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सिद्धबली मंदिर: खोह नदी के तट पर बसा हनुमान का प्राचीन सिद्धपीठ, CM धामी ने शेयर किया वीडियो

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सिद्धबली मंदिर: खोह नदी के तट पर बसा हनुमान का प्राचीन सिद्धपीठ, CM धामी ने शेयर किया वीडियो

सारांश

गढ़वाल के प्रवेश द्वार कोटद्वार में खोह नदी के किनारे बसा सिद्धबली मंदिर सदियों पुरानी आस्था और गुरु गोरखनाथ की तपस्या की गाथा समेटे हुए है। CM धामी ने 6 अक्टूबर को इसका वीडियो शेयर कर मंदिर की विशेषताओं को देशभर के श्रद्धालुओं के सामने रखा।

मुख्य बातें

श्री सिद्धबली मंदिर , कोटद्वार (पौड़ी गढ़वाल), खोह नदी के तट पर स्थित भगवान हनुमान का प्राचीन सिद्धपीठ है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 6 अक्टूबर 2026 को एक्स पर मंदिर का विशेष वीडियो साझा किया।
मनोकामना पूरी होने पर नारियल तोड़ने की विशेष परंपरा यहाँ प्रचलित है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार गुरु गोरखनाथ की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान हनुमान ने यहाँ साक्षात दर्शन दिए थे, जिससे स्थान का नाम ' सिद्धबली ' पड़ा।
गर्भ गृह में मूर्ति से भी पूर्व की ' सिद्ध पिंडियाँ ' आज भी मुख्य पूजा का केंद्र हैं।

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कोटद्वार में खोह नदी के तट पर स्थित श्री सिद्धबली मंदिर भगवान हनुमान को समर्पित एक प्राचीन और अत्यंत प्रसिद्ध सिद्धपीठ है, जहाँ मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु नारियल तोड़ने की विशेष परंपरा निभाते हैं। मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस मंदिर का एक विशेष वीडियो साझा कर इसके महत्व को रेखांकित किया।

मुख्यमंत्री धामी की पोस्ट और मंदिर की विशेषता

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, 'पौड़ी गढ़वाल जिले के कोटद्वार में स्थित सिद्धबली मंदिर भगवान हनुमान को समर्पित है। यह मंदिर खास तौर पर हनुमान जयंती और दूसरे धार्मिक आयोजनों के मौके पर बड़ी संख्या में भक्तों को अपनी ओर खींचता है।' उन्होंने यह भी लिखा कि यह पवित्र स्थान अपने शानदार माहौल, निरंतर हनुमान चालीसा के पाठ और विशेष धार्मिक रस्मों के लिए जाना जाता है।

शिवालिक पहाड़ियों की शांत गोद में बसा यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का एक अनुपम स्रोत भी माना जाता है। मंदिर के चारों ओर हरी-भरी पहाड़ियों की श्रृंखलाएँ और प्राकृतिक वातावरण भक्तों को अलौकिक अनुभव प्रदान करती हैं।

नारियल तोड़ने की विशेष परंपरा

इस मंदिर में नारियल चढ़ाने और मनोकामना पूरी होने पर नारियल तोड़ने की एक विशिष्ट परंपरा प्रचलित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहाँ सच्चे मन से आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु की मनोकामना पूरी होती है और बाबा के दरबार से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता।

पौराणिक महत्व और 'सिद्धबली' नाम का इतिहास

स्थानीय लोगों का कहना है कि इसी स्थल पर गुरु गोरखनाथ और भगवान हनुमान के बीच भेंट व साधना से जुड़े प्रसंग का उल्लेख पौराणिक कथाओं में मिलता है। नाथ संप्रदाय के महान गुरु गोरखनाथ ने अपने शिष्यों के साथ इस पावन स्थल पर दीर्घकाल तक कठोर तपस्या की थी।

कहा जाता है कि उनकी अटूट साधना से प्रसन्न होकर भगवान हनुमान ने उन्हें यहीं साक्षात दर्शन दिए थे। इसी कारण इस स्थान का नाम 'सिद्धबली' पड़ा — 'सिद्ध' अर्थात तपस्या से सिद्ध, और 'बली' अर्थात बलशाली हनुमान।

गर्भ गृह और सिद्ध पिंडियाँ

मंदिर के गर्भ गृह में भगवान हनुमान की मूर्ति स्थापित होने से पहले से ही प्राचीन काल से 'सिद्ध पिंडियाँ' विद्यमान हैं, जिनकी पूजा यहाँ मुख्य रूप से की जाती है। यह तथ्य मंदिर की पुरातनता और आध्यात्मिक गहराई को और अधिक रेखांकित करता है।

श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र

गौरतलब है कि कोटद्वार को गढ़वाल का प्रवेश द्वार माना जाता है, और सिद्धबली मंदिर यहाँ आने वाले तीर्थयात्रियों और पर्यटकों, दोनों के लिए एक अनिवार्य पड़ाव बन चुका है। हनुमान जयंती और अन्य प्रमुख धार्मिक अवसरों पर यहाँ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। मुख्यमंत्री धामी की इस पोस्ट से मंदिर की ओर देशभर के श्रद्धालुओं का ध्यान एक बार फिर आकर्षित हुआ है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिससे तीर्थाटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था दोनों को बल मिले। गौरतलब है कि केदारनाथ और बदरीनाथ जैसे बड़े धामों की चमक में कोटद्वार जैसे अपेक्षाकृत कम-चर्चित पर्वतीय तीर्थ अक्सर पीछे रह जाते हैं; धामी की यह पहल उस असंतुलन को थोड़ा पाटती है। असली परीक्षा यह होगी कि सोशल मीडिया पर मिली दृश्यता को ठोस अवसंरचना और श्रद्धालु-सुविधाओं में कब रूपांतरित किया जाएगा।
RashtraPress
6 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सिद्धबली मंदिर कहाँ स्थित है?
सिद्धबली मंदिर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कोटद्वार में खोह नदी के तट पर स्थित है। यह गढ़वाल का प्रवेश द्वार माना जाने वाला कोटद्वार शहर का प्रमुख धार्मिक स्थल है।
सिद्धबली मंदिर का नाम 'सिद्धबली' क्यों पड़ा?
पौराणिक मान्यता के अनुसार नाथ संप्रदाय के गुरु गोरखनाथ ने इस स्थल पर कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान हनुमान ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए। 'सिद्ध' का अर्थ है तपस्या से सिद्ध और 'बली' का अर्थ है बलशाली हनुमान — इसी से स्थान का नाम 'सिद्धबली' पड़ा।
मंदिर में नारियल तोड़ने की परंपरा क्या है?
यहाँ मान्यता है कि भक्त मनोकामना लेकर नारियल चढ़ाते हैं और इच्छा पूरी होने पर मंदिर में आकर नारियल तोड़ते हैं। यह परंपरा मंदिर की विशिष्ट पहचान है और हजारों श्रद्धालु इसे नियमित रूप से निभाते हैं।
CM धामी ने सिद्धबली मंदिर पर पोस्ट कब और किस माध्यम से की?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 6 अक्टूबर 2026, मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का विशेष वीडियो साझा किया। इसमें उन्होंने मंदिर की धार्मिक महत्ता और वहाँ होने वाले आयोजनों का उल्लेख किया।
सिद्धबली मंदिर के गर्भ गृह में क्या विशेषता है?
मंदिर के गर्भ गृह में भगवान हनुमान की मूर्ति स्थापित होने से भी पहले प्राचीन काल से 'सिद्ध पिंडियाँ' विद्यमान हैं, जिनकी पूजा यहाँ मुख्य रूप से की जाती है। यह मंदिर की पुरातनता और आध्यात्मिक गहराई को दर्शाता है।
राष्ट्र प्रेस
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