नीति आयोग की कार्यशाला: GIS और डिजिटल प्लानिंग से मजबूत होंगी ग्राम पंचायतें, 'विकसित भारत 2047' पर फोकस
सारांश
मुख्य बातें
नीति आयोग ने 28 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में अपनी स्टेट सपोर्ट मिशन (SSM) पहल के अंतर्गत एक राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की, जिसका विषय था — 'विकसित पंचायत: लोगों, स्थानों, संसाधनों और अवसरों को जोड़ना।' इस आयोजन का केंद्रीय लक्ष्य ग्राम पंचायतों को 'विकसित भारत 2047' के संकल्प के अनुरूप सक्षम, डिजिटल और जवाबदेह संस्थाओं के रूप में तैयार करना था। कार्यशाला असम सरकार के गोलाप बोरबोरा स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास (GBSIPRD) के सहयोग से आयोजित की गई।
कार्यशाला के मुख्य उद्देश्य
उद्घाटन सत्र में विकेंद्रीकृत शासन, क्षमता निर्माण, डिजिटलाइजेशन और विभिन्न सरकारी योजनाओं के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि पंचायतों को समावेशी विकास, बेहतर जन-सेवा और सतत ग्रामीण विकास की दिशा में प्रभावी भूमिका निभाने के लिए उनकी संस्थागत क्षमता को व्यापक स्तर पर मजबूत करना होगा।
यह कार्यशाला ऐसे समय में आई है जब केंद्र सरकार 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में नीतिगत ढाँचा तैयार कर रही है और पंचायती राज संस्थाओं को इस रणनीति की आधारशिला माना जा रहा है।
GIS और डिजिटल प्लानिंग पर विशेष जोर
कार्यशाला में स्थानीय विकास की पारंपरिक क्षेत्र-आधारित सोच से आगे बढ़कर स्थानिक एवं एकीकृत योजना (Spatial and Integrated Planning) अपनाने पर विस्तृत चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने जीआईएस (GIS), जियोस्पेशियल डेटा, ग्राम मास्टर प्लान और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के उपयोग को स्थानीय संसाधनों की सटीक पहचान के लिए अनिवार्य बताया।
इन तकनीकों के माध्यम से बुनियादी ढाँचे की कमी, भूमि उपयोग के पैटर्न और विकास की संभावित क्षेत्रों की अधिक प्रभावी तरीके से पहचान की जा सकती है। साथ ही, ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP), ई-ग्रामस्वराज और पंचायत एडवांसमेंट इंडेक्स (PAI) के साथ स्थानिक सूचनाओं को एकीकृत करने पर बल दिया गया, ताकि साक्ष्य-आधारित और बेहतर समन्वित विकास योजनाएँ तैयार की जा सकें।
संवैधानिक ढाँचा और संसाधनों की जरूरत
प्रतिभागियों ने पंचायती राज संस्थाओं के संवैधानिक आधार और 73वें संविधान संशोधन के प्रावधानों पर भी चर्चा की। बैठक में कहा गया कि पंचायतों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए स्पष्ट कार्य विभाजन, पर्याप्त वित्तीय संसाधन, उचित मानव संसाधन और निर्णय लेने की व्यापक शक्तियाँ देना अपरिहार्य है। ग्राम सभाओं की भूमिका विस्तारित करने और संस्थागत जवाबदेही को सुदृढ़ करने पर भी विशेष जोर दिया गया।
गौरतलब है कि 73वाँ संविधान संशोधन 1992 में लागू हुआ था, जिसने पंचायतों को सैद्धांतिक रूप से शासन का तीसरा स्तर बनाया — लेकिन तीन दशक बाद भी अधिकांश राज्यों में वास्तविक वित्तीय और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण अधूरा बना हुआ है।
क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण की प्राथमिकता
कार्यशाला में निर्वाचित प्रतिनिधियों और पंचायत कर्मियों को डेटा विश्लेषण, संसाधन जुटाने, निवेश प्राथमिकता निर्धारण, योजनाओं के समन्वय और परिणामों की निगरानी जैसे विषयों पर प्रशिक्षित करने की जरूरत रेखांकित की गई। डिजिटल और हाइब्रिड शिक्षण मॉडल, तकनीकी सहायता और क्षमता विकास कार्यक्रमों को बढ़ावा देने का भी सुझाव दिया गया।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
नीति आयोग के सदस्य डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम ने कहा कि पंचायत स्तर की योजना को केवल अलग-अलग क्षेत्रों तक सीमित रखने के बजाय स्थानिक योजना के दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। उन्होंने मानव पूंजी, सामाजिक पूंजी और स्थानीय आर्थिक क्लस्टरों के विकास पर अधिक ध्यान देने की वकालत की।
उनके अनुसार, पंचायत स्तर पर संसाधनों और अवसरों की बेहतर पहचान से ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिल सकती है। कार्यशाला में चिह्नित प्राथमिकताओं में पंचायतों को स्पष्ट कार्य आवंटन, वित्तीय संसाधनों में वृद्धि, स्वयं के राजस्व स्रोतों का विकास, तकनीकी सहायता और जिला योजना समितियों को अधिक सक्रिय बनाना शामिल रहा। विभिन्न सरकारी विभागों के बीच समन्वय और ग्रामीण-शहरी विकास योजनाओं को जिला स्तर पर एकीकृत करने का सुझाव भी सामने आया।
आने वाले महीनों में इस कार्यशाला में उभरी सिफारिशों को नीति आयोग की आगामी रिपोर्टों और राज्य सरकारों के साथ साझेदारी में लागू किए जाने की उम्मीद है।