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तमिलनाडु: खदानों में नगरपालिका कचरा डंपिंग के विरोध में किसान और पर्यावरण कार्यकर्ता, फरवरी 2022 के सरकारी आदेश पर उठे सवाल

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तमिलनाडु: खदानों में नगरपालिका कचरा डंपिंग के विरोध में किसान और पर्यावरण कार्यकर्ता, फरवरी 2022 के सरकारी आदेश पर उठे सवाल

सारांश

तमिलनाडु में परित्यक्त खदानों को कचरा डंपिंग स्थल बनाने की नीति के खिलाफ किसान और पर्यावरण कार्यकर्ता एकजुट हो गए हैं। फरवरी 2022 के RRR आदेश के एक प्रावधान पर सवाल उठाते हुए उन्होंने भूजल प्रदूषण और जल संचयन क्षमता के नष्ट होने की चेतावनी दी है।

मुख्य बातें

तिरुप्पुर समेत तमिलनाडु के कई जिलों में स्थानीय निकायों पर परित्यक्त पत्थर की खदानों में अनुपचारित नगरपालिका कचरा डालने के आरोप।
किसानों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने फरवरी 2022 के RRR ढाँचे के तहत जारी सरकारी आदेश में संशोधन या वापसी की माँग की।
कार्यकर्ताओं के अनुसार अनियंत्रित डंपिंग से मिट्टी क्षरण , भूजल प्रदूषण और वायु प्रदूषण का दीर्घकालिक खतरा।
कानूनी टिप्पणियों के अनुसार खदानों में केवल ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के अनुरूप अक्रिय व वैज्ञानिक रूप से संसाधित कचरा ही डाला जा सकता है।
पर्यावरण समूहों ने अपशिष्ट पृथक्करण, प्रभावी निगरानी तंत्र और परित्यक्त खदान स्थलों के संरक्षण की माँग की।

तमिलनाडु के तिरुप्पुर समेत कई जिलों में पत्थर की खदानों में नगरपालिका ठोस कचरे के निपटान को लेकर विरोध तेज हो गया है। किसान संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने राज्य सरकार से फरवरी 2022 में जारी रिक्लेमेशन, रेस्टोरेशन एंड रिहैबिलिटेशन (RRR) ढाँचे के तहत दिए गए उस प्रावधान पर पुनर्विचार करने की माँग की है, जो स्थानीय निकायों को खदान गड्ढों में ठोस कचरा डालने की अनुमति देता है। आरोप है कि रिहायशी इलाकों से एकत्र अनुपचारित और अविभाजित कचरे को सीधे परित्यक्त खदान स्थलों में डाला जा रहा है।

विरोध की पृष्ठभूमि

कार्यकर्ताओं के अनुसार, तिरुप्पुर सहित कई जिलों में स्थानीय निकाय परित्यक्त खदान स्थलों को अनौपचारिक कचरा डंपिंग क्षेत्रों में बदल रहे हैं। इस प्रावधान का दुरुपयोग तेज़ी से बढ़ रहा है — बिना किसी वैज्ञानिक प्रसंस्करण या कचरा पृथक्करण के सीधे डंपिंग की शिकायतें सामने आई हैं। गौरतलब है कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के तहत केवल अक्रिय और वैज्ञानिक रूप से संसाधित कचरे को ही ऐसे स्थलों पर डालने की अनुमति है।

पर्यावरणीय खतरे

पर्यावरण समूहों ने चेतावनी दी है कि अनियंत्रित डंपिंग से मिट्टी का क्षरण, भूजल प्रदूषण और वायु प्रदूषण का गंभीर खतरा है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि इनमें से अनेक परित्यक्त खदानें प्राकृतिक रूप से वर्षा जल का संचय करती हैं और जल संकट के समय मूल्यवान संसाधन की भूमिका निभा सकती हैं। यदि इन्हें स्थायी कचरा निपटान स्थलों में बदल दिया गया, तो इनका पारिस्थितिक महत्व धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा।

कानूनी मोर्चे पर चुनौती

यह मुद्दा हाल के वर्षों में न्यायिक मंचों तक भी पहुँच चुका है। खदानों में कचरा डालने को चुनौती देते हुए न्यायिक निकायों में याचिकाएँ दायर की गई हैं। कानूनी टिप्पणियों में कथित तौर पर यह संकेत दिया गया है कि परित्यक्त खदानों का उपयोग केवल विशिष्ट परिस्थितियों में, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के प्रावधानों के अनुरूप, अक्रिय और वैज्ञानिक रूप से संसाधित कचरे के लिए ही किया जा सकता है।

किसानों और कार्यकर्ताओं की माँगें

किसान संगठनों और पर्यावरण समूहों ने राज्य सरकार को अभ्यावेदन प्रस्तुत कर RRR आदेश में संशोधन या उसे वापस लेने की माँग की है। उन्होंने अपशिष्ट पृथक्करण और प्रसंस्करण उपायों के सख्त क्रियान्वयन, एक प्रभावी निगरानी तंत्र की स्थापना और परित्यक्त खदान स्थलों को संरक्षित करने की अपील की है। आलोचकों का कहना है कि बिना जवाबदेही तंत्र के यह नीति पर्यावरण और जन स्वास्थ्य दोनों के लिए दीर्घकालिक खतरा बन सकती है।

आगे की राह

राज्य सरकार की ओर से अभी तक इन अभ्यावेदनों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पर्यावरण समूहों ने स्पष्ट किया है कि यदि नीतिगत बदलाव नहीं हुए तो वे कानूनी और जन-आंदोलन दोनों रास्ते अपनाते रहेंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ नगरपालिका कचरा प्रबंधन की विफलता का बोझ अंततः ग्रामीण भूमि और जल संसाधनों पर डाल दिया जाता है। फरवरी 2022 का RRR प्रावधान शायद खदान पुनरुद्धार की नीयत से बना था, लेकिन बिना सख्त निगरानी तंत्र के यह 'वैध डंपिंग लाइसेंस' बन गया है। असली सवाल यह है कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद अनुपचारित कचरे की डंपिंग क्यों जारी है — और इसके लिए जवाबदेह कौन है।
RashtraPress
9 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तमिलनाडु में खदानों में कचरा डंपिंग का विवाद क्या है?
तमिलनाडु के तिरुप्पुर समेत कई जिलों में स्थानीय निकायों पर परित्यक्त पत्थर की खदानों में अनुपचारित नगरपालिका ठोस कचरा डालने के आरोप हैं। किसान और पर्यावरण कार्यकर्ता फरवरी 2022 के RRR ढाँचे के उस प्रावधान का विरोध कर रहे हैं जो इस तरह की डंपिंग को अनुमति देता है।
RRR ढाँचा क्या है और इसे क्यों चुनौती दी जा रही है?
RRR (रिक्लेमेशन, रेस्टोरेशन एंड रिहैबिलिटेशन) ढाँचा फरवरी 2022 में तमिलनाडु सरकार द्वारा जारी किया गया था, जिसमें स्थानीय निकायों को खदान गड्ढों में ठोस कचरा निपटान की अनुमति दी गई। कार्यकर्ताओं का तर्क है कि इस प्रावधान का दुरुपयोग हो रहा है और बिना वैज्ञानिक प्रसंस्करण के अनुपचारित कचरा डाला जा रहा है।
खदानों में कचरा डंपिंग से क्या पर्यावरणीय खतरे हैं?
पर्यावरण समूहों के अनुसार अनियंत्रित डंपिंग से मिट्टी का क्षरण, भूजल प्रदूषण और वायु प्रदूषण का दीर्घकालिक खतरा है। इसके अलावा, जो परित्यक्त खदानें वर्षा जल संचयन के रूप में काम कर सकती थीं, वे स्थायी कचरा स्थलों में बदलकर अपना पारिस्थितिक महत्व खो देंगी।
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 इस मामले में क्या कहता है?
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के अनुसार परित्यक्त खदानों में केवल अक्रिय और वैज्ञानिक रूप से संसाधित कचरा ही विशिष्ट परिस्थितियों में डाला जा सकता है। कानूनी टिप्पणियों में कथित तौर पर यही संकेत दिया गया है कि अनुपचारित नगरपालिका कचरे की डंपिंग इन नियमों का उल्लंघन है।
किसान और पर्यावरण कार्यकर्ता क्या माँग कर रहे हैं?
वे राज्य सरकार से RRR आदेश में संशोधन या उसे वापस लेने, अपशिष्ट पृथक्करण और प्रसंस्करण के सख्त क्रियान्वयन, एक प्रभावी निगरानी तंत्र की स्थापना और परित्यक्त खदान स्थलों को अनियमित डंपिंग से बचाने की माँग कर रहे हैं।
राष्ट्र प्रेस
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