ टकराव की बजाय संवाद और सहयोग की पैरवी की है। यह लेख लखनऊ से उभरी उस बहस का हिस्सा है जो एलजीबीटी अधिकारों को भारत की अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत से जोड़ने की कोशिश करती है। गुप्तानी के इस नजरिये को आरएसएस के शताब्दी प्रकाशन में स्थान मिलना स्वयं में एक उल्लेखनीय घटनाक्रम माना जा रहा है।
लेख के दो मुख्य विषय
गुप्तानी ने अपने लेख में मुख्यतः दो बिंदुओं पर विचार रखे हैं। पहला, उन्होंने स्पष्ट किया कि एलजीबीटी अधिकार कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार समूहों ने परंपरागत रूप से संघ तथा गैर-वामपंथी संगठनों को विरोधी माना है और प्रायः टकराव का मार्ग अपनाया है। उन्होंने इस रवैये को बदलने की ज़रूरत बताते हुए कहा, 'मैं सहयोग और समावेश की वकालत करता हूँ। मैं इतने सालों से संघ और गैर-वामपंथी क्षेत्र से आने वाली संस्थाओं के साथ संवाद करने की वकालत करता हूँ।'
दूसरा प्रमुख विषय डिकॉलोनाइजेशन यानी उपनिवेशवादी मानसिकता से मुक्ति का रहा। गुप्तानी का तर्क है कि मानवाधिकार और विशेष रूप से एलजीबीटी अधिकारों की चर्चा को पश्चिमी चश्मे से नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि से देखना होगा।
एलजीबीटी अधिकार — भारतीय परंपरा में जड़ें
गुप्तानी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एलजीबीटी अधिकार कोई पश्चिम से आयातित अवधारणा नहीं है। उनके अनुसार, भारतीय शास्त्रों और ऐतिहासिक परंपराओं में लिंग और यौनिकता की विविधता की स्वीकृति सदियों से रही है। उन्होंने कहा, 'हम एलजीबीटी अधिकार के बारे में बात कर रहे हैं, न कि पश्चिम की संस्कृति को फॉलो करने की बात।' उनका मत है कि समाज को इसी देशज विरासत को पुनः स्मरण करने की आवश्यकता है।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत में एलजीबीटी अधिकारों को लेकर कानूनी और सामाजिक बहस जारी है और सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों ने इस विमर्श को नई दिशा दी है।
आरएसएस और समावेशी संवाद
गुप्तानी ने यह भी रेखांकित किया कि आरएसएस इस दृष्टिकोण को समझता है। उनका मानना है कि संघ के साथ सार्थक संवाद एलजीबीटी समुदाय के हितों के लिए टकराव से अधिक प्रभावी हो सकता है। गौरतलब है कि आरएसएस के शताब्दी प्रकाशन में एलजीबीटी दृष्टिकोण वाले किसी एक्टिविस्ट का लेख शामिल होना अपने आप में एक संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि दोनों पक्षों के बीच विचार-विनिमय की संभावना बन रही है।
विकसित भारत 2047 और सामूहिक जिम्मेदारी
अपने लेख के अंत में गुप्तानी ने विभिन्न विचारधाराओं के युवाओं से 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य के लिए मिलकर काम करने की अपील की। उन्होंने कहा, 'पीएम मोदी ने 'विकसित भारत 2047' का जो विजन रखा है, वह सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए है। इस महायज्ञ में हम सभी के योगदान और आहुति की आवश्यकता है। चाहे आप किसी भी प्रांत, संप्रदाय और विचारधारा से जुड़े हों।'
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस किताब के प्रकाशन के बाद एलजीबीटी समुदाय और संघ परिवार के बीच संवाद की नई राहें खुलती हैं या नहीं।