साहिब सिंह वर्मा: प्याज की महंगाई और एक बयान ने छीनी दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली की राजनीति में 12 अक्टूबर 1998 का वह दिन इतिहास में दर्ज हो गया, जब मुख्यमंत्री आवास के बाहर आक्रोशित भीड़ जमा थी और राजधानी की सड़कों पर प्याज की आसमान छूती कीमतों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे थे। दिल्ली के चौथे मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा उस दिन एक सरकारी डीटीसी बस में सवार होकर आवास से निकले — और इसी के साथ उनका मुख्यमंत्री पद का सफर भी समाप्त हो गया। विधानसभा चुनावों में महज 50 दिन शेष थे।
प्रारंभिक जीवन और राजनीतिक यात्रा
15 मार्च 1943 को दिल्ली के मुंडका गाँव में एक किसान जाट परिवार में जन्मे साहिब सिंह वर्मा ने अपने राजनीतिक जीवन की नींव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कार्यकर्ता के रूप में रखी। उनकी शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई, जहाँ एक प्रोफेसर की सलाह पर उन्होंने अपने नाम के साथ 'वर्मा' शब्द जोड़ा।
पढ़ाई पूरी कर दिल्ली लौटने के बाद उन्होंने नगर निगम की पुस्तकालय में काम किया। इसी दौर में दूध-जलेबी के लिए प्रसिद्ध एक मिठाई की दुकान पर उनकी मुलाकात अटल बिहारी वाजपेयी सहित जनसंघ के कई वरिष्ठ नेताओं से हुई। उनके विचारों से प्रेरित होकर वर्मा पहले RSS और फिर भारतीय जनता पार्टी (BJP) से जुड़ गए।
वे जनता पार्टी के टिकट पर दिल्ली नगर निगम के लिए चुने गए और 1983 में BJP के टिकट पर पुनः निर्वाचित हुए। 1993 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें दिल्ली सरकार में शिक्षा और विकास मंत्री का दायित्व सौंपा गया।
मुख्यमंत्री पद तक का सफर
वर्मा के करियर में निर्णायक मोड़ 1996 में आया। जैन हवाला मामले में आरोपों के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना को पद छोड़ना पड़ा। BJP विधायक दल ने विचार-विमर्श के बाद साहिब सिंह वर्मा को नया मुख्यमंत्री चुना। वे 1996 में दिल्ली के मुख्यमंत्री बने और ढाई वर्ष से अधिक समय तक इस पद पर रहे।
विवादों से भरा कार्यकाल
वर्मा का मुख्यमंत्री कार्यकाल कई बड़ी त्रासदियों की छाया में बीता। वज़ीराबाद स्कूल बस हादसे और उपहार सिनेमाघर अग्निकांड ने उनकी सरकार को कठघरे में खड़ा किया। इसके अलावा मिलावटी सरसों के तेल से फैली 'ड्रॉप्सी' बीमारी के प्रकोप ने एक गंभीर स्वास्थ्य आपातकाल की स्थिति पैदा कर दी। इस खाद्य मिलावट संकट के प्रबंधन को लेकर उनकी सरकार की व्यापक आलोचना हुई।
वह बयान जिसने सब बदल दिया
चुनावों से कुछ महीने पहले 1998 में प्याज की कीमतें अचानक बेतहाशा बढ़ गईं और जनता में गहरा आक्रोश पनप गया। इसी पृष्ठभूमि में एक प्रेस वार्ता में वर्मा ने कहा — 'गरीब आदमी किसी हालत में प्याज नहीं खाता।' यह बयान अगले दिन अखबारों की सुर्खियाँ बन गया।
आलोचकों का कहना है कि इस एक वाक्य ने जनता के बीच चिंगारी का काम किया। कांग्रेस को बिना अधिक प्रयास के एक धारदार चुनावी हथियार मिल गया। 12 अक्टूबर 1998 को मुख्यमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शनकारियों की भीड़ जमा हो गई। नारेबाज़ी के बीच वर्मा एक डीटीसी बस में सवार होकर अपने घर की ओर रवाना हो गए — यह प्रस्थान प्रतीकात्मक भी था और अंतिम भी। उनकी जगह सुषमा स्वराज को दिल्ली की मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गई।
दुखद अंत
दिल्ली की राजनीति के लिए 30 जून 2007 का दिन अत्यंत दुखद रहा। जयपुर-दिल्ली राजमार्ग पर शाहजहाँपुर के निकट उनकी कार एक ट्रक से टकरा गई, जिसमें साहिब सिंह वर्मा का निधन हो गया। दिल्ली की राजनीति में एक ऐसे नेता का अध्याय बंद हो गया, जिसकी विरासत आज भी उस एक बयान के साथ जोड़कर याद की जाती है।