'सतलुज' विवाद: कंवलजीत सिंह बोले — फिल्म बनने के बाद रोक लगाना पूरी टीम के साथ अन्याय
सारांश
मुख्य बातें
वरिष्ठ अभिनेता कंवलजीत सिंह ने 7 जुलाई को अभिनेता-गायक दलजीत दोसांझ की बहुचर्चित फिल्म 'सतलुज' को लेकर छिड़े राजनीतिक विवाद पर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी फिल्म पर भारी निवेश, समय और मेहनत लग जाने के बाद उसे रोकना या उसमें बड़े बदलाव की माँग करना पूरी टीम के साथ सरासर अन्याय है। उनके अनुसार, किसी भी कलाकार का पहला दायित्व अपने किरदार को पूरी ईमानदारी से जीना होता है — विवादों पर फैसला संबंधित संस्थाओं और निर्माताओं का काम है।
किरदार और तैयारी
कंवलजीत सिंह ने बताया कि 'सतलुज' में उन्होंने अपने करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण किरदार निभाया। उन्होंने कहा, 'यह पहली बार था जब मैं इतने बेरहम इंसान का किरदार निभा रहा था। एक ऐसी कहानी जो सच है और जिसके बारे में कभी बात नहीं हुई — जो हमारे इतिहास का हिस्सा है — इसीलिए मुझे इसमें दिलचस्पी हुई।'
उन्होंने बताया कि उनका किरदार पंजाब के एक वरिष्ठ अधिकारी से प्रेरित था। भूमिका की तैयारी के लिए उन्होंने उस अधिकारी के भाषण देखे, उनके बारे में उपलब्ध सामग्री पढ़ी और उनके व्यक्तित्व को समझने की कोशिश की। हालाँकि निर्देशक ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि किसी की नकल न करें, बल्कि अभिनय के ज़रिए किरदार को जीवंत बनाएँ।
रिलीज में आई बाधाएँ
फिल्म की रिलीज में आई अड़चनों पर कंवलजीत सिंह ने कहा कि रिलीज न होने के पीछे केवल विवाद ही कारण नहीं होते — आर्थिक, तकनीकी और अन्य व्यावहारिक कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं। उन्होंने इसकी तुलना एक लेखक की उस किताब से की जो वर्षों की मेहनत के बावजूद प्रकाशित न हो सके।
उन्होंने बताया कि यह मामला करीब ढाई से तीन साल तक विभिन्न स्तरों पर चलता रहा। एक समय फिल्म में बड़ी संख्या में कट लगाने की बात कही गई और बाद में इसे कनाडा फिल्म फेस्टिवल से भी वापस ले लिया गया।
निर्माताओं की सराहना
कंवलजीत सिंह ने फिल्म के निर्माताओं और निर्देशक की सराहना करते हुए कहा कि बाहरी दबावों के बावजूद उन्होंने अपने रुख से समझौता नहीं किया। उन्होंने विश्वास जताया कि 'सतलुज' एक दिन ज़रूर रिलीज होगी। उनके शब्दों में, 'इस फिल्म से जुड़े हर व्यक्ति — चाहे वह स्पॉट बॉय हो, तकनीशियन हो या निर्देशक — सभी ने पूरी लगन से काम किया है।'
रचनात्मक स्वतंत्रता और संवाद का आह्वान
अभिनेता ने यह भी सुझाव दिया कि यदि किसी विषय पर आशंकाएँ हैं तो फिल्म निर्माण शुरू होने से पहले ही आवश्यक मंजूरियाँ और आपत्तियों का समाधान कर लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय सिनेमा में रचनात्मक अभिव्यक्ति और संवेदनशील विषयों के बीच संतुलन ज़रूरी है और संवाद, पारदर्शिता तथा समय रहते निर्णय लेने से ऐसी परिस्थितियों से बचा जा सकता है। आलोचकों का कहना है कि फिल्म उद्योग में इस तरह के देर से उठाए गए कदम कलाकारों और निर्माताओं दोनों के लिए नुकसानदेह साबित होते हैं। 'सतलुज' का भविष्य अब निर्माताओं और संबंधित संस्थाओं के बीच जारी संवाद पर निर्भर करता है।