भारतीय जलक्षेत्र की टूना मछली सुरक्षित — CMFRI का स्पष्टीकरण, ब्राज़ील वाले परजीवी से कोई संबंध नहीं
सारांश
मुख्य बातें
आईसीएआर-सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (CMFRI) ने 22 सितंबर 2026 को स्पष्ट किया कि भारतीय तटीय जलक्षेत्र में पकड़ी गई टूना मछली पूरी तरह खाने के लिए सुरक्षित है और ब्राज़ील के अटलांटिक तट पर मिले परजीवी संक्रमण से इसका कोई सीधा संबंध नहीं है। यह बयान उस समय आया जब ब्राज़ील के पास अटलांटिक महासागर में पकड़ी गई स्किपजैक टूना में परजीवी (पैरासाइट) पाए जाने की खबरों ने उपभोक्ताओं में मछली की सुरक्षा को लेकर चिंता उत्पन्न कर दी थी।
CMFRI का आधिकारिक स्पष्टीकरण
संस्थान ने कहा कि किसी एक भौगोलिक क्षेत्र में मिली जानकारी को भारतीय जलक्षेत्र में पकड़ी गई टूना पर लागू नहीं किया जा सकता। CMFRI के निदेशक डॉ. ग्रिन्सन जॉर्ज ने कहा, 'सिर्फ इसलिए कि किसी खास भौगोलिक क्षेत्र की मछली में पैरासाइट पाए गए हैं, ग्राहकों को टूना या बाज़ार में मिलने वाली दूसरी मछलियाँ खाना बंद करने की ज़रूरत नहीं है।'
उन्होंने आगे बताया कि परजीवी की मौजूदगी एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भिन्न होती है, क्योंकि यह कई पारिस्थितिक (इकोलॉजिकल) कारकों पर निर्भर करती है। कोपेपोड जैसे मध्यवर्ती या गौण पोषक (इंटरमीडिएट या सेकेंडरी होस्ट) की उपस्थिति भी परजीवी के स्तर को प्रभावित कर सकती है।
नियमित जाँच और निगरानी
CMFRI के वैज्ञानिक नियमित रूप से विभिन्न प्रकार की मछलियों की जाँच करते हैं ताकि उनमें किसी संक्रमण या परजीवी का पता लगाया जा सके। स्किपजैक टूना की जाँच मछली की जीव-विज्ञान (बायोलॉजी) संबंधी अध्ययन के तहत भी की जाती है।
डॉ. जॉर्ज ने बताया कि CMFRI द्वारा जाँची गई मछलियों में नुकसानदायक परजीवी संक्रमण के बाहरी लक्षण नहीं पाए गए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि वैज्ञानिक विभिन्न क्षेत्रों में मछली के स्टॉक और आबादी की पहचान करने के लिए भी परजीवी अध्ययन का उपयोग करते हैं।
उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षा सलाह
हालाँकि मछली सुरक्षित घोषित की गई है, फिर भी संस्थान ने उपभोक्ताओं को खाद्य सुरक्षा के सामान्य नियमों का पालन करने की सलाह दी है। प्रोसेसिंग के दौरान आँत और अन्य आंतरिक अंगों को तुरंत हटाना आवश्यक है। इसके बाद पकाने से पहले मछली को अच्छी तरह साफ करना चाहिए।
तेज़ तापमान पर सही ढंग से पकाने से परजीवी नष्ट हो जाते हैं और खाद्य सुरक्षा जोखिम काफी कम हो जाते हैं। डॉ. जॉर्ज ने बताया कि यह मुद्दा उन देशों में अधिक महत्वपूर्ण है जहाँ कच्चा या अधपका समुद्री भोजन (सीफूड) प्रचलित है।
भारतीय खान-पान की आदतें — एक अतिरिक्त सुरक्षा
गौरतलब है कि भारत में सीफूड को आम तौर पर तेज़ तापमान पर पकाया जाता है। CMFRI ने कहा कि यह परंपरागत खान-पान की आदत उपभोक्ताओं को एक अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करती है, जिससे परजीवी से जुड़े जोखिम और भी कम हो जाते हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर समुद्री खाद्य सुरक्षा पर ध्यान बढ़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि क्षेत्रीय स्तर पर निगरानी और वैज्ञानिक पारदर्शिता उपभोक्ता विश्वास बनाए रखने के लिए ज़रूरी है।