वंदे मातरम विवाद: शिवसेना (यूबीटी) ने भाजपा पर 'बौद्धिक दिवालियापन' का आरोप लगाया, ऐतिहासिक तथ्यों से दिया जवाब
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने मंगलवार, 18 अगस्त को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर सीधा हमला बोला और सत्ताधारी पार्टी पर राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' को लेकर बेवजह राजनीतिक विवाद खड़ा करने का आरोप लगाया। मुंबई से प्रकाशित शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र 'सामना' में छपे एक तीखे संपादकीय में ठाकरे गुट ने कहा कि भाजपा का यह रवैया 'बौद्धिक दिवालियापन' और राजनीतिक हताशा का प्रमाण है।
संपादकीय में क्या कहा गया
संपादकीय में स्पष्ट शब्दों में कहा गया कि भारत की आजादी की लड़ाई, देश के ऐतिहासिक पड़ावों या 'वंदे मातरम' और 'इंकलाब जिंदाबाद' जैसे प्रतिष्ठित नारों में भाजपा की कोई भूमिका नहीं रही। संपादकीय के अनुसार, 'वंदे मातरम को राजनीतिक लड़ाई में घसीटना और विरोधियों पर 'बौद्धिक नक्सलवाद' का आरोप लगाना, ऐतिहासिक समझ की कमी और राजनीतिक हताशा को दर्शाता है।'
संपादकीय में भाजपा के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर भी निशाना साधा गया। इसमें उनकी मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाली बंगाल कैबिनेट में भागीदारी का उल्लेख किया गया और आरोप लगाया गया कि उन्होंने 'भारत छोड़ो आंदोलन' सहित ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलनों को दबाने की वकालत की थी।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह हमला संसद की कार्यवाही को लेकर विपक्ष और केंद्र सरकार के बीच बढ़ते तनाव के बीच हुआ। संपादकीय के अनुसार, कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने हाल ही में संसद में हंगामा किया और जंतर-मंतर पर पैलेट गन से फायरिंग की कथित घटना को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बयान और माफी की मांग की। इस पर गृह मंत्री शाह ने कथित तौर पर संसद सत्र से किनारा किया और बाद में कांग्रेस के 'वंदे मातरम' पर रुख को 'बौद्धिक नक्सलवाद' करार दिया।
शिवसेना (यूबीटी) ने तर्क दिया कि राजनीतिक विरोधियों से माफी मांगने के बजाय भाजपा को स्वाधीनता आंदोलन के साथ ऐतिहासिक धोखे के लिए देश से माफी मांगनी चाहिए।
वंदे मातरम की ऐतिहासिक विरासत
संपादकीय में इस गीत की गौरवशाली विरासत का विस्तृत उल्लेख किया गया। 1896 के कोलकाता अधिवेशन में रहमतुल्ला एम. सयानी की अध्यक्षता में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार 'वंदे मातरम' गाया था। जब ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने इस गीत पर प्रतिबंध लगाया और गाने वालों को गिरफ्तार किया, तो कांग्रेस के सदस्यों और वामपंथियों ने इसके समर्थन में जेल जाने का रास्ता चुना।
1937 में महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, मौलाना आजाद, गोविंद वल्लभ पंत और आचार्य कृपलानी के नेतृत्व वाली कांग्रेस कार्यसमिति ने सर्वसम्मति से इस गीत के पहले दो छंदों को अपनाया — यह निर्णय नेताजी बोस को लिखे रवींद्रनाथ टैगोर के एक पत्र में दी गई सलाह के बाद लिया गया था। संपादकीय में यह भी रेखांकित किया गया कि सुचेता कृपलानी ने नेहरू के ऐतिहासिक 'नियति से साक्षात्कार' भाषण से पहले संसद के विशेष मध्यरात्रि सत्र में 'वंदे मातरम' गाया था।
राष्ट्रीय प्रतीकों पर सरकार की आलोचना
ठाकरे गुट ने मौजूदा सरकार द्वारा राष्ट्रीय प्रतीकों और संस्थानों को संभालने के तरीके की भी कड़ी आलोचना की। संपादकीय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ऐतिहासिक संसद भवन को बंद करने का आरोप लगाया गया, जहाँ भारत की आजादी की शुरुआत हुई थी, और उसकी जगह एक ऐसी नई इमारत बनाने की बात कही गई जिसे संपादकीय में 'निजी गुजराती मैरिज हॉल' जैसा बताया गया।
इसके अलावा, शिवसेना (यूबीटी) ने इस बात पर जोर दिया कि भाजपा के वैचारिक जनक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने आजादी के बाद लगभग 50 वर्षों तक अपने कार्यालयों या शाखाओं पर भारतीय तिरंगा नहीं फहराया।
संपादकीय में 17 नवंबर 1817 को पुणे के शनिवार वाडा में बालाजीपंत नाटू द्वारा मराठा ध्वज उतारकर ब्रिटिश यूनियन जैक फहराने की घटना का भी उल्लेख किया गया। साथ ही बताया गया कि 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता सेनानी क्रांतिसिंह नाना पाटिल ने 'वंदे मातरम' के नारों के बीच उसी ऐतिहासिक स्थल पर यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराया था।
पूर्व उपराष्ट्रपति का संदर्भ और आगे की राह
पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू के पुराने बयानों का हवाला देते हुए संपादकीय में इस बात पर जोर दिया गया कि 'वंदे मातरम' को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रखा जाना चाहिए। गौरतलब है कि यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब संसद का मानसून सत्र पहले से ही गतिरोध का सामना कर रहा है। यह देखना बाकी है कि भाजपा इन आरोपों का औपचारिक जवाब देती है या नहीं।