15 अगस्त 2026
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तिरंगा यात्रा पर शिवसेना (यूबीटी) का हमला: 'सामना' में भाजपा पर राष्ट्रवाद की राजनीति का आरोप

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तिरंगा यात्रा पर शिवसेना (यूबीटी) का हमला: 'सामना' में भाजपा पर राष्ट्रवाद की राजनीति का आरोप

सारांश

स्वतंत्रता दिवस पर 'सामना' का संपादकीय महज़ आलोचना नहीं — यह एक ऐतिहासिक सवाल है। ठाकरे गुट ने पूछा: जो संगठन 1947 की लड़ाई से दूर रहे, वे आज तिरंगे के सबसे बड़े ध्वजवाहक कैसे बन गए? 'तिरंगा यात्रा' और 'हर घर तिरंगा' के ज़रिए BJP पर राष्ट्रवाद को चुनावी हथियार बनाने का आरोप।

मुख्य बातें

शिवसेना (यूबीटी) ने 15 अगस्त 2026 को मुखपत्र 'सामना' में BJP पर स्वतंत्रता दिवस के राजनीतिकरण का आरोप लगाया।
'तिरंगा यात्रा' और 'हर घर तिरंगा' अभियानों को सत्ताधारी पार्टी की चुनावी छवि-निर्माण की कोशिश बताया गया।
संपादकीय में कहा गया कि BJP का मूल संगठन 1947 से पहले स्वतंत्रता संग्राम से दूर रहा।
प्रधानमंत्री मोदी की लाल किले पर पगड़ी और पहनावे के चुनाव को भी आगामी राज्य चुनावों से जोड़ा गया।
ठाकरे गुट ने जंतर-मंतर के विरोध-प्रदर्शनों और बढ़ते राजनीतिक दबाव को इन अभियानों की असली वजह बताया।

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 15 अगस्त 2026 को अपने मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर आरोप लगाया कि वह 'तिरंगा यात्रा' जैसे अभियानों के ज़रिए स्वतंत्रता दिवस को एक राजनीतिक मंच में बदल रही है। पार्टी का कहना है कि पिछले एक दशक में यह राष्ट्रीय पर्व तेज़ी से एक दलीय उत्सव का रूप लेता जा रहा है।

मुख्य आरोप: तिरंगे का राजनीतिकरण

'सामना' के संपादकीय में कहा गया कि 'तिरंगा यात्रा' और 'हर घर तिरंगा' जैसे अभियानों का उद्देश्य सत्ताधारी पार्टी को राष्ट्रीय ध्वज का 'मुख्य निर्माता और रक्षक' के रूप में स्थापित करना है। संपादकीय में कहा गया, 'भव्य रैलियों का मकसद ऐसा माहौल बनाना था जैसे भारत में राष्ट्रीय ध्वज पहली बार फहराया जा रहा हो।'

ठाकरे गुट का तर्क है कि BJP ने स्वतंत्रता दिवस, राष्ट्रीय ध्वज और 'वंदे मातरम' को बड़े पैमाने पर जनसंपर्क कार्यक्रमों में तब्दील कर दिया है, जिससे इन अभियानों के समय और तीव्रता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

ऐतिहासिक संदर्भ: स्वतंत्रता संग्राम और संगठनों की भूमिका

'सामना' ने मौजूदा राजनीतिक अभियानों और ऐतिहासिक तथ्यों के बीच विरोधाभास उजागर किया। संपादकीय के अनुसार, 1947 से पहले की सुबह की रैलियों और सत्याग्रहों के दौरान BJP का मूल संगठन आज़ादी की लड़ाई से दूर रहा। जिन संगठनों ने ऐतिहासिक रूप से राष्ट्रीय ध्वज के प्रति बहुत कम लगाव दिखाया, उन्होंने अचानक इसे अपना लिया है — यह विरोधाभास, आलोचकों के अनुसार, ध्यान देने योग्य है।

संपादकीय में यह भी कहा गया कि हज़ारों स्वतंत्रता सेनानी तिरंगा थामे और 'वंदे मातरम' गाते हुए फाँसी पर चढ़ गए, जबकि आज रैलियों का नेतृत्व करने वाले न तो आज़ादी की लड़ाई में शामिल थे और न ही उन्होंने लाठीचार्ज का सामना किया।

राजनीतिक दबाव और बचाव की मुद्रा

ठाकरे गुट का आरोप है कि राष्ट्रवादी कार्यक्रमों के आयोजन की यह अचानक होड़ ऐसे समय में मची है जब राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है। जंतर-मंतर जैसी जगहों पर चल रहे विरोध-प्रदर्शनों और देशभर में बढ़ती राजनीतिक चुनौतियों ने सत्ताधारी पार्टी को बचाव की मुद्रा में ला दिया है।

यह ऐसे समय में आया है जब आने वाले राज्य चुनावों की आहट सुनाई दे रही है। 'सामना' के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लाल किले पर पारंपरिक पगड़ी और पहनावे का चुनाव भी आगामी राज्य चुनावों को ध्यान में रखकर किया गया प्रतीत होता है।

2014 से तुलना और जनमत का बदलाव

संपादकीय में कहा गया, '2014 में समर्थकों ने नरेंद्र मोदी सरकार के आने को भारतीय स्वतंत्रता का असली सवेरा बताया था। आज जब जनता की सोच बदल रही है, तो जो लोग कभी झंडे को सिर्फ एक सरकारी औपचारिकता मानते थे, वे अब अपनी जन-छवि को मजबूत करने के लिए कट-आउट, रैलियों और देश भर में होने वाले कार्यक्रमों पर भारी रकम खर्च कर रहे हैं।'

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब विपक्षी दलों ने स्वतंत्रता दिवस के इर्द-गिर्द होने वाले सरकारी आयोजनों पर सवाल उठाए हों — लेकिन इस बार आलोचना का स्वर पहले से अधिक तीखा और ऐतिहासिक संदर्भों से लैस है। आने वाले हफ्तों में BJP की प्रतिक्रिया और राज्य चुनावों की दिशा यह तय करेगी कि यह बहस किस रूप लेती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसके भीतर एक गहरा सवाल है — क्या राष्ट्रीय प्रतीकों पर 'स्वामित्व' का दावा करना लोकतंत्र में वैध राजनीतिक रणनीति है या सांस्कृतिक हड़प? 'हर घर तिरंगा' जैसे अभियान नागरिक भागीदारी बढ़ाने के लिहाज़ से सराहनीय हो सकते हैं, लेकिन जब उन्हें पार्टी-ब्रांडिंग के साथ जोड़ा जाता है तो रेखा धुंधली हो जाती है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इस विरोधाभास को नज़रअंदाज़ करती है कि जो दल ऐतिहासिक रूप से स्वतंत्रता आंदोलन से अनुपस्थित रहे, वे आज देशभक्ति के सबसे मुखर प्रवक्ता हैं — और इस पर बहस होनी चाहिए।
RashtraPress
15 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिवसेना (यूबीटी) ने 'तिरंगा यात्रा' पर क्या आरोप लगाए?
शिवसेना (यूबीटी) ने 'सामना' संपादकीय में कहा कि 'तिरंगा यात्रा' अभियान का असली मकसद BJP को राष्ट्रीय ध्वज का मुख्य संरक्षक दिखाना है, न कि देशभक्ति को बढ़ावा देना। पार्टी का आरोप है कि स्वतंत्रता दिवस को चुनावी लाभ के लिए राजनीतिक मंच में बदला जा रहा है।
'सामना' ने BJP और स्वतंत्रता संग्राम पर क्या कहा?
'सामना' ने कहा कि 1947 से पहले BJP का मूल संगठन स्वतंत्रता आंदोलन से दूर रहा और उसने न लाठीचार्ज सहा, न बलिदान दिया। ऐसे में अचानक तिरंगे को अपनाने की होड़ पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या यह आलोचना किसी राज्य चुनाव से जुड़ी है?
ठाकरे गुट ने सीधे तौर पर आगामी राज्य चुनावों का उल्लेख करते हुए कहा कि PM मोदी की लाल किले पर पगड़ी और पहनावे का चुनाव भी चुनावी ध्रुवीकरण को ध्यान में रखकर किया गया लगता है। जंतर-मंतर के विरोध-प्रदर्शनों और बढ़ते राजनीतिक दबाव को भी इन अभियानों की पृष्ठभूमि बताया गया।
'हर घर तिरंगा' अभियान पर शिवसेना (यूबीटी) का क्या रुख है?
शिवसेना (यूबीटी) ने 'हर घर तिरंगा' और 'तिरंगा यात्रा' दोनों अभियानों को BJP की जनसंपर्क रणनीति का हिस्सा बताया। पार्टी का कहना है कि इन अभियानों के ज़रिए राष्ट्रीय ध्वज और 'वंदे मातरम' को दलीय प्रचार के साधन में बदला जा रहा है।
2014 से अब तक BJP की देशभक्ति-छवि पर 'सामना' ने क्या कहा?
'सामना' ने कहा कि 2014 में मोदी सरकार के आने को 'असली स्वतंत्रता का सवेरा' बताने वाले समर्थक अब जनमत बदलने पर कट-आउट, रैलियों और भारी खर्च के ज़रिए छवि सुधारने में लगे हैं। संपादकीय के अनुसार, यह बदलाव राजनीतिक दबाव का संकेत है।
राष्ट्र प्रेस
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