महिला सशक्तिकरण: उमरिया की उर्मिला बैगा ने समूह से लोन लेकर खरीदा ऑटो, रोज कमा रहीं ₹800
सारांश
Key Takeaways
- उर्मिला बैगा, उमरिया जिले के गिंजरी गांव की आदिवासी महिला, स्वयं सहायता समूह से लोन लेकर ऑटो खरीदकर आत्मनिर्भर बनीं।
- केवल सातवीं कक्षा तक पढ़ी उर्मिला प्रतिदिन ₹700 से ₹800 की कमाई कर रही हैं।
- वे पाली-उमरिया और पाली-नौरोजबाद मार्ग पर केवल दिन के समय ऑटो चलाती हैं।
- उर्मिला की बेटी हॉस्टल में रहकर पढ़ रही है और उनका सपना है कि बेटी IAS अधिकारी बने।
- यातायात प्रभारी ज्योति शुक्ला ने उर्मिला की पहल को महिलाओं के लिए प्रेरणादायक बताया।
- यह कहानी मध्य प्रदेश में स्वयं सहायता समूह योजना की सफलता का एक ठोस उदाहरण है।
उमरिया, 25 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। मध्य प्रदेश के उमरिया जिले के आदिवासी गांव गिंजरी की रहने वाली उर्मिला बैगा ने स्वयं सहायता समूह से जुड़कर ऑटो खरीदा और महिला सशक्तिकरण की जीती-जागती मिसाल बन गई हैं। सीमित शिक्षा और पारिवारिक चुनौतियों के बावजूद वे आज पाली से उमरिया और पाली से नौरोजबाद के बीच ऑटो चलाकर प्रतिदिन ₹700 से ₹800 तक कमा रही हैं।
आदिवासी क्षेत्र से उठी आत्मनिर्भरता की लहर
उमरिया जिला मध्य प्रदेश के प्रमुख आदिवासी क्षेत्रों में गिना जाता है, जहां आज भी अनेक गांवों में परंपरागत जीवनशैली और सीमित संसाधनों के बीच जीवन यापन होता है। पाली विकासखंड के गिंजरी गांव की उर्मिला बैगा इसी पृष्ठभूमि से आती हैं। उन्होंने केवल सातवीं कक्षा तक पढ़ाई की, लेकिन जीवन की कठिन पाठशाला ने उन्हें वह सिखाया जो किताबें नहीं सिखा सकतीं।
उर्मिला ने पहले एक आयुर्वेदिक कंपनी में काम किया, जहां उन्हें व्यावसायिक अनुभव मिला। बड़े शहरों में उन्होंने देखा कि महिलाएं ऑटो चलाकर आत्मनिर्भर जीवन जी रही हैं। यह दृश्य उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया।
समूह से लोन, ऑटो की खरीद और नई शुरुआत
उर्मिला ने स्वयं सहायता समूह से ऋण लेकर ऑटो खरीदने का साहसी निर्णय लिया। यह निर्णय आसान नहीं था — पति की ओर से प्रोत्साहन का अभाव था और समाज की नजरें भी थीं। लेकिन उर्मिला ने हार नहीं मानी।
आज वे पाली-उमरिया और पाली-नौरोजबाद मार्ग पर केवल दिन के समय ऑटो चलाती हैं और प्रतिदिन ₹700 से ₹800 की आमदनी अर्जित करती हैं। यह आय उनके परिवार की आर्थिक रीढ़ बन चुकी है।
राष्ट्र प्रेस से बातचीत में उर्मिला ने बताया, "पति की ओर से सराहना नहीं मिल रही थी, इसलिए खुद कमाने का रास्ता चुना। पहले एक कंपनी में काम किया, फिर ऑटो खरीदा। अब रोज की कमाई हो रही है और परिवार की आर्थिक स्थिति बदल गई है।"
बेटी को IAS बनाने का सपना
उर्मिला की प्राथमिकताओं में उनकी बेटी की शिक्षा सर्वोपरि है। उनकी बेटी फिलहाल हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रही है और उसका पूरा खर्च उर्मिला स्वयं वहन कर रही हैं। उर्मिला का सपना है कि उनकी बेटी एक दिन IAS अधिकारी बने।
यह सपना महज एक माँ की चाहत नहीं, बल्कि उस संकल्प का प्रतीक है जो एक आदिवासी महिला ने विपरीत परिस्थितियों में पाला है। उर्मिला ने क्षेत्र की अन्य महिलाओं को संदेश दिया — "अगर आपका कोई सपना है तो उसे जरूर पूरा करें और परिवार को भी संभालें।"
प्रशासन ने की सराहना, महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा
उमरिया की यातायात प्रभारी ज्योति शुक्ला ने उर्मिला की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने कहा, "समाज में स्थितियां बदल रही हैं। उर्मिला ने ससुराल या परिजनों पर निर्भर न रहकर खुद अपने पैरों पर खड़े होने का फैसला किया। यह महिलाओं के लिए एक सशक्त संदेश है कि वे कमजोर नहीं हैं।"
गौरतलब है कि मध्य प्रदेश सरकार की स्वयं सहायता समूह योजना के तहत राज्य में लाखों महिलाएं आर्थिक रूप से सक्रिय हो रही हैं। उर्मिला बैगा की यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि सही मंच और थोड़ा सा साहस मिले तो आदिवासी अंचल की महिलाएं भी इतिहास रच सकती हैं।
उर्मिला जैसी महिलाओं की सफलता आने वाले समय में उमरिया जैसे आदिवासी जिलों में महिला उद्यमिता की नई लहर का आधार बन सकती है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार ऐसी महिलाओं को और किस प्रकार की सहायता व प्रशिक्षण प्रदान करती है।