तमिलनाडु के 12 नगर निगमों में कचरा प्रबंधन के लिए पीपीपी मॉडल, कर्मचारियों ने उठाए नौकरी सुरक्षा के सवाल
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु सरकार ने राज्य के 12 प्रमुख नगर निगमों में ठोस कचरा प्रबंधन व्यवस्था को नए सिरे से संगठित करने की दिशा में ठोस कदम उठाया है। तमिलनाडु अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (TNUIFSL) ने पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के अंतर्गत विस्तृत व्यवहार्यता रिपोर्ट (DFR) तैयार करने और ट्रांजैक्शन एडवाइजरी सेवाएं प्रदान करने हेतु कंसल्टेंसी फर्मों से निविदाएं आमंत्रित की हैं। यह पहल ऐसे समय में की जा रही है जब मौजूदा तीन वर्षीय निजी अनुबंध समाप्ति के करीब हैं और संचालन में कई कमियां उजागर हो चुकी हैं।
किन नगर निगमों में लागू होगी योजना
प्रस्तावित PPP ढाँचे के दायरे में अवाडी, होसुर, तांबरम, वेल्लोर, कोयंबटूर, इरोड, सलेम, तिरुप्पुर, मदुरै, तूतीकोरिन, तिरुचिरापल्ली और तिरुनेलवेली नगर निगम शामिल हैं। ये शहर तमिलनाडु के विभिन्न भौगोलिक और जनसांख्यिकीय क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिससे इस योजना का व्यापक असर होने की संभावना है।
कंसल्टेंसी कार्य को तीन पैकेजों में विभाजित किया गया है, जिनकी कुल अनुमानित लागत ₹4.05 करोड़ बताई गई है। नियुक्त फर्मों को ऐसी रिपोर्टें तैयार करनी होंगी जो इन शहरों को कचरा-मुक्त शहरों की श्रेणी में लाने का रोडमैप प्रस्तुत करें।
मौजूदा व्यवस्था में क्या कमियां आईं
नगर प्रशासन एवं जलापूर्ति विभाग द्वारा 24 अगस्त 2022 को जारी सरकारी आदेश (जीओ संख्या-116) के तहत तमिलनाडु के सभी नगर निगमों और नगरपालिकाओं को तीन वर्ष के लिए ठोस कचरा प्रबंधन कार्य निजी एजेंसियों के माध्यम से कराने की अनुमति दी गई थी।
वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, इस व्यवस्था की समीक्षा में सफाई मानकों को बनाए रखने, सेवा वितरण की निगरानी और परिचालन दक्षता सुनिश्चित करने में गंभीर खामियां सामने आई हैं। यही कारण है कि नए टेंडर जारी करने से पूर्व अनुबंध की शर्तों और संचालन ढाँचे में बदलाव पर विचार किया जा रहा है।
प्रस्तावित रिपोर्टों में ठोस कचरा प्रबंधन नियम-2026 के अनुपालन को मजबूत करने और कचरे के संग्रहण, परिवहन तथा निपटान के लिए टिकाऊ व्यवस्था विकसित करने पर विशेष जोर दिया जाएगा।
कर्मचारियों और श्रमिक संगठनों की आपत्तियां
इस प्रस्ताव के विरोध में सफाई कर्मचारियों और श्रमिक संगठनों ने अपनी चिंताएं खुलकर सामने रखी हैं। उनका कहना है कि सफाई सेवाओं के निजीकरण से कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा कमजोर हुई है, कार्य परिस्थितियां प्रभावित हुई हैं और कल्याणकारी सुविधाओं में कमी आई है।
सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU) के आर. बालासुब्रमण्यम ने कहा कि आउटसोर्सिंग के कारण कई कर्मचारियों को स्थायी नौकरी और श्रमिक अधिकारों से वंचित होना पड़ा है।
चेन्नई में सफाई सेवाओं के निजीकरण के खिलाफ लंबे आंदोलन का नेतृत्व कर चुके 'उझाइप्पोर उरिमई इयक्कम' के अध्यक्ष के. भारती ने राज्य सरकार से कर्मचारियों के हितों को प्राथमिकता देने और आगे के निजीकरण पर पुनर्विचार करने की मांग की है। उनका आरोप है कि निजीकरण के विस्तार से मुख्य रूप से कॉरपोरेट कंपनियों को लाभ होगा, जबकि कर्मचारियों को शोषण और असुरक्षा का सामना करना पड़ेगा।
आगे क्या होगा
TNUIFSL द्वारा कंसल्टेंसी फर्मों की नियुक्ति के बाद तैयार होने वाली DFR रिपोर्टें नए PPP अनुबंधों की शर्तें तय करने का आधार बनेंगी। अधिकारियों के अनुसार, ये रिपोर्टें शहरी स्वच्छता में सुधार, जवाबदेही बढ़ाने और PPP मॉडल के तहत बेहतर परिणाम सुनिश्चित करने के लिए व्यापक रोडमैप प्रदान करेंगी। गौरतलब है कि श्रमिक संगठनों की आपत्तियों और सरकार की दक्षता-केंद्रित नीति के बीच संतुलन बनाना इस योजना की सबसे बड़ी चुनौती होगी।