शिवसेना (यूबीटी) का 'सामना' में ऐलान: सत्ता परिवर्तन अनिवार्य, यह लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 19 अक्टूबर 2026 को अपने मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में स्पष्ट किया कि 'सत्ता परिवर्तन' — यानी राजनीतिक सत्ता में बदलाव — न केवल अनिवार्य है, बल्कि यह एक स्वाभाविक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। पार्टी ने कहा कि जनता ने इस बदलाव का फैसला कर लिया है और यह होकर रहेगा।
मुख्य घटनाक्रम
'सामना' में लिखा गया, "उनके पापों का घड़ा भर चुका है। नतीजतन, उनके मन में 'तिरंगा आंदोलन' का विरोध करने का कुविचार आया। इस घटना ने 'सत्ता परिवर्तन' की गति को और तेज कर दिया।" संपादकीय में यह भी दावा किया गया कि जो लोग भारत में तिरंगा फहराने का विरोध करते हैं, उनकी सरकार को उखाड़ फेंकना अनिवार्य है।
पार्टी के मुखपत्र में यह भी कहा गया, "संविधान के नाम पर झूठी शपथ लेने से अब कोई फायदा नहीं होगा।" यह टिप्पणी सत्तारूढ़ गठबंधन पर सीधा निशाना मानी जा रही है।
ऐतिहासिक संदर्भ और तुलना
संपादकीय में भारतीय राजनीतिक इतिहास के उदाहरण देते हुए तर्क दिया गया कि सत्ता परिवर्तन की माँग नई नहीं है। इसमें कहा गया, "आपातकाल के दौरान, उनका 'जन संघ' जनता पार्टी में इसलिए मिलाया गया था ताकि सत्ता परिवर्तन किया जा सके।"
इसके अलावा संपादकीय में वी.पी. सिंह द्वारा राजीव गांधी के विरुद्ध बगावत करके 'जनता दल' बनाने का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उस आंदोलन में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सदस्यों ने वी.पी. सिंह का समर्थन किया था और उसका एकमात्र उद्देश्य सत्ता परिवर्तन ही था। मुखपत्र ने यह भी रेखांकित किया कि भाजपा ने डॉ. मनमोहन सिंह के विरुद्ध जो अभियान चलाया, उसका मकसद भी सत्ता बदलना था।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य
शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र ने अंतरराष्ट्रीय उदाहरण भी प्रस्तुत किए। संपादकीय में कहा गया कि ईरान में सत्ता परिवर्तन को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने खुलकर अपनी मंशा जाहिर की थी और इसके लिए बड़े पैमाने पर सैन्य कदम उठाए गए। इस उदाहरण के ज़रिए मुखपत्र ने यह जताने की कोशिश की कि सत्ता परिवर्तन की इच्छा और उसके लिए संघर्ष वैश्विक राजनीति का अभिन्न हिस्सा है।
BJP पर सीधा हमला
संपादकीय में सीधे सवाल उठाया गया: "अगर विपक्ष अब यह कह रहा है कि गलत तरीके से सत्ता में आई सरकार को बदल दिया जाना चाहिए, तो इसमें गलत क्या है?" मुखपत्र ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र व राज्य सरकारें शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक आंदोलनों को अराजकता की संज्ञा देती हैं, जबकि भाजपा ने खुद इसी तरह के आंदोलनों का सहारा लिया था।
आगे की राजनीतिक दिशा
शिवसेना (यूबीटी) का यह संपादकीय ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र की राजनीति में विपक्षी एकजुटता और सत्ता के खिलाफ आंदोलन की बातें तेज़ हो रही हैं। गौरतलब है कि 'सामना' शिवसेना (यूबीटी) का आधिकारिक मुखपत्र है और इसमें छपे संपादकीय पार्टी की आधिकारिक राय मानी जाती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी इस 'सत्ता परिवर्तन' के नारे को किस रूप में ज़मीनी आंदोलन में तब्दील करती है।