शुभांशु शुक्ला ने ISS की छत से लटककर शेयर की फोटो, बोले — अंतरिक्ष में दिशा बस आपसी सहमति है

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शुभांशु शुक्ला ने ISS की छत से लटककर शेयर की फोटो, बोले — अंतरिक्ष में दिशा बस आपसी सहमति है

सारांश

ISS पर जाने वाले पहले भारतीय ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने छत से लटकते हुए एक फोटो साझा कर बताया कि अंतरिक्ष में 'ऊपर-नीचे' का कोई मतलब नहीं — दिशा वहाँ सिर्फ आपसी सहमति से तय होती है। यह पोस्ट उनके 2025 के 18 दिवसीय ISS मिशन के अनुभवों की झलक है।

मुख्य बातें

ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने 20 मई 2026 को इंस्टाग्राम पर ISS मॉड्यूल की छत से लटकते हुए फोटो साझा की।
शुभांशु ने 2025 में 18 दिनों का सफल ISS मिशन पूरा किया था और वह यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले भारतीय ग्रुप कैप्टन हैं।
उन्होंने बताया कि ISS पर शून्य गुरुत्वाकर्षण के कारण 'ऊपर', 'नीचे' और 'फर्श' जैसे शब्दों का कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं रहता।
एक अनुभवी अंतरिक्ष यात्री ने उन्हें छत की ओर चलना सिखाकर यह अहसास दिलाया कि अंतरिक्ष में दिशा केवल आपसी सहमति की बात है।
शुभांशु ने बताया कि उनकी खुद की खींची फोटो साझा की गई तस्वीर से कहीं बेहतर थी।

भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्लाअंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) तक पहुँचने वाले पहले भारतीय ग्रुप कैप्टन — ने 20 मई 2026 को इंस्टाग्राम पर एक दिलचस्प पोस्ट साझा की, जिसमें वह ISS के एक मॉड्यूल की छत से लटकते हुए फोटो खिंचवाते नज़र आ रहे हैं। 2025 में 18 दिनों के सफल मिशन के बाद स्वदेश लौटे शुभांशु अपने अंतरिक्ष अनुभव नियमित रूप से प्रशंसकों के साथ साझा करते रहते हैं।

मुख्य घटनाक्रम

शुभांशु ने इस पोस्ट में स्पष्ट किया कि ISS पर कोई निश्चित 'ऊपर' या 'नीचे' नहीं होता। उन्होंने लिखा, 'ऑर्बिट में दिशा का मतलब ही पूरी तरह बदल जाता है। ग्रैविटी न होने की वजह से 'ऊपर', 'नीचे' और 'फर्श' जैसे शब्द बस पुरानी यादों से ज़्यादा कुछ नहीं रह जाते।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि अंतरिक्ष में आप खुद को ऐसी जगहों पर आराम करते पाते हैं, जहाँ धरती पर होने पर लोग आपकी परवरिश पर सवाल उठा सकते हैं।

अनुभवी यात्री की सीख

शुभांशु ने स्टेशन पर अपने शुरुआती दिनों की एक रोचक घटना का ज़िक्र किया। उन्होंने बताया कि उनका दिमाग शुरू में फर्श पर चलने की पुरानी आदत पर अड़ा रहता था, भले ही वहाँ कोई निश्चित फर्श थी ही नहीं। एक बार जब वह एक मॉड्यूल से गुज़रने का इंतज़ार कर रहे थे, तभी एक अनुभवी अंतरिक्ष यात्री ने उनका हाथ पकड़ा और उन्हें छत की तरफ ले जाकर कहा — 'यहाँ चलो।'

उस एक पल ने उनकी सोच बदल दी। शुभांशु ने लिखा, 'बस उसी पल मुझे समझ आ गया कि अंतरिक्ष में दिशा का मतलब बस आपसी सहमति की बात है।'

फोटो पर शुभांशु की टिप्पणी

शुभांशु ने पोस्ट में छत से लटकते हुए अपनी फोटो साझा करते हुए यह भी बताया कि यह तस्वीर तो अच्छी आई है, लेकिन जो उन्होंने खुद खींची थी, वह इससे कहीं बेहतर थी। यह हल्का-फुल्का टिप्पणी उनके अंतरिक्ष अनुभव की सहजता को दर्शाती है।

आम जनता पर असर

शुभांशु की यह पोस्ट युवाओं और अंतरिक्ष विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों के बीच खासी चर्चा में है। गौरतलब है कि 2025 का उनका 18 दिवसीय ISS मिशन भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि था, और इस तरह के व्यक्तिगत अनुभव साझा करना अंतरिक्ष विज्ञान को आम लोगों के करीब लाने का काम करता है।

यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपने गगनयान कार्यक्रम के तहत मानव अंतरिक्ष उड़ान की तैयारियाँ तेज़ कर रहा है, और शुभांशु जैसे अनुभवी अंतरिक्ष यात्रियों की कहानियाँ इस दिशा में प्रेरणा का काम करती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

एक अनुभवी अंतरिक्ष यात्री का इस तरह सहज और व्यक्तिगत अनुभव साझा करना जनता में वैज्ञानिक जिज्ञासा जगाने का सबसे प्रभावी तरीका है। हालाँकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि ISS पर भारत की उपस्थिति अभी भी सहयोगी मिशनों पर निर्भर है — स्वतंत्र मानव अंतरिक्ष उड़ान की क्षमता अभी निर्माणाधीन है।
RashtraPress
20 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शुभांशु शुक्ला कौन हैं और उन्होंने ISS की यात्रा कब की?
शुभांशु शुक्ला भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन हैं और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) तक पहुँचने वाले पहले भारतीय ग्रुप कैप्टन हैं। उन्होंने 2025 में 18 दिनों का सफल मिशन पूरा किया था।
शुभांशु शुक्ला ने अपनी इंस्टाग्राम पोस्ट में क्या साझा किया?
उन्होंने ISS के एक मॉड्यूल की छत से लटकते हुए अपनी फोटो साझा की और बताया कि अंतरिक्ष में शून्य गुरुत्वाकर्षण के कारण 'ऊपर' और 'नीचे' जैसे शब्दों का कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं रहता — दिशा वहाँ केवल आपसी सहमति से तय होती है।
ISS पर दिशा का निर्धारण कैसे होता है?
शुभांशु के अनुसार, ISS पर कोई निश्चित 'ऊपर' या 'नीचे' नहीं होता क्योंकि वहाँ गुरुत्वाकर्षण नहीं है। अंतरिक्ष यात्री आपस में तय करते हैं कि किस दिशा को क्या माना जाए, यानी दिशा पूरी तरह आपसी सहमति पर आधारित होती है।
शुभांशु शुक्ला को अंतरिक्ष में दिशा का अहसास कैसे हुआ?
शुभांशु ने बताया कि स्टेशन पर शुरुआती दिनों में एक अनुभवी अंतरिक्ष यात्री ने उनका हाथ पकड़कर उन्हें छत की तरफ ले जाया और कहा 'यहाँ चलो।' उसी पल उन्हें समझ आया कि अंतरिक्ष में दिशा बस आपसी सहमति की बात है।
शुभांशु शुक्ला के ISS मिशन का भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए क्या महत्व है?
शुभांशु का 2025 का 18 दिवसीय ISS मिशन भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि था। यह ऐसे समय में आया जब भारत अपने गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम की तैयारियाँ कर रहा है, और उनके अनुभव भावी अंतरिक्ष यात्रियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
राष्ट्र प्रेस
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