एसबीआई डेटा लीक: डार्क वेब पर 3,897 ग्राहकों के रिकॉर्ड, सीपीआई-एम सांसद ने मांगी स्वतंत्र जांच
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के 3,897 ग्राहकों के संवेदनशील व्यक्तिगत रिकॉर्ड कथित तौर पर डार्क वेब पर उपलब्ध पाए गए हैं — यह जानकारी 22 अक्टूबर 2026 को सामने आई जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [सीपीआई-एम] के राज्यसभा सदस्य ए.ए. रहीम ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से इस मामले में हस्तक्षेप और स्वतंत्र साइबर सुरक्षा जांच की मांग की। देश के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक की ग्राहक सूचनाओं की सुरक्षा पर उठे इन सवालों ने साइबर सुरक्षा नीति को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।
मुख्य घटनाक्रम
16 अक्टूबर 2026 को एसबीआई को उसके 'थ्रेट इंटेलिजेंस सर्विस प्रोवाइडर', डिफेंस साइबर एजेंसी और इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम (सीईआरटी-इन) की ओर से इस संदिग्ध डेटा लीक के बारे में अलर्ट प्राप्त हुए। इसके बाद बैंक ने इस घटना की जांच के लिए एक स्वतंत्र साइबर सुरक्षा एजेंसी को नियुक्त किया।
रिपोर्टों के अनुसार, लीक हुई जानकारी में ग्राहकों के नाम, रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर, जन्म तिथि, ईमेल व घर का पता, ब्रांच की जानकारी, कस्टमर इंफॉर्मेशन फाइल (सीआईएफ) आइडेंटिफायर और लोन व लीड रिकॉर्ड से जुड़ा मेटाडेटा शामिल है। इस संदिग्ध लीक का पूरा दायरा और स्रोत अभी भी जांच के अधीन है।
सांसद की मांगें
सांसद ए.ए. रहीम ने वित्त मंत्रालय के समक्ष कई ठोस मांगें रखीं। उन्होंने कहा कि संदिग्ध डेटा लीक के स्रोत और दायरे की तत्काल पहचान हो तथा प्रभावित ग्राहकों को सीधे सूचित किया जाए। साथ ही उन्होंने जांच के लिए एक स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित करने और बैंक में ऐसे सुगम माध्यम बनाने की मांग की जहाँ ग्राहक संदिग्ध धोखाधड़ी की रिपोर्ट कर सकें।
उन्होंने जांच के नतीजों और उठाए गए सुधारात्मक कदमों में पूर्ण पारदर्शिता की भी माँग की। रहीम ने तर्क दिया कि बैंकिंग सेवाओं में बाधा न आने का अर्थ यह नहीं है कि निजी जानकारी के लीक होने का मामला गंभीर नहीं है।
आम जनता पर असर
सांसद ने चेतावनी दी कि अगर यह जानकारी गलत हाथों में पड़ती है तो ग्राहकों को 'आइडेंटिटी थेफ्ट', टारगेटेड फिशिंग, प्रतिरूपण (impersonation) और वित्तीय धोखाधड़ी जैसे गंभीर खतरे हो सकते हैं। उन्होंने विशेष रूप से रेखांकित किया कि पेंशनभोगी, मजदूर, छोटे व्यापारी और अन्य कमजोर वर्ग के लोग इस स्थिति में सर्वाधिक असुरक्षित हैं।
गौरतलब है कि एसबीआई के करोड़ों ग्राहक भारत के दूरदराज इलाकों में हैं जहाँ डिजिटल साक्षरता अपेक्षाकृत कम है, जिससे इस तरह के साइबर हमलों का जोखिम और बढ़ जाता है।
एसबीआई का पक्ष
एसबीआई ने स्पष्ट किया है कि इस घटना से उसके मुख्य कामकाज या व्यावसायिक निरंतरता पर कोई उल्लेखनीय असर नहीं पड़ा है। बैंक ने जांच के लिए एक स्वतंत्र साइबर सुरक्षा एजेंसी को नियुक्त किया है, हालाँकि इस एजेंसी का नाम सार्वजनिक नहीं किया गया है।
व्यापक साइबर सुरक्षा सवाल
इस मामले को केवल एसबीआई तक सीमित न रखते हुए, सांसद रहीम ने वित्त मंत्रालय से आग्रह किया कि सभी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में साइबर सुरक्षा उपायों की व्यापक समीक्षा की जाए। उन्होंने रियल-टाइम खतरा-पहचान क्षमता, डेटा-एक्सेस नियंत्रण को मजबूत करने और जहाँ भी लापरवाही या सुरक्षा में चूक पाई जाए, वहाँ जवाबदेही तय करने की माँग की।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत में डिजिटल बैंकिंग की पहुँच तेजी से बढ़ी है और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ करोड़ों नागरिकों की वित्तीय व व्यक्तिगत जानकारी जुड़ी हुई है। जांच के नतीजे आने वाले समय में भारत की बैंकिंग साइबर सुरक्षा नीति की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।