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सीपीआई की तमिलनाडु सरकार से माँग: 10 नगर निगमों में स्वच्छता निजीकरण का फैसला वापस लो

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सीपीआई की तमिलनाडु सरकार से माँग: 10 नगर निगमों में स्वच्छता निजीकरण का फैसला वापस लो

सारांश

सीपीआई ने तमिलनाडु की DMK सरकार को चेताया है कि 10 नगर निगमों में स्वच्छता सेवाओं का निजीकरण हज़ारों हाशिए के समुदायों के कर्मचारियों की आजीविका और सामाजिक न्याय दोनों के लिए खतरनाक है। पार्टी ने निजीकरण की जगह मशीनीकरण और सार्वजनिक रोज़गार को मज़बूत करने का विकल्प सुझाया है।

मुख्य बातें

सीपीआई ने तमिलनाडु सरकार से 10 नगर निगमों में स्वच्छता एवं ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के कथित निजीकरण का फैसला वापस लेने की माँग की।
प्रभावित शहरों में कोयंबटूर, मदुरै, सलेम, तिरुप्पुर, वेल्लोर समेत अन्य प्रमुख नगर निगम शामिल हैं।
सीपीआई राज्य सचिव एम.
वीरपांडियन ने कहा कि सफाई कर्मचारियों का बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे समुदायों से है, जिनकी आजीविका इन नौकरियों पर निर्भर है।
पार्टी ने मशीनीकृत सफाई, कौशल विकास और सामाजिक सुरक्षा के ज़रिए सार्वजनिक रोज़गार को मज़बूत करने का विकल्प सुझाया।
तमिलनाडु सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने तमिलनाडु सरकार से राज्य के नगर निगमों में स्वच्छता एवं ठोस अपशिष्ट प्रबंधन सेवाओं के कथित निजीकरण के निर्णय को तत्काल वापस लेने की माँग की है। पार्टी का कहना है कि यह कदम हज़ारों सफाई कर्मचारियों की आजीविका को खतरे में डालेगा और सामाजिक न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।

किन शहरों पर मंडरा रहा है निजीकरण का खतरा

सीपीआई के तमिलनाडु राज्य सचिव एम. वीरपांडियन ने एक बयान में उन रिपोर्टों पर गहरी चिंता जताई जिनके अनुसार राज्य सरकार तांबरम, अवादी, होसुर, वेल्लोर, कोयंबटूर, इरोड, सलेम, तिरुप्पुर, मदुरै और थूथुकुडी सहित कम-से-कम 10 नगर निगमों में सफाई कार्य निजी एजेंसियों को सौंपने की दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वच्छता एक आवश्यक और स्थायी सार्वजनिक सेवा है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य और शहरी नागरिकों के कल्याण से सीधे जुड़ी है।

सामाजिक न्याय पर सीपीआई की दलील

वीरपांडियन ने रेखांकित किया कि स्थानीय निकायों में कार्यरत सफाई कर्मचारियों का बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक रूप से शोषित और हाशिए पर रहे समुदायों से आता है। उनके अनुसार, जाति-आधारित असमानताओं से जूझते समाज में इन कर्मचारियों को ऐसी संविदात्मक व्यवस्था में धकेलना अन्यायपूर्ण है जहाँ नौकरी की सुरक्षा, नियमित वेतन, पेंशन लाभ और अन्य श्रम अधिकारों की कोई गारंटी नहीं होती। पार्टी का आरोप है कि निजी ठेकेदारों की व्यवस्था में श्रमिकों के शोषण को ऐतिहासिक रूप से बढ़ावा मिला है।

पिछली सरकारों का रिकॉर्ड और सीपीआई का विरोध

सीपीआई नेता ने याद दिलाया कि पार्टी ने विभिन्न वामपंथी संगठनों और ट्रेड यूनियनों के साथ मिलकर पूर्ववर्ती सरकारों के निजीकरण प्रयासों के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन और अभियान चलाए हैं। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों ने श्रमिक अधिकारों की सुरक्षा की बार-बार की गई माँगों को नज़रअंदाज़ करते हुए निजी भागीदारी का विस्तार जारी रखा। यह ऐसे समय में आया है जब राज्य में सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) सरकार सामाजिक न्याय की राजनीति की पैरोकार मानी जाती है।

सीपीआई का वैकल्पिक रोडमैप

वीरपांडियन ने केवल विरोध तक सीमित न रहते हुए एक वैकल्पिक दृष्टिकोण भी सुझाया। उनके अनुसार, सरकार को आधुनिक तकनीक, मशीनीकृत सफाई प्रणालियों और वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन पद्धतियों को अपनाकर मैन्युअल सफाई पर निर्भरता धीरे-धीरे कम करनी चाहिए। साथ ही, वर्तमान में कार्यरत कर्मचारियों को वैकल्पिक रोजगार के अवसर, कौशल विकास कार्यक्रम और पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा दी जानी चाहिए ताकि तकनीकी बदलाव से नौकरियाँ न जाएँ। सीपीआई ने माँग की है कि सरकार निजीकरण के बजाय सार्वजनिक क्षेत्र के रोजगार को मज़बूत करे और सामाजिक न्याय, श्रमिक कल्याण तथा जन स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे।

आगे क्या होगा

तमिलनाडु सरकार की ओर से सीपीआई की माँगों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। गौरतलब है कि यदि निजीकरण की योजना आगे बढ़ती है तो यह DMK सरकार और उसके वामपंथी सहयोगियों के बीच राजनीतिक तनाव का नया बिंदु बन सकती है। सफाई कर्मचारियों के संगठनों की प्रतिक्रिया और संभावित आंदोलन की दिशा पर अब सबकी नज़रें टिकी हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह सवाल भी उठता है कि क्या मशीनीकरण और निजीकरण के बिना शहरी स्वच्छता का संकट हल हो सकता है — या सरकार दोनों मोर्चों पर कोई ठोस नीति बनाने से बच रही है। जब तक सरकार स्पष्ट जवाब नहीं देती, यह विवाद DMK और उसके वामपंथी सहयोगियों के बीच दरार का कारण बन सकता है।
RashtraPress
9 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तमिलनाडु में स्वच्छता सेवाओं के निजीकरण का विवाद क्या है?
रिपोर्टों के अनुसार, तमिलनाडु सरकार कोयंबटूर, मदुरै, सलेम सहित कम-से-कम 10 नगर निगमों में सफाई एवं ठोस अपशिष्ट प्रबंधन कार्य निजी एजेंसियों को सौंपने की योजना पर विचार कर रही है। सीपीआई समेत विपक्षी दलों और ट्रेड यूनियनों ने इसका विरोध किया है।
सीपीआई ने इस निजीकरण का विरोध क्यों किया है?
सीपीआई का तर्क है कि सफाई कर्मचारियों का बड़ा हिस्सा हाशिए के समुदायों से है और निजी ठेकेदारी में उन्हें नौकरी की सुरक्षा, पेंशन और नियमित वेतन से वंचित होना पड़ेगा। पार्टी इसे सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध मानती है।
सीपीआई ने निजीकरण के बजाय क्या विकल्प सुझाया है?
सीपीआई ने सरकार से मशीनीकृत सफाई प्रणालियों और वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन पद्धतियों को अपनाने की माँग की है। साथ ही, वर्तमान कर्मचारियों के लिए कौशल विकास, वैकल्पिक रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया है।
किन नगर निगमों में निजीकरण की योजना बताई जा रही है?
रिपोर्टों के अनुसार, तांबरम, अवादी, होसुर, वेल्लोर, कोयंबटूर, इरोड, सलेम, तिरुप्पुर, मदुरै और थूथुकुडी नगर निगमों में स्वच्छता कार्य निजी एजेंसियों को सौंपने पर विचार किया जा रहा है।
तमिलनाडु सरकार ने सीपीआई की माँगों पर क्या कहा है?
अभी तक तमिलनाडु सरकार की ओर से सीपीआई की माँगों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। निजीकरण की योजना की पुष्टि या खंडन भी सरकार ने सार्वजनिक रूप से नहीं किया है।
राष्ट्र प्रेस
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