बीजापुर में ₹35 लाख के इनामी छह नक्सलियों का सरेंडर, मुख्यधारा में वापसी
सारांश
मुख्य बातें
छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में नक्सल-विरोधी अभियानों को बड़ी सफलता मिली है — 12 अक्टूबर 2026 को कुल ₹35 लाख के इनामी छह माओवादी कैडरों ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें से चार ओडिशा में सक्रिय थे, जबकि दो वेस्ट बस्तर डिवीजन संगठन छोड़कर आए थे। यह समूह छत्तीसगढ़ सरकार की नक्सल सरेंडर और पुनर्वास नीति, सुरक्षा बलों के सतत अभियानों और बीजापुर में चल रहे कौशल विकास कार्यक्रमों से प्रभावित होकर हिंसा का रास्ता छोड़ने पर राज़ी हुआ।
सरेंडर करने वाले कैडरों का विवरण
आत्मसमर्पण करने वाले छह कैडरों में चार पार्टी पॉलिटिकल कैडर सदस्य (पीपीसीएम) और दो पार्टी सदस्य (पीएम) शामिल थे। रानी सोढ़ी उर्फ संध्या (30), जो ओडिशा स्टेट कंपनी नंबर-8 में पीपीसीएम के पद पर सक्रिय थीं, पर ₹8 लाख का इनाम था। पांडो पोडियम उर्फ सस्मिता (28), भी उसी कंपनी की पीपीसीएम थीं और उन पर भी ₹8 लाख का इनाम घोषित था।
सुक्कु कुडियम उर्फ संतोष (27) पीपीसीएम होने के साथ ओडिशा स्टेट सीसीएम के पूर्व सुरक्षा गार्ड थे। गणेश उइका, जिन पर ₹8 लाख का इनाम था, ने भी हथियार छोड़े। कोसा माडवी उर्फ सतीश (30) कंपनी नंबर-2 के ए-सेक्शन कमांडर और पीपीसीएम थे, जिन पर ₹8 लाख का इनाम था। देवे माडकम उर्फ जन्नी (22), जो ओडिशा स्टेट एसजेडसीएम के सुरक्षा गार्ड थे और ₹2 लाख के इनामी थे, तथा लालू ताती (25), गंगालूर एरिया कमेटी के पार्टी सदस्य और ₹1 लाख के इनामी, ने भी आत्मसमर्पण किया।
सरेंडर के पीछे के कारण
सरेंडर करने वाले कैडरों ने अपने निर्णय के लिए कई कारण गिनाए — सुरक्षा बलों का बढ़ता प्रभाव, माओवादी संगठन का बिखरना और उसकी हिंसक व जन-विरोधी विचारधारा से मोहभंग। इसके साथ ही पुराने कैडरों के सफल पुनर्वास और आदिवासी इलाकों में हो रहे विकास ने भी उनके फैसले को प्रभावित किया।
गौरतलब है कि यह सरेंडर केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीतिक परिणाम है — जिसमें डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) बीजापुर, सीआरपीएफ की 170वीं बटालियन और बीजापुर पुलिस के बीच समन्वित संपर्क अभियान की अहम भूमिका रही।
सरकारी पुनर्वास नीति और मिलने वाली सुविधाएँ
इन सभी छह व्यक्तियों को छत्तीसगढ़ सरकार की 'नक्सल आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति' के तहत व्यापक सहायता मिलेगी। इसमें आर्थिक मदद, कौशल विकास प्रशिक्षण, आवास, शिक्षा, स्वरोजगार और रोज़गार में सहायता शामिल है। सरकार का लक्ष्य है कि ये व्यक्ति समाज की मुख्यधारा में सम्मानजनक जीवन जी सकें।
सुरक्षा अभियान और व्यापक संदर्भ
यह ऐसे समय में आया है जब बस्तर क्षेत्र में माओवादी संगठन लगातार कमज़ोर हो रहा है और सुरक्षा बलों के अभियान तेज़ हुए हैं। यह सरेंडर दर्शाता है कि केवल सैन्य दबाव नहीं, बल्कि संवेदनशील पुनर्वास कार्यक्रम भी इस अभियान का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। आने वाले समय में इन कैडरों के समाज में सफल एकीकरण पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी।