19 सितंबर 2026
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बीएयू सबौर में अंतर्राष्ट्रीय सस्य वैज्ञानिक दिवस पर कार्यशाला, 'विकसित भारत 2047' की दिशा तय

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बीएयू सबौर में अंतर्राष्ट्रीय सस्य वैज्ञानिक दिवस पर कार्यशाला, 'विकसित भारत 2047' की दिशा तय

सारांश

भागलपुर के बीएयू सबौर में अंतर्राष्ट्रीय सस्य वैज्ञानिक दिवस पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला ने 'विकसित भारत 2047' के लिए कृषि की पुनर्कल्पना की। वैज्ञानिकों, प्राध्यापकों और छात्रों ने डिजिटल कृषि, ड्रोन तकनीक और जलवायु-अनुकूल खेती पर विचार-विमर्श किया।

मुख्य बातें

बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर, भागलपुर में 19 सितंबर 2026 को अंतर्राष्ट्रीय सस्य वैज्ञानिक दिवस पर एक दिवसीय विशेष कार्यशाला आयोजित हुई।
कार्यशाला का विषय 'विकसित भारत 2047 के लिए सस्य विज्ञान की पुनर्कल्पना' था।
सिंह ने उत्पादकता, किसान आय और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण को एकसाथ साधने वाली सस्य तकनीकों की आवश्यकता बताई।
डिजिटल कृषि, सटीक खेती, ड्रोन तकनीक, फसल विविधीकरण और मृदा स्वास्थ्य पर गहन तकनीकी चर्चा हुई।
वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला से किसान के खेत तक तकनीक पहुँचाने के लिए कृषि प्रसार तंत्र को मजबूत करने पर जोर दिया।

बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर, भागलपुर में 19 सितंबर 2026 को इंडियन सोसाइटी ऑफ एग्रोनॉमी (आईएसए), बीएयू सबौर चैप्टर के तत्वावधान में अंतर्राष्ट्रीय सस्य वैज्ञानिक दिवस के अवसर पर एक दिवसीय विशेष कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला का केंद्रीय विषय 'विकसित भारत 2047 के लिए सस्य विज्ञान की पुनर्कल्पना' था, जिसमें विश्वविद्यालय के वरिष्ठ पदाधिकारियों, वैज्ञानिकों, प्राध्यापकों और स्नातकोत्तर छात्रों ने सक्रिय भागीदारी निभाई।

कार्यशाला का उद्देश्य और परिप्रेक्ष्य

कार्यशाला का मूल उद्देश्य यह था कि बदलते जलवायु परिदृश्य, प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव और बढ़ती वैश्विक खाद्य मांग के बीच सस्य विज्ञान को परंपरागत उत्पादन-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे ले जाया जाए। वक्ताओं ने एकमत से कहा कि अब टिकाऊ, तकनीक-सक्षम एवं किसान-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना समय की माँग है। गौरतलब है कि भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर चल रहा है, और कृषि क्षेत्र में नवाचार इस यात्रा का अभिन्न हिस्सा माना जा रहा है।

मुख्य वक्ताओं की बातें

अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. ए.के. सिंह, निदेशक अनुसंधान एवं अध्यक्ष, आईएसए बीएयू सबौर चैप्टर, ने कहा कि वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के लक्ष्य को हासिल करने में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उन्होंने जोर दिया कि ऐसी सस्य तकनीकों का विकास आवश्यक है जो उत्पादकता एवं किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ मृदा, जल एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित करें। उन्होंने वैज्ञानिकों से कृषि में नवाचार एवं तकनीकी हस्तक्षेप को बढ़ावा देने का आह्वान किया।

डॉ. संजय कुमार, डीन, पीजीएस एवं सचिव, आईएसए बीएयू सबौर चैप्टर, ने उच्च शिक्षा, अनुसंधान एवं नवाचार के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। उनका कहना था कि भविष्य के कृषि वैज्ञानिकों को जलवायु-स्मार्ट सस्य विज्ञान, सटीक कृषि और डिजिटल कृषि तकनीकों में दक्ष बनाना अब अनिवार्य है।

डॉ. राजेश कुमार, निदेशक प्रशासन एवं उपाध्यक्ष, आईएसए बीएयू सबौर चैप्टर, ने विश्वविद्यालय की ओर से अनुसंधान एवं नवाचार को हरसंभव सहयोग देने की प्रतिबद्धता जताई। उन्होंने प्रयोगशाला में विकसित तकनीकों को किसानों के खेतों तक पहुँचाने के लिए प्रभावी कृषि प्रसार तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता रेखांकित की।

डॉ. एस. आचार्य, कोषाध्यक्ष, आईएसए बीएयू सबौर चैप्टर, ने चैप्टर की गतिविधियों और संगठनात्मक रूपरेखा पर प्रकाश डाला और सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

तकनीकी चर्चा के प्रमुख विषय

कार्यशाला में टिकाऊ कृषि, मृदा स्वास्थ्य एवं जलवायु अनुकूलन, संसाधन-उपयोग दक्षता, डिजिटल एवं सटीक कृषि, ड्रोन एवं आधुनिक कृषि तकनीक, फसल विविधीकरण और कृषि में नवाचार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन तकनीकी विचार-विमर्श हुआ। यह ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार कृषि क्षेत्र में डिजिटलीकरण और जलवायु-अनुकूल खेती को नीतिगत प्राथमिकता दे रही है।

कार्यशाला का निष्कर्ष और आगे की दिशा

कार्यक्रम ने 'विकसित भारत 2047' के व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप कृषि अनुसंधान, शिक्षा और नवाचार की नई दिशा तय करने की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया। विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के वैज्ञानिकों और प्राध्यापकों की सक्रिय भागीदारी ने इस संकल्प को और मजबूती दी कि आने वाले वर्षों में सस्य विज्ञान को व्यावहारिक, तकनीक-युक्त और किसान-हितैषी बनाना होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली चुनौती इन संकल्पों को सेमिनार हॉल से निकालकर बिहार के खेतों तक ले जाने की है। राज्य में कृषि प्रसार तंत्र की कमजोरियाँ पहले से दर्ज हैं — प्रयोगशाला में विकसित तकनीकें अक्सर नीति की अलमारियों तक ही सिमट जाती हैं। 'विकसित भारत 2047' का नारा तभी सार्थक होगा जब ड्रोन तकनीक और सटीक कृषि के लाभ छोटे और सीमांत किसानों तक सुलभ और किफायती दोनों हों — जो अभी एक खुला प्रश्न है।
RashtraPress
19 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बीएयू सबौर में अंतर्राष्ट्रीय सस्य वैज्ञानिक दिवस कार्यशाला का विषय क्या था?
कार्यशाला का मुख्य विषय 'विकसित भारत 2047 के लिए सस्य विज्ञान की पुनर्कल्पना' था। इसमें टिकाऊ कृषि, डिजिटल खेती, ड्रोन तकनीक और जलवायु-अनुकूल सस्य विज्ञान पर गहन विचार-विमर्श हुआ।
इस कार्यशाला में किसने भाग लिया?
कार्यशाला में बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर के विभिन्न विभागों के वरिष्ठ पदाधिकारी, वैज्ञानिक, प्राध्यापक और स्नातकोत्तर छात्र शामिल हुए। इसका आयोजन इंडियन सोसाइटी ऑफ एग्रोनॉमी (आईएसए), बीएयू सबौर चैप्टर ने किया।
सस्य विज्ञान को 'विकसित भारत 2047' से कैसे जोड़ा गया?
वक्ताओं ने कहा कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य में कृषि की केंद्रीय भूमिका है। इसके लिए ऐसी सस्य तकनीकों की जरूरत है जो उत्पादकता और किसान आय बढ़ाने के साथ-साथ मृदा, जल एवं प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी करें।
कार्यशाला में किन प्रमुख कृषि तकनीकों पर चर्चा हुई?
कार्यशाला में सटीक कृषि, ड्रोन तकनीक, डिजिटल कृषि, मृदा स्वास्थ्य, जलवायु अनुकूलन, फसल विविधीकरण और संसाधन-उपयोग दक्षता जैसे विषयों पर तकनीकी सत्र आयोजित हुए।
प्रयोगशाला से किसान के खेत तक तकनीक पहुँचाने पर क्या जोर दिया गया?
डॉ. राजेश कुमार ने कहा कि प्रयोगशाला में विकसित तकनीकों को कृषक खेतों तक पहुँचाने के लिए प्रभावी कृषि प्रसार तंत्र को मजबूत करना आवश्यक है। विश्वविद्यालय ने इस दिशा में हरसंभव सहयोग की प्रतिबद्धता जताई।
राष्ट्र प्रेस
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