तमिलनाडु सरकार ने 12 नगर निगमों के सॉलिड वेस्ट कंसल्टेंसी टेंडर वापस लिए, सीपीआई(एम)-सीपीआई ने किया स्वागत
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु सरकार ने 12 नगर निगमों में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के अंतर्गत म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट (नगरपालिका ठोस अपशिष्ट) संग्रह और परिवहन हेतु डिटेल्ड फिजिबिलिटी रिपोर्ट (डीएफआर) तैयार करने के लिए जारी किए गए कंसल्टेंसी टेंडर वापस ले लिए हैं। तमिलनाडु अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (टीएनयूआईएफएसएल) द्वारा जारी ये टेंडर निजीकरण की आशंकाओं के बीच राजनीतिक दलों और सफाई कर्मचारी यूनियनों के कड़े विरोध के बाद कुछ ही दिनों में रद्द कर दिए गए।
टेंडर का विवरण और विवाद
20 जून को टीएनयूआईएफएसएल ने अवादी, होसुर, ताम्बरम, वेल्लोर, कोयंबटूर, इरोड, सलेम, तिरुप्पुर, मदुरै, थूथुकुडी, तिरुचि और तिरुनेलवेली में म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट प्रबंधन के लिए डीएफआर तैयार करने और ट्रांजैक्शन एडवाइजरी सेवाएं देने हेतु कंसल्टेंसी फर्मों से बोलियाँ मंगवाई थीं। ₹4.05 करोड़ की अनुमानित लागत वाले इस कंसल्टेंसी कार्य को तीन पैकेज में बाँटा गया था और इसके लिए 'प्रोजेक्ट डेवलपमेंट ग्रांट फंड' से वित्त पोषण प्रस्तावित था।
यह प्रस्ताव सामने आते ही राजनीतिक दलों और सफाई कर्मचारी संगठनों ने इसे नगरपालिका ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के निजीकरण की नई कोशिश करार देते हुए तीखा विरोध किया। आलोचकों का कहना था कि पीपीपी मॉडल के विस्तार से स्थायी सफाई कर्मचारियों की आजीविका और रोजगार सुरक्षा पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
सरकार की सफाई और फैसला
सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया कि सभी नगर निगमों और नगर पालिकाओं में सॉलिड वेस्ट प्रबंधन का काम 2022 से ही पीपीपी मॉडल के तहत चल रहा है। अधिकारी ने कहा, "इस टेंडर का मकसद ऐसे कंसल्टेंट नियुक्त करना था जो फिजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार कर सकें और मौजूदा व्यवस्था को मजबूत करने के तरीकों पर विचार कर सकें। इसे निजीकरण की नई पहल समझ लिया गया था, इसलिए सरकार ने इसे वापस लेने और पूरे ढाँचे की दोबारा समीक्षा करने का फैसला किया है।"
सूत्रों के अनुसार, शहरी विकास विभाग अब मौजूदा सॉलिड वेस्ट प्रबंधन प्रणाली की व्यापक समीक्षा करेगा, मौजूदा अनुबंध व्यवस्था में परिचालन संबंधी खामियों की पहचान करेगा और पूरी जाँच-पड़ताल के बाद आगे की कार्रवाई तय करेगा।
वामपंथी दलों की प्रतिक्रिया
सरकार के इस फैसले का भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [सीपीआई(एम)] और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने स्वागत किया और इसे एक सकारात्मक कदम बताया। सीपीआई(एम) के राज्य सचिव पी. षणमुगम ने कहा कि सफाई कर्मचारियों को, जिन्हें कभी स्थायी रूप से नियुक्त किया जाता था, अब बड़े पैमाने पर अस्थायी और अनुबंध-आधारित नौकरियों में धकेल दिया गया है, जिससे असुरक्षा और शोषण बढ़ा है। उन्होंने सरकार से अपील की कि वह सफाई कर्मचारियों के अधिकारों और आजीविका की रक्षा करते हुए सार्वजनिक अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली को सुदृढ़ करे।
आगे की राह
गौरतलब है कि यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब राज्य में नगरपालिका सेवाओं के निजीकरण को लेकर श्रमिक संगठन पहले से ही सतर्क हैं। शहरी विकास विभाग की समीक्षा के नतीजे और भविष्य की नीति दिशा पर सभी की निगाहें टिकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को किसी भी नई कंसल्टेंसी या पीपीपी प्रस्ताव से पहले सफाई कर्मचारियों और स्थानीय निकायों के साथ व्यापक परामर्श सुनिश्चित करना होगा।