शरजील इमाम की जमानत शर्त उल्लंघन पर कड़कड़डूमा कोर्ट का फैसला: बेल रद्द करने का औचित्य नहीं
सारांश
मुख्य बातें
कड़कड़डूमा अदालत ने 10 अक्टूबर 2026 को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा साजिश मामले के आरोपी शरजील इमाम की अंतरिम जमानत रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट माना कि इमाम ने मीडिया से बात नहीं करने की शर्त का उल्लंघन किया, परंतु चूँकि सात दिन की अंतरिम जमानत की अवधि उसी दिन समाप्त हो रही थी और इमाम को वैसे भी सरेंडर करना था, इसलिए जमानत रद्द करने का कोई व्यावहारिक औचित्य नहीं पाया गया।
जमानत शर्त का उल्लंघन और अदालत का तर्क
शरजील इमाम को 4 अक्टूबर से 10 अक्टूबर तक अपने चचेरे भाई की शादी में शामिल होने के लिए अंतरिम जमानत दी गई थी। जमानत देते समय अदालत ने कई शर्तें निर्धारित की थीं, जिनमें मीडिया से किसी भी प्रकार की बातचीत न करना शामिल था।
अदालत ने पाया कि इमाम ने इस शर्त का उल्लंघन करते हुए मीडिया से बातचीत की। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि अंतरिम राहत की अवधि पहले ही समाप्ति के करीब थी और व्यावहारिक दृष्टि से जमानत रद्द करने का आदेश देना निरर्थक होता।
मामले की पृष्ठभूमि
शरजील इमाम पर फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की कथित साजिश से जुड़े मामले में गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और अन्य धाराओं के तहत मुकदमा चल रहा है। वह लंबे समय से न्यायिक हिरासत में हैं।
गौरतलब है कि इससे पहले सितंबर में भी अदालत ने उन्हें पारिवारिक समारोह में शामिल होने के लिए एक सप्ताह की अंतरिम जमानत दी थी। उनकी नियमित जमानत याचिका ट्रायल कोर्ट से पहले ही खारिज हो चुकी है।
उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय का रुख
दिल्ली उच्च न्यायालय में भी शरजील इमाम ने नियमित जमानत नहीं मिलने के विरुद्ध याचिका दायर की हुई है। वहीं, दिल्ली पुलिस लगातार उनकी जमानत का विरोध करती रही है और उन्हें कथित साजिश का प्रमुख आरोपी बताती है।
यह ऐसे समय में आया है जब इस वर्ष सर्वोच्च न्यायालय भी शरजील इमाम और सह-आरोपी उमर खालिद को नियमित जमानत देने से इनकार कर चुका है। शीर्ष अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष के प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर प्रथमदृष्टया UAPA की धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर कानूनी रोक लागू होती है।
व्यापक साजिश मामले का संदर्भ
यह मामला फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों के पीछे कथित बड़ी साजिश की जाँच से जुड़ा है, जिसमें कई आरोपियों के खिलाफ UAPA और अन्य आपराधिक धाराओं के तहत मुकदमा चल रहा है। दिल्ली पुलिस के अनुसार यह एक सुनियोजित षड्यंत्र था, जबकि बचाव पक्ष इन आरोपों को निराधार बताता रहा है।
अदालत का यह फैसला UAPA मामलों में जमानत की जटिलता और न्यायिक विवेकाधिकार की सीमाओं को एक बार फिर रेखांकित करता है। इमाम की नियमित जमानत याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय में सुनवाई जारी रहेगी।