विकास दुबे का मृत्यु प्रमाण पत्र छह साल बाद जारी, पत्नी ऋचा को लेना पड़ा हाई कोर्ट का सहारा
सारांश
मुख्य बातें
कानपुर के कुख्यात गैंगस्टर विकास दुबे का मृत्यु प्रमाण पत्र (डेथ सर्टिफिकेट) उसकी मौत के करीब छह साल बाद आखिरकार जारी कर दिया गया है। 16 सितंबर 2026 को मिली जानकारी के अनुसार, दस्तावेज़ में दर्ज एक तकनीकी त्रुटि को सुधरवाने के लिए उसकी पत्नी ऋचा दुबे को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा। यह मामला प्रशासनिक लापरवाही का एक स्पष्ट उदाहरण है, जिसने एक परिवार को वर्षों तक कानूनी और व्यावहारिक मुश्किलों में उलझाए रखा।
मूल घटनाक्रम: बिकरू काण्ड और एनकाउंटर
3 जुलाई 2020 की रात कानपुर के बिकरू गाँव में विकास दुबे और उसके साथियों ने एक पुलिस टीम पर हमला कर दिया था, जिसमें आठ पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे। यह घटना देशभर में चर्चा का केंद्र बन गई और बड़े पैमाने पर जन आक्रोश फैला। इस हमले के बाद विकास दुबे फरार हो गया और कई दिनों तक पुलिस की पकड़ से बाहर रहा।
अंततः उसे मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर परिसर से गिरफ्तार किया गया। 10 जुलाई 2020 को जब उसे कानपुर वापस लाया जा रहा था, तब पुलिस वाहन के पलट जाने के बाद हुई मुठभेड़ में उसकी मौत हो गई।
छह साल तक क्यों नहीं मिला मृत्यु प्रमाण पत्र
परिजनों के अनुसार, पोस्टमार्टम हाउस से जारी बॉडी डिस्पोज़ल स्लिप में विकास दुबे के पिता का नाम गलत दर्ज हो गया था। जहाँ पिता का सही नाम रामकुमार दुबे था, वहीं दस्तावेज़ में राजकुमार दुबे लिख दिया गया। इसी एक अक्षर की चूक के कारण मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया वर्षों तक अवरुद्ध रही।
परिवार का कहना है कि इस त्रुटि के चलते उन्हें संपत्ति, बैंक खाते और अन्य कानूनी मामलों में गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ा। ऋचा दुबे लंबे समय तक स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काटती रहीं, लेकिन दस्तावेज़ में सुधार नहीं हो पाया।
हाई कोर्ट का सहारा
प्रशासनिक स्तर पर कोई राहत न मिलने पर ऋचा दुबे ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद संबंधित विभाग ने दस्तावेज़ की त्रुटि सुधारी और अंततः मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किया गया। यह मामला दर्शाता है कि एक साधारण प्रशासनिक गलती परिवार को न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने पर मजबूर कर सकती है।
आम जनता पर असर और व्यापक संदर्भ
गौरतलब है कि मृत्यु प्रमाण पत्र न होने से परिवार को न केवल कानूनी, बल्कि बैंकिंग, बीमा और संपत्ति से जुड़े सभी मामलों में अड़चनें झेलनी पड़ीं। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब सरकार डिजिटल दस्तावेज़ीकरण को सरल बनाने का दावा करती है, फिर भी पीड़ित परिवारों को सालों बाद भी बुनियादी प्रमाण पत्रों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
यह घटना पहली नहीं है जब किसी एनकाउंटर में मारे गए व्यक्ति के परिजनों को आधिकारिक दस्तावेज़ पाने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी हो। विशेषज्ञों का कहना है कि पोस्टमार्टम और मृत्यु पंजीकरण की प्रक्रिया में बेहतर समन्वय की सख्त ज़रूरत है। अब जब प्रमाण पत्र मिल गया है, परिवार अपने लंबित कानूनी और वित्तीय मामलों को आगे बढ़ा सकेगा।