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बीजापुर में ₹35 लाख के इनामी छह नक्सलियों का सरेंडर, मुख्यधारा में वापसी

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बीजापुर में ₹35 लाख के इनामी छह नक्सलियों का सरेंडर, मुख्यधारा में वापसी

सारांश

₹35 लाख के इनामी छह माओवादी कैडरों ने बीजापुर में हथियार डाले — इनमें ओडिशा स्टेट कंपनी के कमांडर तक शामिल। डीआरजी, सीआरपीएफ और पुलिस के समन्वित अभियान और राज्य की पुनर्वास नीति की यह बड़ी जीत, बस्तर में माओवादी संगठन के बिखराव की कहानी कह रही है।

मुख्य बातें

12 अक्टूबर 2026 को बीजापुर में ₹35 लाख के इनामी छह माओवादी कैडरों ने आत्मसमर्पण किया।
सरेंडर करने वालों में चार पीपीसीएम और दो पार्टी सदस्य शामिल; इनमें से चार ओडिशा में सक्रिय थे।
सबसे बड़ा इनाम — ₹8 लाख — चार कैडरों पर था; कोसा माडवी कंपनी नंबर-2 के ए-सेक्शन कमांडर थे।
डीआरजी बीजापुर, सीआरपीएफ 170वीं बटालियन और बीजापुर पुलिस के समन्वय ने सरेंडर में निर्णायक भूमिका निभाई।
सभी छह को नक्सल आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति के तहत आवास, कौशल प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता मिलेगी।

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में नक्सल-विरोधी अभियानों को बड़ी सफलता मिली है — 12 अक्टूबर 2026 को कुल ₹35 लाख के इनामी छह माओवादी कैडरों ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें से चार ओडिशा में सक्रिय थे, जबकि दो वेस्ट बस्तर डिवीजन संगठन छोड़कर आए थे। यह समूह छत्तीसगढ़ सरकार की नक्सल सरेंडर और पुनर्वास नीति, सुरक्षा बलों के सतत अभियानों और बीजापुर में चल रहे कौशल विकास कार्यक्रमों से प्रभावित होकर हिंसा का रास्ता छोड़ने पर राज़ी हुआ।

सरेंडर करने वाले कैडरों का विवरण

आत्मसमर्पण करने वाले छह कैडरों में चार पार्टी पॉलिटिकल कैडर सदस्य (पीपीसीएम) और दो पार्टी सदस्य (पीएम) शामिल थे। रानी सोढ़ी उर्फ संध्या (30), जो ओडिशा स्टेट कंपनी नंबर-8 में पीपीसीएम के पद पर सक्रिय थीं, पर ₹8 लाख का इनाम था। पांडो पोडियम उर्फ सस्मिता (28), भी उसी कंपनी की पीपीसीएम थीं और उन पर भी ₹8 लाख का इनाम घोषित था।

सुक्कु कुडियम उर्फ संतोष (27) पीपीसीएम होने के साथ ओडिशा स्टेट सीसीएम के पूर्व सुरक्षा गार्ड थे। गणेश उइका, जिन पर ₹8 लाख का इनाम था, ने भी हथियार छोड़े। कोसा माडवी उर्फ सतीश (30) कंपनी नंबर-2 के ए-सेक्शन कमांडर और पीपीसीएम थे, जिन पर ₹8 लाख का इनाम था। देवे माडकम उर्फ जन्नी (22), जो ओडिशा स्टेट एसजेडसीएम के सुरक्षा गार्ड थे और ₹2 लाख के इनामी थे, तथा लालू ताती (25), गंगालूर एरिया कमेटी के पार्टी सदस्य और ₹1 लाख के इनामी, ने भी आत्मसमर्पण किया।

सरेंडर के पीछे के कारण

सरेंडर करने वाले कैडरों ने अपने निर्णय के लिए कई कारण गिनाए — सुरक्षा बलों का बढ़ता प्रभाव, माओवादी संगठन का बिखरना और उसकी हिंसक व जन-विरोधी विचारधारा से मोहभंग। इसके साथ ही पुराने कैडरों के सफल पुनर्वास और आदिवासी इलाकों में हो रहे विकास ने भी उनके फैसले को प्रभावित किया।

गौरतलब है कि यह सरेंडर केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीतिक परिणाम है — जिसमें डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) बीजापुर, सीआरपीएफ की 170वीं बटालियन और बीजापुर पुलिस के बीच समन्वित संपर्क अभियान की अहम भूमिका रही।

सरकारी पुनर्वास नीति और मिलने वाली सुविधाएँ

इन सभी छह व्यक्तियों को छत्तीसगढ़ सरकार की 'नक्सल आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति' के तहत व्यापक सहायता मिलेगी। इसमें आर्थिक मदद, कौशल विकास प्रशिक्षण, आवास, शिक्षा, स्वरोजगार और रोज़गार में सहायता शामिल है। सरकार का लक्ष्य है कि ये व्यक्ति समाज की मुख्यधारा में सम्मानजनक जीवन जी सकें।

सुरक्षा अभियान और व्यापक संदर्भ

यह ऐसे समय में आया है जब बस्तर क्षेत्र में माओवादी संगठन लगातार कमज़ोर हो रहा है और सुरक्षा बलों के अभियान तेज़ हुए हैं। यह सरेंडर दर्शाता है कि केवल सैन्य दबाव नहीं, बल्कि संवेदनशील पुनर्वास कार्यक्रम भी इस अभियान का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। आने वाले समय में इन कैडरों के समाज में सफल एकीकरण पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस दोहरी रणनीति का प्रमाण है जो छत्तीसगढ़ सरकार ने अपनाई है — सैन्य दबाव और संवेदनशील पुनर्वास का मेल। लेकिन असली कसौटी यह है कि क्या ये छह व्यक्ति वाकई समाज में स्थायी रूप से घुल-मिल पाते हैं, या पुनर्वास नीति कागज़ों तक सीमित रह जाती है। पुराने कैडरों के सफल पुनर्वास का उल्लेख खुद सरेंडर करने वालों ने किया — यह संकेत है कि ज़मीन पर कुछ बदल रहा है। फिर भी बस्तर में माओवाद की जड़ें केवल संगठनात्मक नहीं, सामाजिक-आर्थिक भी हैं; जब तक आदिवासी क्षेत्रों में विकास की रफ़्तार और पारदर्शिता दोनों सुनिश्चित नहीं होतीं, सरेंडर की संख्या एक अधूरी कहानी ही रहेगी।
RashtraPress
12 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बीजापुर में किन नक्सलियों ने सरेंडर किया और उन पर कितना इनाम था?
12 अक्टूबर 2026 को बीजापुर में छह माओवादी कैडरों ने आत्मसमर्पण किया, जिन पर कुल ₹35 लाख का इनाम था। इनमें रानी सोढ़ी उर्फ संध्या, पांडो पोडियम उर्फ सस्मिता, गणेश उइका और कोसा माडवी उर्फ सतीश पर ₹8-8 लाख, देवे माडकम पर ₹2 लाख और लालू ताती पर ₹1 लाख का इनाम था।
इन नक्सलियों ने सरेंडर क्यों किया?
सरेंडर करने वाले कैडरों ने सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव, माओवादी संगठन के बिखराव, हिंसक विचारधारा से मोहभंग और आदिवासी क्षेत्रों में हो रहे विकास को अपने फैसले का कारण बताया। पुराने कैडरों के सफल पुनर्वास ने भी उन्हें प्रेरित किया।
छत्तीसगढ़ की नक्सल पुनर्वास नीति के तहत इन्हें क्या सुविधाएँ मिलेंगी?
राज्य सरकार की 'नक्सल आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति' के अंतर्गत इन्हें आर्थिक सहायता, कौशल विकास प्रशिक्षण, आवास, शिक्षा, स्वरोजगार और रोज़गार में मदद दी जाएगी। इसका उद्देश्य इन्हें समाज की मुख्यधारा में सम्मानजनक जीवन दिलाना है।
इस सरेंडर में किन सुरक्षा बलों की भूमिका रही?
डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) बीजापुर, सीआरपीएफ की 170वीं बटालियन और बीजापुर पुलिस के बीच समन्वय ने इस सरेंडर को संभव बनाया। इन बलों के लगातार संपर्क, आपसी भरोसे और संवेदनशील रवैये को सफलता की वजह बताया गया है।
क्या ये नक्सली ओडिशा से जुड़े थे?
हाँ, सरेंडर करने वाले छह में से चार कैडर ओडिशा स्टेट कंपनी नंबर-8 से जुड़े थे, जबकि दो वेस्ट बस्तर डिवीजन संगठन से आए थे। रानी सोढ़ी, पांडो पोडियम और सुक्कु कुडियम सभी ओडिशा में सक्रिय रहे थे।
राष्ट्र प्रेस
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