राहुल गांधी पर गर्भवती पत्रकार की याचिका: सुप्रीम कोर्ट 3 नवंबर को करेगा सुनवाई, नोटिस जारी
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि वह 3 नवंबर को पत्रकार रिचा पराशर की उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर धक्का-मुक्की का आरोप लगाया गया है। तीन महीने की गर्भवती पराशर का आरोप है कि 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट परिसर में इंडिया ब्लॉक के मार्च के दौरान यह घटना हुई और उन्हें बाद में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
मामले का घटनाक्रम
रिचा पराशर ने आरोप लगाया कि जब वह विपक्षी नेताओं के मार्च को कवर कर रही थीं, तब राहुल गांधी ने उनका हाथ पकड़कर आक्रामक तरीके से खींचा। इसके बाद उनके सुरक्षाकर्मियों ने कथित तौर पर धक्का दिया, जिससे वह गिर गईं। यह मार्च उस वक्त निकाला गया था, जब इंडिया ब्लॉक के नेता वोटर लिस्ट के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश से मिलना चाहते थे।
सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया
मामले का उल्लेख वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने किया। भाटिया ने बताया कि महिला पत्रकार की याचिका अब तक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुई थी। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस मामले में 15 अक्टूबर को पहले ही नोटिस जारी किया जा चुका है और 3 नवंबर को सुनवाई निर्धारित है।
सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का आदेश
15 अक्टूबर को सीजेआई न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने उक्त याचिका पर नोटिस जारी करते हुए घटना से संबंधित सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था। यह आदेश आगे की जाँच की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।
कांग्रेस का रुख
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस / INC) ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है और इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है। पार्टी नेताओं और समर्थकों ने घटना के वीडियो प्रसारित किए हैं तथा सवाल उठाया है कि क्या उपलब्ध वीडियो से यह सिद्ध होता है कि राहुल गांधी ने पत्रकार को धक्का दिया।
पृष्ठभूमि: मार्च क्यों निकाला गया था
गौरतलब है कि यह मार्च उस संदर्भ में निकाला गया था, जब सीजेआई न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के एसआईआर को लेकर ज्ञापन सौंपने हेतु मुलाकात के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था। सीजेआई ने स्पष्ट कहा था कि लंबित मामलों पर चर्चा के लिए बैठक बुलाना शक्तियों के पृथक्करण के संवैधानिक सिद्धांत के विरुद्ध होगा और विपक्षी नेताओं को स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। यह घटना सर्वोच्च न्यायालय परिसर में राजनीतिक प्रदर्शनों के विरुद्ध सुरक्षा उपायों की माँग वाली एक अलग याचिका की पृष्ठभूमि में भी आई है। 3 नवंबर की सुनवाई में अदालत का रुख यह तय करेगा कि मामला आगे किस दिशा में बढ़ता है।