सुप्रीम कोर्ट सख्त: 'कोई हमें दबाव में नहीं ला सकता', इंडिया ब्लॉक मार्च पर नोटिस जारी
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 15 अक्टूबर 2026 को 12 अक्टूबर को इंडिया ब्लॉक के नेताओं द्वारा निकाले गए विरोध मार्च के बाद अदालत परिसर और उसके आसपास राजनीतिक प्रदर्शनों पर अंकुश लगाने के लिए दिशा निर्देश तय करने की माँग वाली याचिका पर नोटिस जारी किया। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान दो टूक कहा — "कोई हमें दबाव में नहीं ला सकता।" पीठ ने 12 अक्टूबर की घटना से जुड़े सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का भी आदेश दिया।
मुख्य घटनाक्रम
सीजेआई सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया की दलीलें सुनने के बाद नोटिस जारी किया। भाटिया ने पीठ के समक्ष तर्क रखा कि सुप्रीम कोर्ट को किसी राजनीतिक जुलूस जैसी स्थिति का सामना करना स्वीकार्य नहीं है।
पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा, "हम हाथीदांत के टावरों में बैठकर काम नहीं कर रहे हैं। हमें पता है कि वे बाहर क्या बयान देते हैं और अदालत के अंदर क्या कहते हैं। हमें सब कुछ पता है।" पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि दबाव बनाने के ऐसे प्रयास कमज़ोर हैं और उन पर कोई ध्यान नहीं देता।
याचिकाओं में क्या माँगा गया है
यह मामला चार अधिवक्ताओं द्वारा दायर याचिकाओं से जुड़ा है। इन याचिकाओं में सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों के आसपास राजनीतिक जुलूसों और प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए एकसमान व्यवस्था बनाने की माँग की गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि राजनीतिक लामबंदी को न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप या लंबित मामलों में अदालत पर दबाव बनाने का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए।
याचिकाओं में 12 अक्टूबर की घटना से जुड़े सीसीटीवी फुटेज, आगंतुकों के रिकॉर्ड, प्रवेश एवं सुरक्षा व्यवस्था के दस्तावेज़ सुरक्षित रखने की माँग के साथ साथ संबंधित राजनीतिक नेताओं के आचरण की जाँच कर, यदि मामला बनता हो, तो आपराधिक अवमानना की कार्यवाही पर विचार करने का अनुरोध भी किया गया है।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह विवाद तब सामने आया जब 12 अक्टूबर को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समेत इंडिया ब्लॉक के कई नेताओं ने सर्वोच्च न्यायालय की ओर मार्च निकाला। उनका उद्देश्य मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर अपनी आपत्तियाँ दर्ज कराना था।
गौरतलब है कि इससे पहले सीजेआई सूर्यकांत ने राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के उस अनुरोध को ठुकरा दिया था, जिसमें उन्होंने मुलाकात कर SIR के मुद्दे पर ज्ञापन सौंपने की इच्छा जताई थी। सीजेआई ने स्पष्ट किया था कि उनके पत्र में उठाए गए मुद्दे पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित हैं।
सीजेआई ने यह भी कहा था कि लंबित मामलों पर चर्चा के लिए बैठक आयोजित करना शक्तियों के पृथक्करण के संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत होगा — जो संविधान के मूल ढाँचे का अभिन्न अंग है। उन्होंने विपक्षी नेताओं को स्थापित कानूनी प्रक्रिया के तहत याचिका दायर करने की सलाह दी थी और आश्वासन दिया था कि कानून सम्मत याचिका पर यथाशीघ्र सुनवाई होगी।
SIR याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस
उसी दिन सर्वोच्च न्यायालय ने राहुल गांधी और इंडिया ब्लॉक के 12 अन्य नेताओं की ओर से दायर उस याचिका पर चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी किया, जिसमें SIR प्रक्रिया को चुनौती दी गई है। सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने निर्देश दिया कि इस याचिका को विभिन्न राज्यों में SIR की वैधता को चुनौती देने वाली पहले से लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ा जाए।
पीठ ने यह भी कहा कि अगली सुनवाई में याचिकाकर्ताओं में से एक के आचरण के संबंध में स्पष्टीकरण माँगा जाएगा, हालाँकि अभी उस याचिकाकर्ता की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है। संबंधित याचिकाकर्ता को दिया गया नोटिस फिलहाल अस्थायी रूप से विचाराधीन रखा गया है और उसके आचरण पर स्पष्टीकरण मिलने पर आगे की कार्यवाही होगी।
क्या होगा आगे
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब न्यायपालिका की स्वतंत्रता और राजनीतिक दबाव के बीच की रेखा पर राष्ट्रीय बहस तेज़ हो रही है। सर्वोच्च न्यायालय अगली सुनवाई में अदालत परिसरों के पास प्रदर्शनों पर दिशा निर्देश तय करने और SIR की संवैधानिकता — दोनों मुद्दों पर एक साथ विचार करेगा। न्यायालय का यह रुख न्यायिक संस्थाओं की प्रशासनिक गरिमा की रक्षा की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।