18 अक्टूबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

तेलडीहा दुर्गा मंदिर, बांका: महाष्टमी पर उमड़ी भीड़, पाठा बलि परंपरा और विकास की दरकार

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
तेलडीहा दुर्गा मंदिर, बांका: महाष्टमी पर उमड़ी भीड़, पाठा बलि परंपरा और विकास की दरकार

सारांश

बिहार के बांका में बदुआ नदी किनारे स्थित तेलडीहा दुर्गा मंदिर में महाष्टमी पर देश-विदेश से श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा। वर्ष 1603 में स्थापित यह तांत्रिक सिद्धि पीठ अब धार्मिक पर्यटन केंद्र बनने की राह पर है — लेकिन विकास के साथ बदुआ नदी और सांस्कृतिक विरासत को बचाने की चुनौती भी उतनी ही बड़ी है।

मुख्य बातें

तेलडीहा दुर्गा मंदिर , बांका में महाष्टमी, 18 अक्टूबर 2026 को बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और नेपाल से श्रद्धालु पहुँचे।
मंदिर की स्थापना वर्ष 1603 में हरिबल्लभ दास द्वारा तांत्रिक विधि से की गई बताई जाती है।
पाठा बलि और डलिया चढ़ाने की परंपरा मंदिर की प्रमुख धार्मिक पहचान है; गर्भगृह कच्ची मिट्टी का बना है।
करीब पाँच वर्ष पहले मंदिर को धार्मिक न्यास बोर्ड में शामिल कर पर्यटन विकास की पहल शुरू हुई।
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का पैतृक आवास मंदिर से करीब 4 किलोमीटर दूर बताया जाता है।
भीड़ प्रबंधन, नदी प्रदूषण नियंत्रण और बदुआ नदी के पारिस्थितिक संरक्षण की चुनौती सबसे अहम बनकर उभरी है।

बिहार के बांका जिले में बदुआ नदी के तट पर स्थित तेलडीहा दुर्गा मंदिर में शारदीय नवरात्र की महाष्टमी पर रविवार, 18 अक्टूबर 2026 को श्रद्धालुओं का विशाल जनसैलाब उमड़ा। मां दुर्गा के दर्शन और मनोकामना पूर्ति की आस लेकर बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और नेपाल तक से श्रद्धालु यहाँ पहुँचे। तांत्रिक सिद्धि पीठ के रूप में विख्यात यह मंदिर अपनी पाठा बलि और डलिया चढ़ाने की सदियों पुरानी परंपरा के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।

मंदिर का इतिहास और धार्मिक महत्व

बांका जिले के शंभूगंज प्रखंड के तेलडीहा गाँव में स्थित यह मंदिर बांका और मुंगेर जिले की सीमा के निकट है। मंदिर की स्थापना की परंपरा वर्ष 1603 से जुड़ी बताई जाती है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, हरिबल्लभ दास ने तांत्रिक विधि से यहाँ देवी की स्थापना की थी। मंदिर के गर्भगृह की कच्ची मिट्टी की संरचना इसकी एक अद्वितीय धार्मिक पहचान है, जिसे श्रद्धालु अत्यंत पावन मानते हैं।

मंदिर के प्रधान पुजारी श्याम आचार्य के अनुसार मां की महिमा अपरंपार है और भक्तों की अटूट आस्था के कारण हर वर्ष यहाँ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही है। मान्यता है कि नवरात्र की पहली पूजा पर जलपात्र चढ़ाने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कई श्रद्धालु सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल लेकर पैदल यहाँ तक पहुँचते हैं।

नवरात्र का माहौल और श्रद्धालुओं की आस्था

सप्तमी से दशमी तक मंदिर परिसर दर्शनार्थियों से भरा रहता है। मुंगेर के तारापुर और बांका के शंभूगंज से मंदिर तक आसानी से पहुँचा जा सकता है। नदी किनारे सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही, पूजा की तैयारियाँ और घंटियों की गूँज एक विशिष्ट धार्मिक वातावरण का निर्माण करती हैं। यह ऐसे समय में आया है जब दशहरा मेले का स्वरूप भी मंदिर की बढ़ती लोकप्रियता के साथ बदल रहा है।

सरकारी पहल और विकास की संभावनाएँ

करीब पाँच वर्ष पहले इस मंदिर को धार्मिक न्यास बोर्ड में शामिल किया गया और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की पहल शुरू हुई। बताया जा रहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का बचपन से इस मंदिर से गहरा जुड़ाव है — उनका पैतृक आवास मंदिर से करीब चार किलोमीटर दूर बताया जाता है। सरकारी स्तर पर मंदिर क्षेत्र को धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने के प्रयास की बात सामने आ रही है।

प्रकाश, पेयजल, शौचालय, पार्किंग, स्वच्छता और श्रद्धालुओं की सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के विस्तार से यहाँ आने वाले लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है। गौरतलब है कि धार्मिक पर्यटन स्थानीय दुकानदारों, प्रसाद विक्रेताओं, वाहन चालकों और ग्रामीण कारोबारियों के लिए रोज़गार के नए अवसर भी पैदा कर सकता है।

बदुआ नदी और पर्यावरण संरक्षण की चुनौती

स्थानीय लोगों के मुताबिक तेलडीहा की पहचान केवल मंदिर तक सीमित नहीं है — इसके साथ बहने वाली बदुआ नदी यहाँ की धार्मिक परंपरा, ग्रामीण जीवन और सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के साथ कचरा प्रबंधन, नदी में पूजा सामग्री जाने से रोकना, भीड़ नियंत्रण और तटों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। अतीत में भीड़ बढ़ने पर भगदड़ जैसी स्थिति के अनुभव के बाद प्रशासन के लिए पर्याप्त बैरिकेडिंग और सुचारु आवागमन सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है।

चार सदियों से अधिक पुरानी आस्था के इस केंद्र के सामने अब विकास और विरासत के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। तेलडीहा का वास्तविक विकास तभी सार्थक होगा जब मंदिर की घंटियों के साथ बदुआ नदी की धारा भी स्वच्छ और सुरक्षित बनी रहे।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन बुनियादी ढाँचा अभी भी पीछे है। धार्मिक न्यास बोर्ड में शामिल होने के पाँच वर्ष बाद भी यदि पेयजल और शौचालय जैसी सुविधाएँ पूरी तरह नहीं जुटाई जा सकीं, तो 'धार्मिक पर्यटन केंद्र' का दर्जा महज़ एक घोषणा बनकर रह जाता है। मुख्यमंत्री का व्यक्तिगत जुड़ाव राजनीतिक इच्छाशक्ति का संकेत तो देता है, पर असली कसौटी वह समयसीमा होगी जब मंदिर परिसर और बदुआ नदी दोनों को एक साथ संरक्षित और विकसित किया जाए — वरना विकास के नाम पर विरासत को मिटाने का यह चलन नया नहीं होगा।
RashtraPress
18 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तेलडीहा दुर्गा मंदिर कहाँ स्थित है और इसका इतिहास क्या है?
तेलडीहा दुर्गा मंदिर बिहार के बांका जिले के शंभूगंज प्रखंड में बदुआ नदी के किनारे स्थित है। मंदिर की स्थापना की परंपरा वर्ष 1603 से जुड़ी है, जब हरिबल्लभ दास ने तांत्रिक विधि से यहाँ देवी की स्थापना की थी।
तेलडीहा मंदिर में पाठा बलि की परंपरा क्या है?
पाठा बलि और डलिया चढ़ाने की परंपरा इस मंदिर की विशिष्ट धार्मिक पहचान है। यह तांत्रिक सिद्धि पीठ के रूप में प्रसिद्ध है और नवरात्र में यह परंपरा विशेष महत्व रखती है।
महाष्टमी 2026 पर तेलडीहा मंदिर में किन राज्यों से श्रद्धालु पहुँचे?
18 अक्टूबर 2026 को महाष्टमी पर बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और नेपाल से श्रद्धालु यहाँ पहुँचे। सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर पैदल आने वाले श्रद्धालु भी इस भीड़ का हिस्सा रहे।
तेलडीहा मंदिर के विकास के लिए क्या पहल हुई है?
करीब पाँच वर्ष पहले मंदिर को धार्मिक न्यास बोर्ड में शामिल किया गया और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की शुरुआत हुई। प्रकाश, पेयजल, शौचालय, पार्किंग और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के विस्तार की योजना है।
बदुआ नदी और मंदिर विकास से जुड़ी क्या चुनौतियाँ हैं?
बदुआ नदी इस मंदिर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। बढ़ती भीड़ के साथ कचरा प्रबंधन, नदी प्रदूषण, भीड़ नियंत्रण और अतीत में भगदड़ के अनुभव के मद्देनज़र प्रशासनिक तैयारी और पारिस्थितिक संरक्षण दोनों पर एक साथ ध्यान देना आवश्यक है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम कल
  2. 6 महीने पहले
  3. 7 महीने पहले
  4. 7 महीने पहले
  5. 7 महीने पहले
  6. 1 साल पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले